धर्मवीर भारती जी की कालजयी रचना अंधायुग में एक प्रसंग है जहाँ गांधारी कृष्ण को शाप देती है। गांधारी : तो सुनो कृष्णप्रभू हो या परात्पर होकुछ भी होसारा तुम्हारा वंशइसी तरह पागल कुत्तों की तरहएक दूसरे को फाड़ खायेगातुम खुद उनका विनाश करके... Continue Reading →
स्वर्ग में विचरण करते हुएअचानक एक दूसरे के सामने आ गए विचलित से कृष्ण, प्रसन्नचित सी राधा… कृष्ण सकपकाए,राधा मुस्काई… इससे पहले कृष्ण कुछ कहतेराधा बोल उठी… कैसे हो द्वारकाधीश? जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी उसके... Continue Reading →
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