namkeen 2नमकीन में कहानी के क्षेत्र में गुलज़ार को एक उम्दा कहानी समरेश बसु की तरफ से मिल गयी थी और उस कहानी को उन्होने बड़े ही मोहक, रोचक और प्रभावी अंदाज में दृष्यात्मक बनाकर दर्शकों के सामने एक संवेदनशील फिल्म प्रस्तुत कर दी।

आधुनिकता के दौर में तमाम तरह के विकास के बावजूद भी पहाड़ी इलाकों में जीवन की गति और इसके रंग-ढ़ंग, मैदानी इलाकों में विचरते जीवन से कुछ अलग होते हैं और गुलज़ार की नमकीन इस अंतर को स्थापित कर पाने में पूर्णतया सफल रहती है।

नमकीन सिर्फ नमकीन ही नहीं है बल्कि इसमें अन्य स्वाद भी हैं, बहुत सारे रंग हैं। इसका तासीर भी विभिन्न असर छोड़ता जाता है। कभी यह गर्माहट लाता है तो कभी इसका नर्म गुनगुनापन गुदगुदाता है, कभी बसंत की छटा आँखों के सामने तैरती है तो कभी ठण्डी सफेद बर्फ एक चादर बनकर हर तरफ हर चीज को अपने सर्द अस्तित्व के तले दबा देती है।

कभी तो दुख इतना गहन हो जाता है कि इससे पार पाना कठिन जान पड़ता है और कभी छोटी छोटी खुशियाँ चमन को खिला देती हैं।

नमकीन में बहुत कुछ ऐसा है जो एक बार इसे देख चुके दर्शक के साथ ताउम्र चलता रहता है। कोई संजीव कुमार की असाधारण अभिनय क्षमता की गहराई और विस्तार क्षेत्र पर मुग्ध हो सकता है और सालों साल इस बात के गुण गा सकता है कि कैसे उन्होने साधारण ट्रक ड्राइवर के चरित्र में खुद को ऐसा ढ़ाला कि अभिनेता संजीव कुमार कहीं खो ही गये।

कोई वहीदा रहमान की अभिनय प्रतिभा के साक्षात दर्शन करके दाँतो तले ऊँगली दबा सकता है और अपनी सोच को विस्तार दे सकता है कि गुलज़ार अभी तक उनके साथ काम क्यों न कर पाये? गुलज़ार ने निर्देशक के रुप में अपनी पहली फिल्म मेरे अपने में मीना कुमारी से एक विधवा वृद्धा की भूमिका करवायी थी और मीना जी के अभिनय प्रदर्शन को लोग कभी भूल नहीं पाते हैं। नमकीन ने मेरे अपने जैसी ख्याति नहीं पायी पर फिल्म गुलज़ार की अन्य फिल्मों से कमतर नहीं है किसी भी मामले में। वहीदा जी का अभिनय प्रदर्शन भी काबिलेतारीफ है ही।

कोई शर्मीला टैगोर के संवेदनशील अभिनय को देख कह सकता है कि विवाह के पश्चात जब उन्होने ढर्रे पर चलने वाले नियमित किस्म के हिन्दी फिल्मों की नायिका के चरित्रों, जिनमें खूबसूरत दिखना और नाच-गाने में पारंगता दिखाना ज्यादा बड़ी क्षमातायें मानी जाती हैं, से हटकर अच्छी भूमिकायें कीं तभी उन्होने अपनी अभिनय क्षमता का भरपूर दोहन और प्रदर्शन किया और गुलज़ार की मौसम, खुशबु और नमकीन उनकी उल्लेखनीय हिन्दी फिल्मों में ऊपर के स्थान ग्रहण करती हैं।

शबाना आज़मी तो हर उस फिल्म में अच्छा काम करती ही हैं जहाँ उन्हे अच्छा चरित्र निभाने के लिये मिले और अच्छा निर्देशक मिले जो एक अच्छी फिल्म बनाने का सपना लिये फिल्म बना रहा हो न कि केवल व्यवसायिक कारणों से एक फॉर्मूला फिल्म बना रहा हो।

आम तौर पर घर की एक चुलबुली सदस्य या नायिका की चहकने वाली सहेली के चरित्रों में नजर आने वाली किरण वैराले खूबसूरत ढ़ंग से गुलज़ार की फिल्म में काम करने का फायदा उठाते हुये अपने फिल्मी जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करती हैं और बाकी तीनों अभिनेत्रियों के मुकाबले कहीं भी हल्की नहीं दिखायी देतीं।

namkeen 1बहुत सारी फिल्में ऐसी हैं जिनमें टी.पी.जैन जैसे चरित्र अभिनेताओं पर दर्शकों का ध्यान ही नहीं जाता क्योंकि निर्देशक मुख्य अभिनेताओं को ही सुपर मानव के रुप में प्रस्तुत करने में अपनी सारी ऊर्जा और संसाधन लगा देते हैं और बाकी कलाकार केवल खानापूर्ति करने के लिये कहानी को पेश करने के लिये रखे जाते हैं, पर गुलज़ार की फिल्मों में चरित्र अभिनेता भी अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन प्रस्तुत करते नजर आते हैं।

टी.पी.जैन, संजीव कुमार के साथ कदम मिलाकर और कई क्षणों में तो उनसे भी आगे बढ़कर इतनी रोचक और विश्वसनीय शुरुआत फिल्म को दे देते हैं कि दर्शक पहले ही संवाद और पहले ही दृष्य से फिल्म में रम जाते हैं।

टी.पी.जैन और वहीदा रहमान के चरित्र चित्रणों में उपस्थित बारीकियों को देख कर पता चलता है कि गुलज़ार कितनी गहराई से व्यक्तियों को देखते हैं, परखते हैं और अपनी स्मृति में जीवित रखते हैं।

कोई दर्शक आर.डी.बर्मन के संगीत में खोया रह सकता है। किसी को किशोर कुमारराह पे रहते हैं” गाते हुये अपने साथ यात्रा पर ले जा सकते हैं तो कोई ” फिर से आइयो बदरा बिदेसी ” गीत की अलंकृत भाषा को मधुर वाणी से संजोती हुयी आशा भोसले के साथ हरियाली से भरे पहाड़ों में सूरज और बादलों के बीच चल रहे आँख मिचोली के खेल में रमा हुआ ऐसी ही स्मृतियों या कल्पनाओं में खोया रह सकता है।

कोई “आँकी चली बाँकी चली चौरंगी में झाँकी चली” गीत में बसी कर्णप्रिय जिबरिश की भूलभूलैया में खोकर भी मस्ती से झूम सकता है तो कोई अन्य याद करने की कोशिश कर सकता है कि किरण वैराले पर फिल्माया गया नृत्य गीत,” ऐसा लगा सूरमा नजर मा आये नजर तू ही तू” तो अच्छा था ही पर उसने वहीदा जी पर फिल्माये गये मुजरे “बड़ी देर से मेघा बरसा हो रामा जली कितनी रतियाँ ” पर पहले कभी इतना ध्यान क्यों नहीं दिया?

कोई एम. सम्पत की सिनेमेटोग्राफी को देखकर उनकी अन्य फिल्मों की सूची ढूँढ़ सकता है।

कोई अगर थोड़ी बहुत शिकायत कर सकता है तो वामन भोसले और गुरुदत्त के सम्पादन में उपस्थित थोड़ी कमियों को लेकर वरना बाकी तो नमकीन एक बेहतरीन फिल्म है।

हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों में कहीं दूरदराज बसे एक छोटे से गाँव में खंडहर बनते घर में एक कमरा किराये पर लेने आये ट्रक ड्राइवर गेरुलाल (संजीव कुमार) का चेहरा देखकर जब ज्योति/जुगनी अम्मा (वहीदा रहमान) ढ़ाबे वाले धनीराम (टी.पी.जैन) से कहती हैं,” शक्ल से तो मक्कार लगता है…” तो वहीदा जी का एक लापरवाह अंदाज से इस बात को कहना, संजीव कुमार का भौचक्का रह जाना और टी.पी. जैन का असंजस में पड़ जाना, इन सभी बातों के एक साथ घटित होने से जो हास्य उत्पन्न होता है उसे श्रेष्ठ प्राकृतिक हास्य के उदाहरण के रुप में प्रस्तुत किया जा सकता है। और इस हल्के गुनगुने स्तर के हास्य का सिलसिला लगभग सारी फिल्म में कायम रहता है। चाहे वह धनीराम द्वारा गेरुलाल को तीनों बहनों के परिचय देते समय भ्रम में डालने के दृष्य हों या बाद में तीनों बहनों और अम्मा के साथ गेरुलाल के सम्पर्क के कारण उत्पन्न हास्य हो, या मिटठू (शबाना आज़मी) और चिनकी (किरण वैराले) द्वारा गेरुलाल द्वारा छिपकली को छत से हटाने का प्रयास और कमरे में मौजूद इकलौते बल्ब और स्विच की जाँच-पड़ताल करने का प्रयास चुपचाप देखने और सब चीजें, जो भी गेरुलाल माँगते हैं, लाकर उन्हे गेरुलाल को देने के बाद पुनः उनके क्रिया कलापों को बड़े गौर से देखने के दृष्य हों, सब कुछ बड़े ही स्वाभाविक अंदाज में दर्शकों के सामने आता है और दृष्य दर्शकों को मुस्कुराने के लिये विवश करके उस एक क्षण की तरफ ले जाते हैं जहाँ चिनकी हैरत से गेरुलाल से पूछती हैं,” ये तुम क्या कर रहे हो?”

गेरुलाल द्वारा बताने पर कि वह बिजली की जाँच कर रहा है, चिनकी मासूमियत से कहती हैं.”पर बिजली तो यहाँ है ही नहीं“।

जैसे एक लैंस के माध्यम से किसी कागज़ या सूखी घास पर सूरज की किरणों को केंद्रित करके डाला जाये तो कुछ क्षण पश्चात सूखी वस्तु आग पकड़ लेती है और भभक कर जल उठती हैं उसी तरह नमकीन के हास्य दृष्य हैं। वे पहले तो कुछ क्षणों तक गुनगुनी धूप की भाँति दर्शक को मुस्कुराहट की गरमी देते रहते हैं और फिर सहसा ही ऐसा कुछ होता है जिससे हँसी भभक कर उमड़ पड़ती है। काश बहुत सारे लेखकों एवम निर्देशकों में ऐसी क्षमता होती तो हिन्दी फिल्मों में हास्य फूड़हता से हट कर श्रेष्ठता की ओर कदम बढ़ा पाता।

मुकम्मल तरीके से फिल्म बढ़ती है आगे की ओर, मसलन जब पहली बार गेरुलाल कमरे से बाहर नीचे झाँकते हैं तो कैमरा उनके देखने के माध्यम से धूप में सूखते मसाले, धुँआ छोड़ता चूल्हा आदि सब दिखाता है दर्शकों को। एक नया आदमी जैसे जगह को देखेगा वैसे ही कैमरा चीजों को दिखाता है।

छोटी सी पहाड़ी जगह है जहाँ छोटी से छोटी बात भी कुछ ही देर में सब लोगों को पता चल जाती है। गेरुलाल को महिलाओं से बात करते हुये हिचक होती है और निमकी (शर्मीला टैगोर) की स्पष्टवादिता के सामने तो उन्हे भय भी लगता है। निमकी एवम छोटी दोनों बहने, मिट्ठु (शबाना आज़मी) और चिनकी (किरण वैराले), किसी ऐसे पुरुष के सम्पर्क में नहीं आयी हैं जो संवेदनशील हो और उन लोगों से व्यक्तिगत रुप से पारिवारिक स्तर पर बातचीत कर सके और सुख दुख बाँट सके। गेरुलाल पहले ऐसे पुरुष हैं जो उस महिलाप्रधान परिवार में परिवार के एक सदस्य बन जाते हैं। वे शीघ्र ही चारों महिलाओं से एक गहरा नाता जोड़ लेते हैं। उनका उस परिवार में आगमन एक शांत पानी की झील में ऐसी तरंगे उत्पन्न कर देता है जो सभी दिशाओं में हलचल करने लगती हैं।

ज्योति का परिवार दुख को जीवन का आवश्यक अंग मानकर जी रहा है। कुछ दुख हैं जो उनके पीछे बीत चुके जीवन से सम्बंधित हैं और बाकी रोजमर्रा के जीवन में आने वाली परेशानियाँ हैं पर तब भी मौका मिलते ही तीनों बहने हँसी ठिठोली कर लेती हैं और ऐसे कितने ही क्षण हैं जो संदेश दे जाते हैं कि खुशी धन-सम्पदा और ऎशो-आराम की मोहताज नहीं होती। मन में संतोष हो तो हँसी कहीं भी खिल उठती है और चम्पा चमेली की सुगंध सरीखी चारों तरफ फैल जाती है।

नजदीक आने का एक तरीका है, नजदीकी बढ़ने की अपनी एक गति होती है जो व्यक्ति-व्यक्ति पर निर्भर करती है। गेरुलाल की संवेदनशीलता और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार से निमकी प्रभावित है और बाकी दोनों बहनों में से चिनकी तो पहले ही गेरुलाल के नजदीक आ चुकी है परंतु व्यक्तिगत बातचीत के बहाव में बहकर गेरुलाल उन मुद्दों को छेड़ बैठता है जो नासूर की तरह निमकी और उनके परिवार को दर्द देते रहे हैं और अनायास गेरुलाल द्वारा उन दबी-गड़ी हुयी बातों का जिक्र करने से पहले से ही नये घटनाक्रमों से हतप्रभ निमकी आहत हो उठती है। अपनी कमजोरी पर कोई भी ऐसे बात नहीं करना चाहता जिसमें दूसरा उन मुद्दों को छेड़े। हाँ नजदीकी ऐसे अवसर जरुर पैदा कर सकती है जहाँ दुखी व्यक्ति खुद ही अपने दुख को अपने नजदीकी व्यक्ति से सांझा करना चाहे। संवेदनशील व्यक्ति अपने इर्द गिर्द के लोगों के दुख-दर्द में उनकी सहायता करना चाहता है।

महिलाओं के इस परिवार में बरसों से कुछ भी ऐसा अच्छा नहीं हुआ है जिससे उन्हे ऐसी आशा जगे कि आगे के जीवन में प्रगति और विकास आ सकता है। इन्ही सब निराशाओं के कारण निमकी गेरुलाल से स्पष्ट तौर पर उस तरह नजदीकी नहीं बढ़ा पातीं जैसा कि उनका अंतर्मन कहता है।

प्रेम तो अनायास हो या धीरे धीरे विकसित हो उसमें व्यापारी किस्म के समझौते नहीं चल पाते और निमकी अपने परिवार की भलाई की खातिर ऐसे ही समझौते करना चाहती हैं जिससे कि उनके परिवार में कम से कम हलचल उत्पन्न हो।

वे एक तरह से घर की प्रबंधक हैं, रीढ़ हैं। वे घर के बाकी तीनों सदस्यों से गहराई के स्तर पर जुड़ी हुयी हैं और उनके पल-पल की खबर रखती हैं। वे खुद कितनी ही बड़ी हानि सहन कर लें पर अपनी माँ और छोटी बहनों पर आँच नहीं आने देना चाहतीं। उनकी तड़पन देखने लायक है जब गलती से गेरुलाल मिटठु के दिल को ठेस पँहुचा देते हैं।

अभी तक न फिल्म बताती है और न ही गेरुलाल जानते हैं कि सदैव खुश और शांत दिखायी देने वाली मिट्ठु के जीवन में एक बहुत बड़ा पेंच है।

बकौल गाँव वालों के निमकी शादी की आयु को पार कर चुकी हैं। निमकी भी शायद ऐसा ही समझती हैं और वे चाहती हैं कि उनकी तो शादी नहीं हो सकी पर उनकी दोनों छोटी बहनों के घर किसी तरह अच्छे से बस जायें।

उनका यही प्रण और निर्णय एक ऐसे बदलाव को रोक देता है जो शायद उन सबके जीवन को अच्छा मोड़ दे जाता। पर उनके अंदर के डर और परिवार के प्रति अति-सुरक्षा के भाव के कारण वे समय पर सही निर्णय लेने में चूक कर जाती हैं।

निमकी चाहती हैं कि गेरुलाल मिट्ठु से शादी कर ले ताकी वह अम्मा और चिनकी की देखभाल करती रहे, पर गेरुलाल ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि उनके अंदर निमकी को लेकर ही प्रेम की भावनायें जगी हैं और जो गेरुलाल चाहते हैं कि निमकी उनसे विवाह कर ले उसके लिये निमकी तैयार नहीं हैं क्योंकि उन्हे भय है कि उनके घर से जाते ही यह घरोंदा बिखर जायेगा।

गुलज़ार निर्देशक के तौर पर अपनी फिल्मों में गजब का नियंत्रण रखते हैं। एक दृष्य है जिसमें गेरुलाल गाँव छोड़ कर जा रहे हैं। रोती हुयी मिट्ठु और चिनकी उन्हे ट्रक की ओर जाते हुये देख रही हैं पर निमकी एक स्तम्भ की ओट में खड़ी हुयी गेरुलाल और ट्रक की ओर पीठ करके रो रही हैं। दुखी गेरुलाल ट्रक में चढ़ते हैं, उसे स्टार्ट करते हैं, चिनकी और मिट्ठु का रुदन बढ़ जाता है, सभी को इंतजार है निमकी की प्रतिक्रिया का। वे भी मुड़कर जाते हुये ट्रक की ओर देखती हैं पर उनके मुड़ने और देखने का समय नियत है। उनकी प्रतिक्रिया और उस प्रतिक्रिया के होने का समय दृष्य में मौजूद भावनाओं की तीव्रता को एकदम से बढ़ा देते हैं। यही गुलज़ार साब की खूबी है, वे मानवीय भावों को बेहद सटीक ढ़ंग से प्रस्तुत करते हैं।

गेरुलाल के घर में किरायेदार बन कर आने से दुखों के पहाड़ पर बैठ कर जीवन काट रहे परिवार में कुछ उमंगें जन्मने लगी थीं और गेरुलाल के अनायास ही चले जाने से उन सब नय जन्मे सपनों की असमय ही मौत होती देख कर सारे सम्बंधित व्यक्ति हतप्रभ हैं।

मजबूरियों के सामने अपने अपने सपनों को कुचलता देखकर व्यक्तियों को जीना है और जीवन को आगे चलना है। दिल में दुख तो रह ही जाते हैं, दिल में खारिश तो रह ही जाती है।

निमकी के गाँव में जाने से पहले तो गेरुलाल के मन में अम्मा और उनकी तीन पुत्रियों का कोई अस्तित्व था नहीं और न ही उन लोगों के मन में गेरुलाल का कोई अस्तित्व था परंतु वहाँ काटे गये कुछ महीने गेरुलाल को घर का एक अहम सदस्य बना देते हैं। और जब विदाई का मौका आता है तो दिल फिर से टूत झाते हैं जो दुख चार महिलाओं के ह्र्दयों में घर करे बैठा था अब उस दुख से अब एक पुरुष का ह्रदय भी साझा कर बैठा है।

ऐसे उजड़े आशियाने तिनके उड़ गये
बस्तियों तक आते आते रस्ते मुड़ गये
हम ठहर जायें जहाँ उसको शहर कहते हैं

परिवार के दुखों में साझा करके परिवार से बिछुड़ने का एक नया दुख लेकर गेरुलाल नये शहर आ जाते हैं। तीन बरस बीत जाते हैं, न कोई चिट्ठी इधर से उधर जाती है और न ही किसी तरह के संदेश का आदान प्रदान हो पाता है।

नमकीन के दो संस्करण उपलब्ध हैं।
 नमकीन के एक संस्करण में फिल्म “राह पे रहते हैं” गीत पर खत्म हो जाती है और एक ऐसा अंत छोड़ जाती है जिसमें दर्शक इस खुली आशा के साथ रह जाता है कि कभी गेरुलाल वापिस गाँव में जरुर आयेंगे जैसा कि उन्होने चिनकी से कहा है और शायद निमकी उन्हे खत लिखेंगी जैसा कि गेरुलाल ने उनसे गुजारिश की है। दुख है उनके इस तरह चले जाने से, क्योंकि सब बातें उसी जगह अटकी रह गयी हैं जहाँ उनके गाँव में आगमन से पहले थीं पर तब भी एक आशा है।

दूसरे संस्करण में फिल्म आगे की कहानी दिखाती है|

राह पर ही चलते रहने वाले ट्रक ड्राइवर गेरुलाल के अंदर बसे दुख ने उनकी जीवनचर्या काफी हद तक बदल डाली है। अंदर समा गये दुख ने तीन बरस बढ़ी हुयी उम्र से कहीं ज्यादा उनके शरीर को पुराना और कमजोर कर दिया है। गेरुलाल अब शराब पीने लगे हैं। नौटंकी न देखने की स्व:पोषित कसम भी वे साथियों के थोड़ा सा जोर देने पर तोड़ डालते हैं।

पर कसम तोड़ना एक ढ़र्रे पर चले उनके जीवन की एकरुपता को भी तोड़ जाता है जब नौटंकी में नर्तकी को पहचान कर वे स्तब्ध रह जाते हैं और उनके जीवन में तीन साल पहले बीती घटनाऐं जिंदा होकर उन्हे झिंझोड़ने लगती हैं। जिन यादों पर उन्होने रोजी रोटी की फिक्र करने जैसी परतों का मुलम्मा चढ़ा हुआ था वह नर्तकी से मुलाकात एक झटके में उतार जाती है।

तीन साल पहले एक रात उन्होने केवल महिलाओं वाले उस घर को एक शराबी बूढ़े से बचाते हुये शराबी को यह कहकर वहाँ से भगा दिया था कि अब यहाँ गेरुलाल रहता है। बाद में ज्योति अम्मा से ही उन्हे पता चलता है कि शराबी बूढ़ा दरअसल में किशनलाल था, ज्योति/जुगनी का पति और तीनों लड़कियों का पिता जो अपनी किसी भी लड़की को नौटंकी में नाचने के लिये तैयार करने के लिये वहाँ कुछ अंतराल के बाद आता रहता है ताकि उसके जीवनयापन के साधन और शराब पीने जैसी आदतों के पूरे होने के लिये धन का प्रबंध हो सके।

शतरंज की बिसात बिछी हुयी है। सफेद रंग के मोहरे एक तरफ और सामने काले रंग के मोहरें खड़े हैं। दोनों तरफ के राजा, वजीर, दो हाथियों, दो घोड़ों और दो ऊँटों के साथ पिछली पंक्ति्यों में सुरक्षित खड़े हैं और आठ-आठ सिपाही उनके कवच बने उनकी सुरक्षा करते हुये उनसे अगली पंक्तियों में खड़े हैं।

खेल नहीं हो सकता अगर प्यादे आगे न बढ़ें और बाकी मोहरें भी इधर उधर हलचल न करें। बाजी जीतने के लिये मोहरों का आगे या इधर उधर चलना बहुत जरुरी है। इस हलचल में कुछ मोहरें मारे जायेंगे पर उनकी हलचल और कुर्बानी के बलबूते ही राजा को जीत हासिल होगी और खेल में रोचकता उत्पन्न होगी।

जीवन और शतरंज की बिसात में बहुत अंतर नहीं है। बस जीवन में हार जीत के फैसलों या परिणामों से ज्यादा जीने का खेल ज्यादा महत्वपूर्ण है।

गेरुलाल को यह शिक्षा देती है सब चरित्रों में सबसे कम आयु की चिनकी। वह कोसती है गेरुलाल को कि वक्त्त पर उसने निर्णय न लेकर कितनी बड़ी गलती की। ऐसी गलती जिसका खामियाजा सारे घर को भुगतना पड़ा। अगर गेरुलाल उस समय निमकी से विवाह कर लेते तो ठहराव के जंजाल में अटके पड़े उस घर और वहाँ रहने वाले व्यक्तियों के जीवन में एक प्रवाह आ जाता।

चिनकी कहती है कि वहाँ कोई जी नहीं रहा था बस एक दूसरे के लिये कुरबानी का जज्बा लिये हुये जीवन को दबोचे हुये एक जगह पड़े हुये थे। गेरुलाल से कुछ आशा बँधी थी कि वे कोरी हमदर्दी न दिखाकर कुछ ठोस कदम उठायेंगे पर वे निमकी के हठ के आगे झुक गये और चुपचाप चले आये सब कुछ वैसा ही छोड़ कर, इस आशा के साथ कि शायद बाद में सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा।

अपने आप ऐसी व्यक्तिगत समस्यायें तो ठीक नहीं हो सकतीं। अस्तित्व को क्या मतलब है एक गेरुलाल या एक निमकी या एक मिट्ठु या एक जुगनी या एक चिनकी की ऐसी छोटी-छोटी समस्याओं से? उन्हे सुलझाने के लिये ही तो अस्तित्व ने मानव को दिमाग जैसी अदभुत शक्ति दे रखी है।

चिनकी को नौटंकी की नर्तकी के रुप में देख स्तब्ध और क्रोधित खड़े गेरुलाल को अगला झटका लगता है वहाँ बूढ़े किशनलाल को देख कर।

नौटंकी में सारंगीवादक, अपने जिस शराबी पति के चंगुल से अपनी पुत्रियों को बचाने के लिये ज्योति ने गरीबी में सारी ज़िंदगी गुजार दी वही किशनलाल (राम मोहन), गेरुलाल से कहते हैं कि अगर कभी जुगनी से मुलाकात हो तो कहना,” तुम अगर दुखी रहीं तो सुखी मैं भी नहीं रहा “।

अवाक खड़े गेरुलाल को अपने कारनामों के पीछे की व्यवहारिक सीख का दर्शन बताते हुये किशनलाल कहते हैं,

जहाँ से जमीन बीजी थी न वहीं से तो काटता

ज़िंदगी किसी के रोके से नहीं रुकती। जिन बातों को होने से रोकने के लिये निमकी ने गेरुलाल के बेहतरीन प्रस्ताव को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था वे सारी बातें उनके जीवन में होकर रहीं। अपने खुद के जीवन को खाद बनाकर उन्होने अपने प्रियजनों के जीवन में अनदेखे दुख न आयें ऐसा प्रयास किया पर उनके प्रयास विफल रहे। उनके त्याग काम नहीं आये और घर बिखर ही गया।

टूटे फूटे खंडहर नुमा उस घर में तीन बरस पहले घोर गरीबी के बावजूद समय समय पर बहनों की खिलखिलाहट गूँज जाया करती थी पर आज वहाँ सन्नाटा घर किये बैठा रहता है। घर की सबसे बड़ी बेटी निमकी अकेली इधर से उधर घूमा करती है। शायद इस आशा में वह वहाँ टिकी है कि हो सकता है जीवन के दूर चले गये सिरे शायद कभी वापस आ मिलें।

निमकी के पास यादें हैं और एक अंतहीन सा दीखता इंतजार और शायद होंगे कुछ पछतावे।

सूने और अकेलेपन से भरे ठहरे जीवन के ताल में तरंग उत्पन्न होती हैं एक रात जब सहसा वे गेरुलाल को वहाँ खड़ा पाती हैं। आज उनमें साहस नहीं बचा है। आज किसी बात को सम्भालने की इच्छा से भरी ऊर्जा उनमें नहीं है। आज उनमें इतना धीरज नहीं है कि वे फिर से गेरुलाल को वहाँ से जाते हुये देख सकें और इसलिये उनके संयम का बाँध टूट जाता है और वे कहती हैं गेरुलाल से,”आज मैं तुम्हे वापस नहीं जाने दूँगी“।

गेरुलाल के आश्वासन देने के बाद भी कि वे वहाँ उसी से मिलने आये हैं और जाने के लिये नहीं आये हैं, वे शक्ति नहीं जुटा पातीं और बरसों से साधे स्व:अनुशासन की ऊर्जा बिखर जाती है और वे भावनाओं के वशीभूत हो जमीन पर गिर पड़ती हैं। सूकून यही है कि इस गहन अंधकार का अंत करने उजाले के रुप में गेरुलाल का साथ आ गया है जिसके सहारे निमकी फिर से उठ खड़ी होंगी, बाकी के जीवन को साझा रुप से जीने के लिये।

…[राकेश]

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