पार्थो घोष ने 1993 में एक फ़िल्म बनाई थी -दलाल, जिसका विलेन जगन्नाथ त्रिपाठी (राज बब्बर) गर्व से कहता था कि वह चमड़ी बेचकर दमड़ी कमाता है| वह स्त्रियों को वेश्यावृत्ति में धकेलकर उनके माध्यम से पैसे कमाता था| जगन्नाथ,... Continue Reading →
“दुःख तोड़ता भी है, पर जब नहीं तोड़ता या तोड़ पाता, तब व्यक्ति को मुक्त करता है” (अज्ञेय के विलक्षण उपन्यास “नदी के द्वीप” की दो में से एक नायिका का कथन) दुःख एक नितांत निजी मसला है मनुष्य के... Continue Reading →
Recent Comments