mayaसिनेमा एक बेहद सशक्त्त माध्यम है और लिखे अक्षर से एकदम अंजान बिल्कुल अनपढ़ किस्म के व्यक्ति भी इस माध्यम के द्वारा संदेश ग्रहण कर सकते हैं और दिखाये हुये की अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर व्याख्या कर सकते हैं। कॉमिक्स भी यही काम अनपढ़ लोगों के साथ नहीं कर सकते क्योंकि वहाँ दर्शक का पाठक होना भी जरुरी है और पूरे संदेश को समझने के लिये चित्रों के साथ लिखे हुये को पढ़ना भी जरुरी है।

साहित्य की तरह ही सिनेमा भी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एक प्रभावी जंग छेड़ सकता है और यह ऐसा करता भी रहा है। सिनेमा का असर तात्कालिक रुप से दिखायी न भी दे परन्तु दीर्घ काल में यह भी जन-जीवन को ऐसे ही प्रभावित करता है जैसे कि साहित्य।

परन्तु सामाजिक कुरीतियों पर रचे साहित्य और सिनेमा या किसी भी अन्य कला के माध्यम में देश, काल और वातावरण के बोध का उपस्थित होना बहुत जरुरी है और केवल काल्पनिक कथा की रचना से सामाजिक कुरीति पर कुठाराघात नहीं किया जा सकता। जिस सामाजिक कुरीति की बात रचना कर रही है उसके वास्तव में किसी काल में घटित होने की सच्चाई का समावेश उस रचना में होना जरुरी है अन्यथा रचना किसी भी तरह के प्रयोजन को पूरा नहीं कर पायेगी।

दुर्भाग्य से दिग्विजय सिंह की पहली फिल्म, माया, इसी कमजोरी का शिकार हो जाती है और पनपने से पहले ही काल का ग्रास बन जाती है बल्कि फिल्म इस कदर दर्शकों की सवेंदना के साथ खेलती लगती है कि फिल्म की नीयत भी संदेह के घेरे में आ जाती है।

संक्षेप में आंध्र प्रदेश के किसी छोटे स्थान पर रहती एक बारह-तेरह साल की लड़की, माया, की कहानी है जो जब एक लड़की से एक महिला बनने के शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती है तो उसके असली माता-पिता और पालने पोसने वाले माता-पिता, उसके लड़की से नारी बनने की खुशी में उसे एक मंदिर में ले जाते हैं जहाँ एक विशेष पूजा करने के प्रयोजन को साधने के लिये मंदिर के पुजारी और उसके तीन-चार सहायक मंदिर के बंद कपाटों के पीछे उससे बलात्कार करते हैं और डर, दर्द और इस अमानवीय परम्परा से उत्पन्न घृणा से चीखती हुयी लड़की की पुकार को अनसुना करके चारों माता-पिता गाँव वालों को दावत देने में व्यस्त रहते हैं।

माया, उसके हम उम्र चचेरे भाई और अन्य बालकों के जीवन और क्रियाकलापॊं के द्वारा फिल्म बचपन की उस उम्र को बहुत अच्छे और परिपक्व ढ़ंग से दिखाती है परंतु फिल्म लड़खड़ा जाती है जब यह उस हिस्से में पहुँचती है जहाँ माया को उसके पालने पोसने वाले दम्पत्ति (अनंत नाग और मीता वसिष्ठ) उसके असली माता पिता के घर ले जाते हैं और वे चारों मंदिर के पुजारी से मिलकर विशेष पूजा करने की तैयारी में लग जाते हैं।

फिल्म दिखाती है कि माया को बड़ा करने वाले माता-पिता उसे बेहद प्रेम करते हैं और उसकी सभी बातों का खूब ख्याल करते हैं। वयस्क पुरुषों की बात छोड़ भी दें इस तर्क के बहाने कि उन्हे अपनी सामाजिक स्थिति का बहुत ख्याल रहा होगा पर माया की दोनों माओं को क्या नहीं पता कि इस परम्परा में बालिकाओं के साथ क्या होता है? क्या उन्होने अपने बचपन में यह सब अत्याचार और अनाचार नहीं झेला होगा?

फिल्म में चिड़िया का बच्चा भी इस विशेष पूजा और इस कुरीतिपूर्ण प्रथा का विरोध नहीं करता। इसका विरोध करता है माया का चचेरा भाई संजय, जिसे भी यह नहीं पता कि मंदिर के अंधेर बंद कमरे में माया के साथ क्या होने वाला है। उसे पुजारी अच्छा नहीं लगता है और उसे बस इतना भान है कि पुजारी कुछ गलत ही करेगा माया के साथ।

बच्चों के प्रति पारिवारिक हिंसा को फिल्म प्रभावी रुप से दिखाती है। वयस्क अभिनेताओं के साथ बाल-अभिनेताओं ने बहुत अच्छा अभिनय किया है। अभिनय और तकनीकी रुप से फिल्म अच्छी है। परन्तु निर्देशक की चालबाजी उनकी अपनी फिल्म के लिये काल बनकर आती है। बनाने की भावना ही अच्छी नहीं होगी तो कैसे अंतिम परिणाम अच्छा आ सकता है?

फिल्म जिस कुरीति पर टिकी है वह इतनी लचर है कि निर्देशक की नीयत पर ही सवाल खड़े कर देती है। क्या निर्देशक की इच्छा थी ऐसी कुरीति (अगर वास्तव में ऐसी किसी कुरीति का अस्तित्व रहा है) पर एक हिला देने वाले कथानक को तैयार करने की या वे बस इतना चाहते थे कि ऐसी किसी कुरीति का जिक्र भर करके एक ऐसी फिल्म बनी दें जो विदेशी दर्शकों को एक शॉक दे सके?

फिल्म खुद स्वीकार करती है कि ऐसी किसी कुरीति का वास्तव में अस्तित्व नहीं है, पर इस कमी की बावजूद भी अगर फिल्म, काल्पनिक रुप से ही सही, ऐसी किसी कुरीति का अस्तित्व स्वीकार करते हुये मीता वसिष्ठ या माया की असली माँ को नारी होने के नाते माया को इस कुरीति का शिकार होने से बचाने के लिये प्रयासरत दिखाती तो ऐसी किसी भी कुरीति के विपक्ष में फिल्म खड़ी हो जाती और इसकी महत्ता भी बढ़ जाती।

अभी तो दिग्विजय सिंह ने खुद ही एक अच्छा अवसर खो दिया है माया को सामाजिक कुरीतियों से लड़ती एक सशक्त्त फिल्म बनाने में चूक जाने के कारण।

अगर इस किस्म की अमानवीय परम्परा हिन्दुस्तान में कहीं भी, कभी भी, किसी भी काल में मनाई जाती रही है तो फिल्म एक सशक्त्त फिल्म बन कर उभर सकती थी परन्तु दर्शकों के विश्वास के साथ बलात्कार करती हुयी फिल्म इस परम्परा जैसी ही अमानवीय घोषणा फिल्म के अंत में बड़ी बेशर्मी से करती है कि यह फिल्म किसी एक खास परम्परा पर आधारित नहीं थी वरन फिल्म में दिखायी प्रथा का निर्माण (सिंथेसिस) देवदासी, जोगिनी और अनंग दान प्रातना जैसी प्रथाओं से प्रेरणा लेकर किया गया है।

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इस तरह की घोषणा के बाद फिल्म किस अर्थ को प्राप्त करती है?

देखा जाये तो कोई भी प्रयोजन पूरा नहीं होता इस फिल्म के द्वारा।

ऐसा इसीलिये ज्यादा दुखद लगता है क्योंकि तकनीकी रुप से फिल्म अच्छी है और कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि पहली बार निर्देशक बने व्यक्ति की अनुभवहीनता तकनीकी कमियों के कारण फिल्म को प्रभावी बनने से रोक रही हैं।

ऐसा नहीं है कि देश में व्याप्त किसी सामाजिक कुरीति को सिनेमा के परदे पर नहीं दिखाना चाहिए| ऐसी ढेरों फिल्में फिल्मों के भारत में जन्म के समय से ही बनती रही हैं और जो फ़िल्में सशक्त बनी हैं वे दर्शकों द्वारा पसंद भी की गयी हैं और कुछ ने समाज को झझकोरा भी है| पर जब बात सामाजिक कुरीति की हो तो उसे किसी काल में अस्तित्व में भी रहना चाहिए और निर्देशक के पास विषय को भली भांति प्रस्तुत करने की दृष्टि भी होनी चाहिए| वरना निर्देशक व्यक्ति/चरित्र की बुराई दिखाकर भी विषय को प्रस्तुत कर सकता है और ऐसे में कतई जरूरी नहीं कि विषय को सामाजिक बुराई का लिबास पहनाया जाए|

हिन्दुस्तान से कुछ ऐसे निर्देशक सिनेमा के क्षेत्र में अवतरित हुये हैं जो पश्चिम में बनी हिन्दुस्तान की गलत छवि को भुनाने के लिये फिल्में बनाते रहे हैं। उन्हे ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिये पैसा भी बाहर से मिल जाता है। पश्चिम के लिये हिन्दुस्तान है तो एक विदेशी मसला ही और पश्चिम ने ज्यादातर इसे भ्रांतियों के आधार पर ही समझने की कोशिश की है। हिन्दुस्तान में इतने विभिन्न किस्म के लोग, भिन्न किस्म की जातियों, उप-जातियों और वर्गों के लोग रहते हैं कि इसकी किसी भी किस्म की भ्रांतिपूर्ण छवि पश्चिम को विषम नहीं लगती और वह आसानी से विश्वास करता रहा है कि हिन्दुस्तान में तो हर किस्म की बुराइयाँ पलती रही हैं।

माया ऐसे ही विदेशी दर्शक वर्ग को संतुष्ट करने के लिये बनायी गयी फिल्म लगती है।

…[राकेश]


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