jagte raho3जागते रहो, पूर्वज फिल्म है जाने भी दो यारों और इस जैसी अन्य फिल्मों की। जागते रहो में जाने भी दो यारों की तरह स्पष्ट हास्य भले ही हर फ्रेम में बिखरा हुआ न हो पर जागते रहो का असर ग्लोबल है और यह आसानी से किसी भी देश के दर्शक को समझ में आ जायेगी जबकि जाने भी दो यारों में बहुत सारी बातें ऐसी हैं जिनका पूरा आनंद लेने के लिये दर्शक का भारतीय होना या भारतीय परिवेश से गहरे स्तर तक परिचित होना आवश्यक हो जाता है। अपने समय में जागते रहो ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर के फिल्म समारोह में पुरस्कार जीता भी था।

जागते रहो, एक सामाजिक व्यंग्य है। इसने समाज के सामने एक चेतावनी प्रस्तुत की समाज को पूरी तरह भ्रष्ट होने से बचाने के लिये। यह एक प्रयास था समाज में मौजूद मासूमियत को बचाये रखने के लिये। सामाजिक रुप से फिल्म अपने उद्देश्यों में कितनी सफल रही इस पर वाद-विवाद और बहस की पूरी गुंजाइश है क्योंकि पिछली सदी के पचास के दशक से अब तक पिछले साठ सालों में भ्रष्टाचार तो बेतहाशा बढ़ा है।

जागते रहो सामाजिक व्यंग्य की नदी पर हास्य की लहरें बहाती हुयी लाती है और भ्रष्टाचार की खम ठोक कर जम चुकी चटटानों को परत दर परत खुरचने और रेत बनाने का काम करती जाती हैं। जागते रहो सिर्फ वही नहीं है जो साफ साफ परदे पर दिख रहा है बल्कि यह रुपक (metaphor) की भाषा में काम करती है। शायद बिल्कुल ऐसा न होता हो या न हो सकता हो पर फंतासी के स्तर पर विचरती हुयी parables की प्रकृति लेकर भी यह घनघोर यथार्थवादी स्वभाव की फिल्म के रुप में सामने आती है।

भ्रष्टाचार से ग्रसित भारत है एक बड़े शहर में बसी वह इमारत, जहाँ गावँ से आया भूखा प्यासा एक गरीब अनाम आदमी (राज कपूर) पुलिस के डर से घुस जाता है और इस ऊँची इमारत में रहने वाले लोगों के काले कारनामे अपनी आँखों से देख पाने का मौका अनायास ही पा जाता है।

यह सफेदपोशों के शान से रहने की इमारत है क्योंकि उन्होने पैसे देकर मकान खरीदे हैं इस इमारत में रहने के लिये। यहाँ अवैध शराब बनाने वाले रहते हैं, यहाँ नकली नोटों को छापने वाले सेठ (नीमो) रहते हैं, यहाँ काला बाजारिये भी रहते हैं और नकली दवाइयाँ बनाने वाले भी। अनाम घुसपैठिया न चाहते हुये भी इस इमारत में भिन्न भिन्न लोगों की कारगुजारियों का गवाह बनता है।

वह देखता है एक युवती को उसके ही घर में उसके प्रेमी के साथ प्रेमालाप करते हुये जबकि युवती का पिता घर में ही दूसरे ही कमरे में मौजूद है। पिता अपनी पुत्री के प्रेमी को बिल्कुल भी पसंद करता है। फिल्म बड़ी दिलचस्प स्थितियाँ दिखाती है जब इमारत के लोग अंजान घुसपैठिये को ढ़ूँढ़ते हुये इस युवती के घर के बाहर जमा हो जाते हैं। युवती और उसका प्रेमी इस अंजान और तथाकथित चोर को लोगों के हवाले नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने से उनका राज भी खुल जायेगा।

ऐसी ही परिस्थितियों से अनाम व्यक्त्ति रुबरु होता रहता है और लोगों की कमजोरियाँ ही उसका बचाव भीड़ से करती रहती हैं। अनाम व्यक्त्ति की लुकाछिपी वाली यात्रा के दौरान बड़े दिलचस्प चरित्र उससे टकराते रहते हैं।

इन चरित्रों के द्वारा फिल्म लोगों की व्यवहारगत कमियों और बुराइयों पर कटाक्ष करती चलती है। जैसे कि एक महाश्य अपने पड़ोसी को चटखारे लेकर बताते हैं कि इमारत में रहने वाले फलाने व्यक्ति की पुत्री का इश्क इमारत में ही रहने वाले एक युवा से चल रहा है। कुछ समय बाद परिस्थितियाँ कुछ ऐसी बन जाती हैं कि उनका पड़ोसी समझता है कि इन महाश्य की पत्नी का भी कोई अन्य आशिक है।

लोगों की दूसरों के जीवन में बिना मतलब दखल देने जैसी सामान्य बुराई पर भी फिल्म खूब फोकस करती है।

कम ही फिल्में इस तरह से लोगों के समूह को आइना दिखा पाती हैं जैसे जागते रहो दिखाती है।

एक ऐसे युवा (इफ्तिखार) हैं जिन्हे भीड़ का नेता बनने का शौक है। गैर कानूनी काम करने वाले ध्रमात्मा और सफेदपोश बने रहते हैं क्योंकि उन्हे कानूनी व्यवस्था पकड़ नहीं पायी और सामाजिक व्यवस्था उन्हे उनके धन के कारण सम्मान देती आ रही है।

फिल्म की बहुत बड़ी खूबी है कि परदे पर किरदार के रुप में कलाकार आते रहते हैं और अपना एक अलग प्रभाव छोड़ते जाते हैं चाहे वे प्रदीप कुमार हों, इफ्तिखार हों, कृष्ण धवन हों, नाना पालसीकर हों, राशिद खान हों या नीमो हों, सबने बड़े प्रभावी ढ़ंग से अपनी भूमिकायें निभाई हैं।

नीमो की परदे पर उपस्थिति में क्या कहा जाये? अगर सत्यजीत रे हिन्दी में पारस पत्थर जैसी फिल्में बनाते तो उन्हे नीमो से अच्छा कलाकार नहीं मिल सकता था। विशाल काया पर विराजमान उतना ही विशाल चेहरा और उस चेहरे पर चालाकी भरे विशाल नेत्र जब बातें करते हुये गोलाई में घूमते हैं तो पता चलता है कि एक कुटिल पर मीठी वाणी बोलने वाले चरित्र को निभाने में कैसी महारत हासिल थी उन्हे। पहले श्री चार सौ बीस और बाद में जागते रहो में ऐसे चरित्र को निभाने में अपने उत्कृष्ट अभिनय से वे एक मानक स्थापित कर गये हैं

मोतीलाल तो खैर अभिनय जगत के एक ऐसे पारस हैं जो किसी भी फिल्म को सोने जैसी बना डालते हैं। ज़िंदगी ख्वाब है गाते हुये वे नशे में लड़खड़ाते हुये परदे पर आते हैं और अपना जादू फैलाना शुरु कर देते हैं।

मोतीलाल द्वारा शराबे के नशे में धुत व्यक्त्ति का अभिनय और नशे में ही ड्रम को आदमी समझ कर बातें करने वाले दृष्य और नशे में ही राज कपूर को अपनी पत्नी समझ कर लोशा लोशा गाना गाने और नाचने के दृष्य देख ऐसे दृष्य करने के महारथी दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन को भी रश्क हुआ होगा कि मोतीलाल ने कितनी सहजता से इन दृष्यों को अपनी अनूठी अभिनय प्रतिभा से जीवंत कर दिया है।

राज कपूर में भूमिका और कथानक की गहराई समझने की बुद्धिमत्ता कूट कूट कर भरी थी तभी उन्होने न सिर्फ इस अनूठी फिल्म में काम किया बल्कि इसे अपने बैनर आर के बैनर तले निर्मित भी किया और निर्देशन की भूमिका सौंपी इप्टा के शम्भू और अमित मित्रा को। कुछ देर बाद ही इसे याद रख पाना मुश्किल हो जाता है कि परदे पर राज कपूर कहीं मौजूद भी हैं। मुश्किल से दो संवाद पाने वाली यह भूमिका उनके अभिनय जीवन की अविस्मरणीय भूमिका है। और यह उनके अभिनय के लिहाज से अविस्मरणीय नहीं कही जायेगी पर उनके परदे पर उपस्थित रहने की वजह से। कुछ दृष्य़ों में लगेगा कि वे नाटकीय हो रहे हैं और ऐसा तो वे और फिल्मों में काम करते समय नहीं करते हैं पर जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है राज कपूर खो जाते हैं और मुसीबत का मारा वह अनाम गरीब चरित्र परदे पर रह जाता है जिसके सामने परेशानियाँ आती रहती हैं और जो अंजाने में ही उस इमारत में रह रहे लोगों और अपराधियों के भेद खोलता चला जाता है।

कितने ही पूर्वाग्रह कोई राज कपूर के इस फिल्म में प्रदर्शन से रख ले पर ऐसा दर्शक ढूँढ़ना मुश्किल हो जायेगा जो एक दृष्य में राज कपूर को देख कर ठहाके मार कर न हँसने लगे और इस बहाने उनके पहले के दृष्यों को भी स्वीकार न करने लगे। दृष्य है- राज कपूर इमारत में बहुत जगहों से छिपते छिपाते भाग कर सिखों के एक समूह में सिख बन कर ही मिल जाते हैं और उन्हे भी इमारत की सुरक्षा की जिम्मेदारी में लगा दिया जाता है और उनका साथी सिख उनसे नाम आदि की जानकारी माँगता है और राज कपूर बस खीसे निपोरते रहते हैं और उनकी हरकतें देख कर पता ही नहीं चलता कब दर्शक के अंदर से हँसी लावा बन कर फूट पड़ती है।

अंत तक आते आते राज कपूर स्वीकृत हो जाते हैं और बाद में तो लगता है कि और अभिनेताओं के लिये किसी अन्य ढ़ंग से इस चरित्र को निभाना बड़ा कठिन हो जायेगा। हिंदी सिनेमा के बहुत कम अभिनेता इस चरित्र की ऐसी व्याख्या कर सकते हैं अपने विविधता भरे अभिनय कौशल के आधार पर कि उनके द्वारा निभाया गया चरित्र राज कपूर द्वारा निभाये चरित्र से अलग लगे।

कुछ दर्शकों को शायद पैसिव लगें राज कपूर। कॉमिक टच से अलग चरित्र के स्तर पर देखें तो एक गुमनाम गरीब आदमी, जो इमारत में लोगों की निगाहों से अपने को छिपाने की कोशिश कर रहा है, ऐसे में एक्टिव होने की कितनी गुंजाइश हो सकती है?

यह ऐसी फिल्म है  जिसमें फिल्म का अंत आने पर ही राज कपूर के अभिनय प्रदर्शन की कड़ियाँ जुड़ पाती हैं। जहाँ दर्द बयाँ करने का क्षण आता है वहाँ राज कपूर केवल आँखों से ही संदेश संप्रेषित कर देते हैं। जागो मोहन प्यारे जागो गीत में सारे समय वे भावनाओं की अभिव्यक्ति में ही अपनी पारंगता दिखा रहे हैं। उससे पहले भी बहुत सारे क्षण हैं जो उन्ही के हैं।

पचास के दशक में उस समय उनकी एक छवि थी। एक स्टाइल था अभिनय करने का और उन्होने और निर्देशक जोड़ी ने कुछ उस छवि से मिलता जुलता और कुछ उससे एकदम अलग किस्म का प्रदर्शन लेकर एक अच्छा मिश्रण तैयार किया।

नायक की भूमिकायें निभाने वाले सितारा अभिनेताओं के लिये बहुत मुश्किल रहेगा ऐसा पात्र निभाना। आज भी रिमेक बने तो पंकज कपूर के अलावा अन्य अभिनेता दिखायी नहीं देता जो इस भूमिका को नये अंदाज में जीवंत कर सके। कुछ कॉमिक साइड में ज्यादा चले जायेंगे और कुछ अतिनाटकीयता में। मनोविज्ञान के स्तर पर आसान नहीं है इस चरित्र को निभाना।

कभी प्रेमचंद ने अपनी किसी कृति में लिखा था – भय की चरम सीमा ही साहस/(दुस्साहस) है – और जागते रहो में इस कथन को साक्षात रुप से घटते हुये देखा जा सकता है। लोगों से बचते बचाते, भागते दौड़ते राज कपूर थक जाते हैं, पहले वे नीमो के गुण्डों के हाथ पड़ जाने से डर के मारे वे सब काम करने को तैयार हो जाते हैं जो नीमो उन्हे कहते हैं। नीमो को अपनी खाल बचाने के लिये और दुनिया के सामने अपने को सफेद्पोश बनाये रखने के लिये एक मुर्गा चाहिये जो उन्हे इमारत में अनाम घुसपैठिये चोर के रुप में कुख्यात हो चुके राज कपूर में दिखायी दे जाता है। वे अपने सारे काले धंधों की कालिख इस व्यक्त्ति पर पोत कर खुद को पाक दामन सिद्ध कर सकते हैं। वे नकली नोट बनाने वाले फर्मे और बहुत सारे नकली नोट राज कपूर के शरीर के साथ बाँधकर उन्हे खिड़की से बाहर जाकर पाइप के सहारे नीचे जाने के लिये विवश कर देते हैं। भीड़ राज कपूर को देख लेती है और उन पर पत्थरों की बरसात हो जाती है। डर कर राज कपूर छत पर चढ़ जाते हैं जहाँ भीड़ उन्हे घेर लेती है, नीमो के आदेशानुसार उनके गुण्डे भी राज कपूर को मारने के लिये पहुँच जाते हैं क्योंकि राज कपूर का जिंदा रहना उन लोगों के जीवन के लिये खतरनाक साबित होगा।

भीड़ से घिरे अकेले निहत्थे खड़े राज कपूर के चारों तरफ मौत खड़ी है। एक अनाम चोर और अपराधी के रुप में मरना इस देहाती को मंजूर नहीं है और उनमें कहीं से आकर साहस का संचार हो जाता है वे पास पड़ी लाठी उठा कर भीड़ को ललकारते हैं। राज कपूर का मोनोलॉग फिल्म की रीढ़ की हडडी है। वे बताते हैं भीड़ को कि पानी की तलाश में उन्हे इस इमारत में आना पड़ा और उन्होने यहाँ रहने वाले सफेदपोशों के काले कारनामे देखे। वे एक किसान के बेटे हैं जो काम की तलाश में शहर आये हैं न कि कोई चोर। उनके संवाद देश को रसातल में गिरने से बचाने के लिये एक चेतावनी हैं पर भीड़ ने किसकी सुनी है? वहाँ से भी उन्हे भागना पड़ता है।
रोचक बात यह है कि फिल्म की शुरुआत में ही प्यासे राज कपूर को एक पुलिस वाले की वजह से डरकर उस इमारत में दाखिल होना पड़ता है पर वहाँ लोग उन्हे चोर समझ बैठते हैं और भाग-दौड़ में वे मौका आने पर भी पानी नहीं पी पाते।jagteraho1

नरगिस को एक विशेष भूमिका में रखा गया है। वे अंतिम दृश्य में प्यासे राज कपूर को पानी पिलाती हैं।

हालाँकि जागो मोहन प्यारे जागो गीत के साथ साथ फिल्म खत्म हो जाती है और इस गीत के साथ साथ एक आशावाद फैलाने का प्रयास फिल्म करती है। परंतु पचास साल से लम्बे अरसे बाद पुनरावलोकन करने और विश्लेषण करने पर एक निराशावाद घर कर लेता है।

तब भीड़ से भागते राज कपूर को एक बच्चे (डेज़ी ईरानी) के घर में घुसना पड़ता है और वह भी पहले अजनबी को चोर ही समझता है पर राज कपूर उस बच्चे के सामने टूट जाते हैं और रोकर कहते हैं कि वे चोर नहीं हैं। मासूम बच्चा उन पर विश्वास करता है। जब सब तरफ भ्रष्टाचार का अंधेरा फैल जाये तो नयी पीढ़ी के बच्चों के नये अस्तित्व से और उनकी शुद्ध उपस्थिति से ही कुछ आशा बंध सकती है। रोशनी तो उसी तरफ से आ सकती है।

रुपक के रुप में इस कड़ी को जोड़ें तो इस बच्चे का जन्म तब का माना जा सकता है जब भारत में संविधान लागू हुआ या इसका जन्म हुआ। उस साल जन्मी पीढ़ी का प्रतिनिधि बच्चा सन 1956 में उस कृषक के बेटे राज कपूर से मासूमियत से कहता है,” डरते हो… पर क्यों,… तुमने तो कुछ नहीं किया“? मासूमियत भरा विश्वास टूटे राज कपूर में बल का संचार करता है।jagte raho 2

परंतु सन 2010 में वह पीढ़ी सेवानिवृत हो गयी जिसके प्रतिनिधि ने बचपन में एक मासूम आशावाद का उदघोष किया था। यथार्थ के धरातल पर देखा जाये तो क्या वह पीढ़ी बड़े होकर उतनी ही मासूम और ईमानदार रह पायी? या जैसा कि राज कपूर ने भीड़ के सामने हताशावस्था में चिल्लाकर कहा था-

इस छिपे रुप से काले धंधे करने वाली भीड़ ने उन्हे भी चोर समझा पर गाँव से आये इस देहाती को उन्होने समझा दिया है कि यहाँ शहर में बड़ा आदमी बनना है तो काले काम करना सीखो, तो वह भी इस भीड़चाल को अपनाकर दिखायेंगे,

– यह पीढ़ी भी बड़े होकर भ्रष्टाचार के सामने घुटने टेक गयी और एक अपने और अपने परिवार की समृद्धि के लिये एक भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन कर भ्रष्टाचार को ही पालती पोसती रही? फिल्म वाले राज कपूर और उनकी पीढ़ी के कुछ लोग तो शायद आदर्शवाद की चमकती रोशनी में ईमानदारी को कायम रख पाये होंगे पर उस बच्चे की पीढ़ी का क्या हुआ?

पिछले साठ सालों में बेतहाशा बढ़ा हुआ हर तरह का भ्रष्टाचार क्या कहता है? फिल्म में तो राज कपूर जीते नहीं तो हारे भी नहीं और नीमो आदि को पुलिस ले गयी पर वास्तविक जीवन में क्या मासूम अच्छाई बची रह पायी? नीमो आदि क्या खत्म हो गये हैं या कई गुना शक्त्ति पाकर समाज पर अब शासन करने लगे हैं?

ऐसे निराशाजनक माहौल में फैज़ का कलाम याद आता है।

ये दाग दाग उजाला, ये शब-गजीदा सहर
वो इंतजार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं,
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरजू लेकर
चले थे यार के मिल जायेगी कहीं न कहीं
फलक के दश्त में तारों की आखिरी मंजिल
कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल
कहीं तो जाके रुकेगा सफीना-ए-ग़म-ए-दिल

परंतु यह संभावना तो है ही कि सन पचास में जन्मी उस पीढ़ी के कुछ लोग अपनी ईमानदारी बचा कर रख पाये। देश में, समाज में अगर भ्रष्टाचार हद दर्जे को पार कर गया है तब भी कहीं धीमी ही सही पर ईमानदारी की लौ जलती तो रही ही है, वरना तो यह शब्द भी गाली बन गया होता। पर इस शब्द- ईमानदारी, में अभी भी जान बाकी है। इस शब्द की गरिमा बरकरार है।

एक रात में बीती घटनाओं पर आधारित फिल्म की कथा एक आधुनिक कहानी लगती है और राधू कर्माकर के कैमरे ने स्टाइलिश अंदाज में इमारत में चल रही उथल पुथल को पकड़ा है।

सलिल चौधरी का इस फिल्म में दिया गया संगीत तो बरसों से सिनेमा और संगीत प्रेमियों को लुभाता आ ही रहा है।

…[राकेश]

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