बचपन में एक कथा सुनी थी, बहुतों ने सुनी होगी, दादी-नानी किस्म की कहानी परम्परा वाली|
बहुत समय पहले की बात है, शताब्दियों पहले की| तब इंसान का पेट बंद नहीं होता था और उस पर एक ढक्कन किस्म का आवरण रहता था जिसे हटा कर अंदर देखा जा सकता था|
एक युवक का विवाह हुआ और नव-दम्पति खुशी से जीवन व्यतीत करने लगे| युवक किसान था और सुबह ही खाना लेकर खेत चला जाया करता था और दिन ढले घर लौटता| किसान के घर लौटने के बाद दोनों पति पत्नी हँसी खुशी बातें करके समय व्यतीत करते, एक दूसरे से कुछ भी न छिपाने की कसमें खाते और सब कुछ साझा करते| किसान मेहनती था पर दुर्भाग्य से उस बरस बारिश अच्छी नहीं हुयी और वह कुछ चिंताग्रस्त हो गया| अब उनके जीवन पर तनाव ने डेरा डाल दिया| घर पर उसकी पत्नी की उससे कहा सुनी भी हो जाती| वह ध्यान देने लगा कि उसकी पत्नी बस रखा सूखा बना कर उसके सामने परोस देती और खाने के नाम पर खानापूर्ति करती|
एक रोज वह खेत से दुपहर को ही वापिस आ गया| उसे लगा कि शायद उसकी पत्नी सो रही होगी पर घर में घुसने से पहले उसे सुगंध आई तो उसे लगा कि पत्नी शायद उसके लिए कोई अच्छा पकवान पका रही है| उसने ध्यान से सूंघा तो उसे लगा कि पत्नी ने हलवा बनाया है| भूख उसे लगी हुयी ही थी और हलवे की सुगंध ने उसकी भूख और भडका दी|घर जाकर स्नान कर्क्जे वह खाना खाने बैठा अतो पाया कि पत्नी ने रोज की तरह रखा सूखा भोजन उसके सामने परोस दिया| किसान ने चुपचाप खाना खा लिया उसे लगा कि शायद भोजन के बाद उसकी पत्नी उसे हलवा परोसेगी, पर वह खाना खाकर उठ भी गया पर उसकी पत्नी ने उसे हलवा नहीं खिलाया| किसान को बहुत बुरा लगा पर वह चुपचाप कमरे में जाकर लेट गया| अब उसे अपनी पत्नी पर शक होने लगा कि वह उसे तो रखा सूखा भोजन खिलाती है पर खुद पकवान बना बना कर खाती रहती है|
एक अन्य दिन वह फिर से जल्दी घर लौट आया तो पाया कि घर से खीर बनने की खुशबू आ रही थी| वह घर के बाहर ही रुक गया और कुछ इंतजार करके घर गया| रोज की तरह उसकी पत्नी ने साधारण भोजन उसके सामने परोस दिया| किसान खाना खाकर चारपाई पर लेट गया| कुछ देर बाद उसने पत्नी से पूछा कि क्या वह खाना खा चुकी है, उसकी पत्नी ने कहा कि आज उसकी तबियत ढीली थी सो उसने खाना नहीं ने खाया| किसान को आश्चर्य हुआ कि उसकी पत्नी ने खाना नहीं खाया क्योंकि वह खुद महसूस कर चुका था कि उसकी पत्नी ने खीर बनायी थी| उसे बहुत गुस्सा आया और उसने अपनी पत्नी को अपने पास बैठाकर कहा,” आज किसी ने खीर भेजी थी क्या, सुगंध सी आ रही है|”
उसकी पत्नी ने एकदम से इंकार किया और कहा कि उसने तो खीर के दर्शन भी लगभग एक साल से नहीं किये|
किसान का धैर्य टूट गया और उसने पत्नी से कहा कि वह उसके पीछे पकवान बना बना खाती है और उसके लिए रुखा सूखा पकाती है| पत्नी हक्की बक्की रह गई और रोकर उसने कहा कि किसान के आरोप एकदम झूठ हैं|
किसान ने उससे कहा कि वह उसका पेट जांचेगा| अभी पता चल जायेगा उसने आज कुछ खाया है या नहीं और खाया है तो क्या खाया है|
किसान की पत्नी ने बहुत आनाकानी की पर वह किसान को रोक नहीं पाई| किसान ने उसके पेट की जांच की पाया कि पत्नी ने थोड़ी देर पहले ही खीर खाई थी| किसान गुस्से से पागल हो गया| उसने पत्नी के ऊपर हमला कर दिया| इस अचानक हमले से उसकी पत्नी संभल नहीं पाई और पास पड़े खेती के किसी नुकीली यंत्र के ऊपर गिर कर जख्मी हो गई| पत्नी को गंभीर रूप से घायल देख किसान का गुस्सा शांत हुआ पर जख्म गहरा था और कुछ समय पश्चात ही उसकी पत्नी की मृत्यु हो गया| शोकग्रस्त किसान पछतावा करने लगा कि उसे क्यों इतना गुस्सा आया, अगर उसकी पत्नी ने झूठ बोला भी था तो वह उसे पहले की तरह माफ कर सकता था|
पश्चाताप में वह ईश्वर से पार्थना करने लगा और उसे लगा कि अगर उसे यह पता न चलता कि पत्नी ने असल में क्या खाया था तो वह हिंसक न होता पत्नी के ऊपर| उसने ईश्वर से पार्थना की कि इंसान के पेट को बंद कर दे| और तब से इंसान का पेट बंद हो गया|
कथा विचित्र है, कोई सिर पैर भी नहीं है पर इतना अर्थ उसमें है ही कि बहुत बार अगर ऐसा जां लिया जाए कि सामने वाला इंसान क्या सोच रहा है तो बहुत से रिश्ते वहीं टूट जाएँ|
इसे विडंबना ही कहा जायेगा कि इंसानी रिश्तों में झूठ बोलना. भले ही कारण कुछ भी हो, या कम से कम उस वक्त्त सही बात न बोलना या सही बात को छिपा जाना आदि का बड़ा महत्व बन गया है| तुर्रा तो यह है कि लोग रिश्तों में सच्चाई सुनना भी पसंद नहीं करते| ऐसा प्राय: देखा गया है कि मीठी बातें करके तारीफ़ के पुल बाँधने वाले, भले ही वे झूठी प्रशंसा कर रहे हों, लोगों को नजदीकी बनने में बहुत सहूलियत होती है, उन लोगों के बजाय जो कि सच बोल देते हैं| सामने ही सच बोल देने वाले को अक्खड़, कम तहजीब वाला और खड़ी बुद्धि वाला इंसान माना जाता है|
दूसरे के मन को पढ़ लेने की तमन्ना रखना इंसानी फितरत है| सामान्यतः हर आदमी चाहता है कि दूसरे के दिमाग को पढ़ ले कि वेह वास्तव में क्या सोच रहा है|
और रिश्तों में थोड़ा भी उतार-चढ़ाव आ जाए तो व्यक्ति ऐसी ख्वाहिश से दो चार होने लगता है कि काश उसे पता चल जाए उसके साथ रिश्ते में बंधा व्यक्ति इस रिश्ते, उसके बारे में क्या सोच रहा है और जब वह उसके साथ नहीं है तब क्या कर रहा है| उस अंजान को जान पाने की चाह बेहद तीव्र होती जाती है जैसे जैसे रिश्ते में दरार आती जाती है| इसी चाह से संदेह पनपता है और रिश्ते में कड़वाहट भरने की शुरुआत भी यहीं से होती है|
रितुपर्णों घोष ने अपनी फिल्म Sunglass में एक ऐसी घरेलू युवती का जीवन दिखाया है जो कि अपने वैवाहिक जीवन में स्थापित है, वह अपने पति पर पूरा विश्वास करती है और अपने तकरीबन बोर हो चुके जीवन में हर उस बात पर विश्वास करती है जो उसका पति उससे कहता है| रितुपर्णों ने पूरी फिल्म में हर घटना के इर्द-गिर्द हास्य का पुट डालकर फिल्म को हल्का- फुल्का अंदाज प्रदान करने की चेष्टा की है और वे इसमें सफल भी हुये हैं|
पांच साल के लगभग उनके विवाह को हो गये हैं और अभी तक कोई संतान उनके यहाँ नहीं हुयी है|
एक ही ढर्रे पर चले रहे ऊब से भरे उसके जीवन में परिवर्तन आता है जब उसका पति उसे एक वन में एक हफ्ते की छुट्टी पर ले जाने की बात करता है, पर जब शाम को वह अगले दिन जाने की तैयारी कर रही होती है तब वह ऐसी दफ्तर के किसी बेहद जरूरी प्रोजेक्ट का नाम लेकर उसे ही विवश कर देता है कि वह खुद ही छुट्टी पर जाने के लिए मना कर दे| पति पर पूरा भरोसा करने वाली पत्नी अपने भोलेपन में ऐसा ही करती है|
कुछ दिनों बाद पति फिर से उसे छुट्टी पर ले जाने की बात करके तैयारी करने के लिए कहता है| वह खुशी खुशी फिर से तैयारी करती है और दूरबीन खरीदने के लिए पुराना, दुर्लभ और पुरातन सामान बेचने वाली दुकान पर जाती है और वहाँ दूरबीन खरीदने के साथ दुकानदार उसे धूप का चश्मा भी देने का प्रस्ताव देता है बशर्ते कि वह दूरबीन के लिए कोई मोलभाव न करे|
वह धूप का चश्मा ले आती है, कुछ दिन पहले ही वह अपना धूप का चश्मा टैक्सी में भूल आई थी और उसे जरुरत थी नये धूप के चश्मे की| टैक्सी से घर लौटते हुए रास्ते में वह उत्सुकतावश धूप का चश्मा आँखों पर लगा लेती है और लगाते ही उसे अजीब से दृश्य दिखाई देने शुरू हो जाते हैं| वह चश्मा उतार कर दुबारा देखती है तो पाती है कि वह टैक्सी ड्राइवर को खाना बनाते देख रही है पर वह अपने घर में है, जबकि अभी वह टैक्सी चला रहा है| वह देखती है कि ड्राइवर के घर में नमक नहीं है, वह टैक्सी चला रहे ड्राइवर से कहती है कि नमक खत्म हो गया घर में? हैरान टैक्सी वाला पूछता है कि उसे कैसे पता चला? वह अपने बैग से उसे नमक का पैकेट देकर टैक्सी रुकवा कर चली जाती है|
उसे पता चल जाता है कि चश्मा पहनने से किसी भी व्यक्ति को देखने से वह उस व्यक्ति के दिमाग में क्या चल रहा है यह जान सकती है|
बस अब तो उत्सुकता से उसका सारा जीवन ही बदल जाता है वह दूसरों के दिमागों को चश्मे की सहायता से खंगालना शुरू कर देती है|
किसी भी रिश्ते में दोनों लोग कोई हर समय तो साथ रहते नहीं हैं, उनके जीवन के अलग अलग पहलू भी होते हैं| और दोनों के ही दिमाग में ऐसे विचार आ सकते हैं कि जाना जाए जब वे साथ नहीं थे तो दूसरे ने क्या किया?
रिश्ते की गर्माहट भी निर्धारित करती है बहुत सी बातें| और कितना रिश्ते को महत्त्व दिया जाता है इस पर भी निर्भर है बहुत कुछ| जो आदमी व्यक्ति को ही नहीं बल्कि उससे अपने रिश्ते को भे प्यार करता है वह शायद ऐसा कुछ करने और जानने में भय को महसूस करेगा जिसके बारे में उसे आभास हो कि यह उन दोनों के रिश्ते को प्रभावित कर सकता है|
युवती बहुतों पर चश्मे का प्रयोग करती है पर अपने पति पर उसका प्रयोग वह कॉफी बच बच कर करती है और जिसका उसे भय था, वही होता है चश्मा उसे ऐसा कुछ दिखा जाता है जिससे उसे पति के साथ अपने रिश्ते की बुनियाद हिलती हुयी दिखाई देती है|
उसका जीवन उलट-पुलट हो जाता है, वह दोस्तों के दिमाग में चल रही बात जां जाते है जो उसके उन लोगों से रिश्ते को प्रभावित करने लगती हैं उसे आभास हो जाता है कि कोई भी सच्चा नहीं है|
उथल-पुथल भरे वैवाहिक जीवन में एक दिन साहस करके अपने पति के सामने सारा भेड़ खोल देती है कि उसे पता है वह घर से बाहर की जिंदगी में क्या खिचड़ी पका रहा है|
अब आगे दोनों को मिल कर तय करना है उन्हें अपने साझा जीवन के बारे में क्या करना है और इस चमत्कारी चश्मे का क्या करना है|
रिश्तों में कहीं न कहीं विश्वास और रिश्ते से प्यार होना बेहद जरूरी है| अगर रिश्ते महत्त्व रखता है तो बहुत बड़ी गलतियां भी इंसान ऐसे लेगा जैसे वह अपने बच्चों की गलतियां लेता है|
रिश्तों में कई बार बात को जान लेना खतरनाक हो जाता है पर अगर जान लेने के बाद रिश्ता जुड़ा रहता है तो यह मजबूती पकड़ लेता है| उतार-चढावों से पार जाकर ही रिश्ता मजबूती पकडता है| उससे पहले तो जानकारी के अभाव वाला विश्वास रहता है जो भोला विश्वास है, परिपक्व विश्वास तो सब जान लेने के बाद पक्के विचारों के उत्पन्न होने के बाद ही पनपता है|
रितुपर्णों घोष ने पति-पत्नी और अन्य रिश्तों में मची उथल-पुथल के बारे में बड़े हल्के-फुल्के अंदाज वाली हास्य फिल्म बनाई है|
कोंकणा सेन ने युवती की भूमिका को बेहद आकर्षक ढंग से निभाया है और युवती के पति की भूमिका में माधवन भी फबते हैं|
छोती भूमिकाओं में , दुर्लभ सामान बेचने वाले दूकानदार की भूमिका में नसीरुद्दीन शाह ने समां बाँध दिया है| उनका हरेक हाव-भाव, और उनकी शारीरिक भंगिमा, संवाद बोलते हुए आवाज के उतार चढ़ाव सभी उनके महान अभिनेता होने की गवाही देते हैं|उन्होंने पहली ही बार रितुपर्णों के साथ काम किया और पहली ही बार उनकी फिल्म में बाकी अभिनेताओं से ज्यादा चमकदार सिक्का जमा कर दिखा दिया| युवती की माँ के रूप में जया बच्चन को को एक हास्य भूमिका में देखना सुखद है और उनके गुड्डी और मिली के दिनों के अभिनय की याद दिलाता है|
शतरंज के खेल में या प्रतिस्पर्धा में या दुश्मनी में सामने वाले का दिमाग पढ़ लिया जाए तो और बात है पर अच्छे रिश्तों में सामने वाले अपने प्रियका दिमाग पढ़ लेना दुधारी तलवार पर चलने जैसा है… | रिश्तों में मन को जान लेने की इसी ऊहापोह
को रितुपर्णों घोष ने एक मनोरंजक सिनेमाई रूप दे दिया है|
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