राधिका : सुनंदा मौसी, प्लीज अपनी शादी से पहले मेरे कॉलेज में कृष्ण नाटक करवा दो न| मैंने अपनी ड्रामा टीचर से कह दिया है कि वार्षिक उत्सव के लिए नाटक मैंने तैयार कर लिया है और बस अब अभ्यास की देर है| टीचर ने मुझसे नाटक की स्क्रिप्ट माँगी है| मौसी अब मेरी जान तुम्हारे हाथ में है|
सुनंदा – अरे, मुझसे पूछ तो लेती एक बार ऐसा वादा करने से पहले| कृष्ण लीला तो इतनी बड़ी है| 1-2 घंटे के नाटक में क्या दिखाना है, सब देखना पड़ता है|
राधिका – मौसी, ऐसे जैसे किसी को अ ब स ना भी पता हो कृष्ण लीला का, लेकिन हमारा नाटक देखकर उसे कृष्ण संसार में प्रवेश मिल जाए|
सुनंदा, घूर कर देखते हुए – वाह! जो आज्ञा मेरे स्वामी, आपकी इच्छा मेरा कर्तव्य है|
राधिका, सुनंदा के गले लगते हुए – मौसी मुझे बताओ जो करना हो, मैं सारी मेहनत करूंगी, आप बोलते जाओ मैं लिख दूंगी|
सुनंदा – मैडम, आप ऐसा कीजिये, वापिस जाइए अपने हॉस्टल, और मुझे कम से कम आज और कल का वक्त दीजिये| परसों दुपहर से पहले मुझे परेशान मत करना| मैं न मिलूं तो माँ को तुम्हारी स्क्रिप्ट दे जाउंगी, लेते जाना|
राधिका – ओह मौसी, आप न बस… आपकी सुसराल वाले देखना कैसा कृतज्ञ महसूस करेंगे ऐसी सुशील कन्या को अपने घर में पाकर|
सुनंदा, बाहर जाने का इशारा करते हुए – जाओगी?
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लगभग एक माह बाद, राधिका के कॉलेज का सभागार, जहां सुनंदा रचित नाटक “कृष्णलीला” का मंचन हो रहा है|
सूत्रधार :
“दुनिया युद्ध, नफरत, आतंकवाद, पर्यावरण के ह्रास और मानवता में गिरावट जैसे मुद्दों से विनाश की ओर अग्रसर है तो ऐसे में अवसाद से घिरी मानवता को बचाने के लिए कृष्ण को न याद करें तो किसे करें?
श्याम, कान्हा, कृष्ण…मनुष्य रुप में जन्मे विराटतम स्वरुप हैं वे जीवन के।
कृष्ण की कथा का रसास्वादन अदभुत है| क्या तो आनंद है बाल-गोपाल की कथा कहने में, सुनने में, और देखने में!
और थोड़े बड़े हो चुके कृष्ण की लीलाओं का वर्णन भी सदियों से मनुष्य को लुभाता आ रहा है|
सिर पर मोर मुकुट, गैया के पास थोड़े तिरछे खड़े, एक पैर पर दूसरा पैर रखे, बांसुरी बजाते कान्हा… वर्णन सुनने में हर बार लगता है जैसे गोकुल ही पहुँच गये हों… परम आनंद की अनुभूति होती है|
“कान वो कान है जिसने तेरी आवाज सुनी,
आँख वो आँख है जिसने तेरा जलवा देखा”
देखिये, अपने पिता महाराज उग्रसेन को राजगद्दी से उतारकर मथुरा का राजा बन बैठा अत्याचारी कंस अपनी चचेरी बहन देवकी को उसके विवाहोपरांत ससुराल पहुंचा कर आने के लिए अपने महल से निकल कर बाहर आया है| अरे ये कौन ऋषिगण हैं, जो इस वक्त कंस से बात करने आ पहुंचे हैं?
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एक ऋषि,” राजन, आपके सैनिकों ने वन प्रदेशों में आतंक मचा रखा है, वे तपस्वियों की साधना भंग करते हैं| कई गुरुकुलों को तहस नहस कर चुके हैं| आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की कन्याओं को ही नहीं वरन अब तो ऋषि कन्याओं को भी उठा लेने का दुस्साहस कर रहे हैं|”
कंस ने कहा,” ऋषि बेकार की बातें मत करो| मेरे सैनिक वीर हैं और उनकी वीरता पर मुग्ध होकर वन प्रदेशों की कन्याएं स्वयं ही उनके साथ चली जाती होंगी| और मेरे राज्य की सीमाओं के अंदर रहने वाले सभी लोग, चाहे वे तपस्वी हे क्यों न हों, मेरे अधीन हैं, अगर वे मेरे सैनिकों को कर नहीं देंगे, उनका कहना नहीं मानेंगे तो मेरे सैनिक उन्हें दंड देंगे ही|”
देवर्षि नारद वहां पधारते हुए, ” “राजन, सत्ता का इतना अहं ठीक नहीं किसी राजा के लिए”|
कंस – “” देवर्षि आप इस मामले में न पड़ें| सुनो ऋषि, अभी मैं अपनी बहन को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा हूँ| किसी और दिन आना अपनी बात कहने| मेरे सैनिकों के विपरीत बातें करके उनकी छवि बिगाड़ने का प्रयास ना करो| जाकर तपस्वियों को समझाओ कि मेरे सैनिकों से न उलझें और वीर हमेशा ही धरती पर हर सुख को भोगते हैं| उन्हें कोई कन्या पसंद आयेगी तो वे उसे पाने का प्रयास करेंगे ही| आप लोगों में साहस हो तो उनसे लड़ो और पराजित करो उन्हें और अपनी कन्याओं की रक्षा कर लो| अब मेरा मार्ग छोड़ो”
कंस स्वयं ही रथ को हांकने बैठ गया| रथ के चलने की आवाज और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाजों के शोर के मध्य बादलों की गर्जना सुनाई देती है…
देवर्षि नारद हँसते हुए,” “हे कंस, तुझे भविष्य नहीं दिखाई दे रहा! तेरा अहंकार तुझे ले डूबेगा| ऋषियों का अपमान करता है मूर्ख राजा| तुझे ये भी नहीं पता कि जिस बहन के प्रति तू इतना लाड़ दिखा रहा है, इसकी ही आठ संतानों में से एक संतान – एक पुत्र, ही तेरे काल का कारण बनेगी”
कंस क्रोध में चीखते हुए,” नारद, अपनी वाणी पर संयम रखो और मेरी आँखों के सामने से दूर चले जाओ| मुझे मार सकने वाला कोई जन्म नहीं ले सकता इस धरा पर|”
नारद हँसते हुए चले जाते हैं| उनके पीछे अन्य ऋषिगण भी चले जाते हैं|
कंस कुछ सोच में पड़ जाता है और कुछ पल पश्चात गरज कर कहता है,” देवकी, रथ से नीचे उतर, तूने नारद की वाणी सुनी| मुझे, तुम दोनों, तुझे और तेरे पति वसुदेव , को मारना ही पड़ेगा, मैं जोखिम नहीं उठा सकता|”
देवकी रोने लगती है “भईया…”
वसुदेव याचना करते हुए कहता है,” महाराज, आप शक्तिशाली हैं, आपको ज्ञात ही है- आपको हमारी संतान से ख़तरा बताया गया है, आपकी बहन देवकी से तो आपको कोई जोखिम नहीं| उसे मारकर अपनी नवविवाहिता बहन को मारने का पाप आप क्यों अपने सिर लेते हैं| जब भी हमारे संतान होगी मैं स्वयं उसे लेकर आपके सामने उपस्थित हो जाउंगा|
कंस चेतावनी देता है,” देवकी, वसुदेव मुझसे कपट करने का प्रयास कदापि न करना, आज मैं तुम्हे जीवित छोड़े दे रहा हूँ| पर अब से तुम दोनों मथुरा में ही मेरे सैनिकों की देख रेख में रहोगे|”
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सूत्रधार :
अत्याचारी कंस ने अपनी बहन देवकी की छह संतानों को उनके जन्म लेते ही मार दिया| किसी तरह से देवकी और वसुदेव कंस से देवकी के सातवीं बार गर्भधारण होने की बात छिपाने में सफल रहे और वसुदेव द्वारा गोकुल में रहने वाले अपने एक रिश्तेदार के यहाँ सामाजिक कार्य में सम्मिलित होने हेतु अनुरोध करने पर कंस ने सैनिकों की देखरेख में पति-पत्नी को गोकुल जाने दिया| गोकुल में देवकी का गर्भ, कंस के भय से गोकुल में ही अज्ञातवास में रह रही वसुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ में प्रत्यारोपित कर दिया गया| वापिस मथुरा आकर देवकी ने फिर से गर्भवती होने और शिशु के गर्भ में ही मृत हो जाने की बात उड़ा दी| देवकी की आठवीं संतान के समय कंस कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था अतः उसने देवकी और वसुदेव को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के घेरे में गृह बंदी बना दिया जिसमें उनके आवास के अन्दर और बाहर सुरक्षा प्रहरी प्रत्येक समय खड़े रहते| कंस की लिखित अनुमति के बाद ही कोई देवकी और वसुदेव से मिल सकता था|
(शेष …)
….[राकेश]
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