पार्थो घोष ने 1993 में एक फ़िल्म बनाई थी –दलाल, जिसका विलेन जगन्नाथ त्रिपाठी (राज बब्बर) गर्व से कहता था कि वह चमड़ी बेचकर दमड़ी कमाता है|
वह स्त्रियों को वेश्यावृत्ति में धकेलकर उनके माध्यम से पैसे कमाता था| जगन्नाथ, जागीरा भी हो सकता है/था और जिम्मी भी और जावेद भी | फ़िल्म है परदे पर सब चलता रहा है, वह एक खलनायकी चरित्र है, जो स्त्री शोषण से अपनी आजीविका कमाता है| उसे जगन्नाथ त्रिपाठी नाम दिया गया, निर्देशक और फ़िल्म के लेखक द्वारा, क्या त्रिपाठी जातिसूचक पारिवारिक नाम अपने नाम के पीछे लगाने वाले ब्राह्मणों ने ऐसा आन्दोलन किया कि दलाल फ़िल्म उनके विरुद्ध प्रोपेगंडा है?
अमर प्रेम में शर्मीला टैगोर के चरित्र का उसके दूर के चाचा ने ही रेप किया और उसे कोठे पर बेच दिया|
बाज़ार मुस्लिम किरदारों की फ़िल्म थी जिसमें अमीर मुस्लिम किरदार ही गरीब मुस्लिम लड़कियों की खरीद फरोख्त करते हैं|
उमराव जान में नाबालिग लडकी अमीरन को उसके पिता के दुश्मन (एक मुस्लिम व्यक्ति) ने कोठे पर बेच दिया|
पाकीज़ा में लड़कियों को कोठे पर लाने वाले मुस्लिम किरदार ही हैं और उन्हें ट्रेनिंग देने वाली मुस्लिम स्त्रियाँ |
ऐसी तमाम फिल्में मिल जायेंगीं जहां लड़कियों को अपने जाल में फंसा कर जिस्मफरोशी के धंधे में डालते हुए दिखाया गया| अक्सर प्रेम जाल में फंसाकर भी ऐसा दिखाया जाता रहा है, और वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता ही रहता है|
मातृभूमि जैसी फ़िल्म भी आई जहां कन्या भ्रूण ह्त्या के दुष्परिणाम के तौर पर स्त्री-पुरुष अनुपात बिगड़ने से एक पुरुष संग विवाह करके लाई लगभग नाबालिग लड़की को ससुराल पहुँच कर पता लगता है कि यहाँ उसके पति, जेठों , देवरों सहित उसके ससुर के लिए भी वह एक सैक्स स्लेव है|
इतिहास गवाही देता है कि चंद सभ्यताओं को छोड़कर जिन्होंने विस्तारवादी नीतियाँ नहीं अपनायीं और युद्ध में भी विपक्षी स्त्रियों का सम्मान बनाए रखा, ज्यादातर आक्रान्ताओं ने युद्ध में जीत के बाद हारे पक्ष की स्त्रियों पर भी अपनी शक्ति दिखाई और उनका मान सम्मान अपने अहंकार और यौन पिपासा तले रौंद डाला|
स्त्रियों पर पूर्ण नियंत्रण के लिए उनके हुजूम के हुजूम अपने महलों में रखे तो जाते थे लेकिन कोई अन्य पुरुष इन स्त्रियों से मेल मिलाप न बढ़ा ले इसलिए हरम में सेवा और सुरक्षा हेतु केवल स्त्रियाँ और तीसरे जेंडर के प्रतिनिधि ही रखे जाते थे|
यूरोप में कई देशों में ऐसा मिल जायेगा कि पुराने दौर में जब उनकी सेनायें दूसरे देशों पर आक्रमण करने जाती थीं, तो समुद्री मार्ग में बंदरगाहों के पास वेश्यालय भी स्थापित किये जाते थे इन वीर सैनिकों की यौन संतुष्टि के लिए|
आधुनिक युग में किसी भी कारण से जो ये लड़ाकू दूसरे देशों में, या अपने ही देशों में लड़ाई में, आक्रमण में, दहशतगर्दी में व्यस्त रहते हैं, इनके पास पैसे और हथियार की शक्ति होती है और नफरत से भरा एक जूनून जिसे पूरा करने के लिए ये हिंसा की इबारतें दुनिया भर में लिखते रहते हैं| लेकिन सालों साल, दिन के चौबीसों घंटे तो ये इस लड़ाकू जज्बे से नहीं जी सकते न, इनकी शारीरिक भूख मिटाने के लिए इन्हें स्त्री सैक्स स्लेव भी तो चाहिए और उनके रोजमर्रा के हिंसक धंधे में उन्हें पचास तरह की कुंठाओं से गुजरना पड़ता है इस कुंठा को रेश्नलाइज़ करने के लिए सबसे सुलभ माध्यम क्या है, स्त्री को यौन प्रताड़ना देना? पहले तो स्त्री सैक्स स्लेव ऐसे पक्ष से लाइ गई हो जिनसे अंदुरनी नफरत भरी हुयी हो इन लड़ाकुओं के मन में, तब इनके द्वारा किए गए हरेक बलात्कार में इन्हें बहुत बड़ी संतुष्टि मिलती है और ऐसी संतुष्टि इन्हें रोज़ बिना किसी बाधा के चाहिए जिससे वे अपने जीवन में किसी स्त्री को प्राप्त करने उसेअपने जीवन में लाने में ऊर्जा जाया न करें अतः उनके लड़ाकू कैम्पों में सैक्स स्लेव्स की व्यवस्था एक आम बात हो गयी है| ऐसा नहीं कि केवल विरोधी पक्ष की स्त्रियाँ इनकी हवस की संतुष्टि के लिए होनी चाहियें, अगर दूसरे समुदाय की स्त्रियाँ नहीं हैं तो इन्हें कोई गुरेज नहीं अपने ही समुदाय की स्त्रियों को सैक्स स्लेव बनाने में| इनमें सबसे पहले दो तरह की स्त्रियों का नंबर आता है, एक तो वे जिनकी सुन्दरता पर ये लड़ाकू मोहित रहते हैं और उसे किसी कीमत पर पाना चाहते हैं, इसके लिए पहले वे अपने ही समुदाय के उस स्त्री के रखवाले को जन्नत का रास्ता दिखा उस स्त्री को निराश्रय करते हैं| दूसरी वे स्त्रियाँ हैं जो इन लड़ाकू पुरुषों की आँख में आँख डाल कर बात करने की जुर्रत कर बैठती हैं और उनके सामने किसी किस्म का भी दुस्साहस करके उनकी मर्दानगी को ललकार देती हैं, ऐसी स्त्रियों को सबक सिखाना बहुत जरुरी है और सैक्स स्लेव बनाना सबसे बेहतरीन काम है लड़ाकुओं के लिए ऐसा करके वे स्त्री की आत्मा तक को रौंद डालते हैं|
पिछले 50-70 सालों का इतिहास देख लें तो अपनी बाहरी लड़ाइयों में तो उन्हें कोई जीत हासिल नहीं हुयी, कोई जीत मिली भी तो अस्थायी तौर पर और फिर उन्हें नष्ट हो जाना पड़ा लेकिन ऐसे हर कैम्प में स्त्रियों को सैक्स स्लेव बनाकर वे अपनी झूठी थोथी मर्दानगी को अवश्य संतुष्ट करने का प्रयास करते रहे हैं| ये सिलसिला रुकने वाला नहीं है|
ये रुकेगा अगर हरेक सम्प्रदाय की स्त्रियाँ इस पुरुष बीमारी के विरुद्ध उठ खडी हों| अक्सर मासूम लड़कियों को इस राह पर लाने में स्त्रियों का ही इस्तेमाल होता है|
कुछ फिल्मों की उपस्थिति सिनेमाई दृष्टि से उतनी नहीं होती जितनी इस बात से होती है कि वे चेताने का काम करती हैं|
जैसे अस्सी के दशक में दहेज़ प्रथा जब जलाने लगी तो “ये आग कब बुझेगी” बनी| ये चेताने का काम करने वाली फ़िल्म थी| बलात्कार पर सभी फ़िल्में घर और बैंडिट क्वीन सरीखी ही नहीं है बल्कि बहुत सी समस्या को उठाने के लिए ही बनाई गयीं| उनसे बलात्कार रुक गए हों ऐसा नहीं हुआ लेकिन अगर किसी फ़िल्म से सौ लोग भी बलात्कार की बुराई को समझ गए तो यह एक सार्थक प्रयास है|
कुछ अरसा पहले एक फ़िल्म आयी जिसे बहुत लोगों ने नहीं देखा होगा – द कन्वर्जन, इसमें “लव जिहाद” का एक रूप दिखाया गया है| भले ही “लव जिहाद” नाम का कृत्य बड़े क्या छोटे स्तर पर भी न होता हो लेकिन अगर यह साल में इतने बड़े विशाल देश में एक मासूम लडकी के साथ भी होता है तो इसके प्रति चेताने का काम अखबार, मीडिया, साहित्य, कला, थियेटर और सिनेमा का है| इसके विभिन्न पहलुओं पर बात करने का इन विधाओं का अधिकार है|
किसी वर्ग में सभी समान बुद्धि विवेक के नहीं होते उनमें बहुत से संगठित रुप में किसी सामूहिक कर्म में लिप्त हो सकते हैं|
खाप, ऑनर किलिंग, जातीय हिंसा और ऐसी तमाम सामाजिक बुराइयों पर फ़िल्म बन सकती हैं तो लव जेहाद पर क्यों नहीं?
देश में ऐसा इको सिस्टम बना दिया गया है कि द केरल स्टोरी को इसलिए विवादित बना दिया गया कि 32000 लड़कियों का आंकड़ा फर्जी है, फ़िल्म प्रोपेगंडा है| चाहे 32 लड़कियों को बहला फुसला कर डरा धमका कर सीरिया में भेज सैक्स स्लेवरी में डाला गया हो और चाहे केवल एक भारतीय लडकी के साथ ऐसा हो हो, अगर ऐसा हुआ है तो कोई तो फ़िल्म इस बारे में बात करेगी न!
लड़ाकू कैम्पों में सैक्स स्लेव नहीं है ऐसा दावा कोई दुनिया में मानेगा? या अन्य जगहों जहां भी आतंकवादी कैम्प स्थित हैं, स्त्रियों का योजनाबद्ध तरीके से यौन शोषण नहीं होता इसे कोई मानेगा?
द केरल स्टोरी चेताती है न केवल हिन्दू स्त्रियों को बल्कि सभी वर्गों की स्त्रियों को कि असभ्य तानाशाह पुरुषों के बेलगाम नियंत्रण में स्त्री मात्र का क्या हश्र होने वाला है| इस पुरुषवादी माहौल में उनके ज़रा सी गलतियों पर पत्थर मार कर उन्हें मार डालने की सजा का प्रावधान है| लिपस्टिक जैसी श्रृंगार की वस्तु इस्तेमाल करने पर हाथ काट देने का नियम है| मोबाईल रखना मजहबी कारणों से गुनाह है और इस गुनाह की सजा है मौत|
द केरल स्टोरी एक फ़िल्म के रूप में शातिराना ढंग से बुरे इरादों से करवाए जा रहे धर्म परिवर्तन के एक रूप और इसकी शिकार लड़कियों की नरक तुली जीवन की झांकी दिखाती है|
चेतने के लिए इस फ़िल्म को देखा जाना चाहिए|
स्त्रियों को, चाहे वे हिंदू हों, मुस्लिम हों, सिख हों, इसाई हों या किसी और संप्रदाय की हों, इसे देख कर चेत जाना चाहिए कि पुरुषों के वर्चस्व वाले समाज में जहां बेहद हिंसक और कट्टर किस्म के कम अक्ल वाले, तानाशाह किस्म के पुरुषों का राज चलेगा उनके लिए सेक्स स्लेव जैसी स्थिति ही बचेगी|
फ़िल्म चूंकि कट्टर मुस्लिम पुरुषों को निशाने पर रखकर उनकी कुत्सित मानसिकता को दिखाती है और उनके हाथों स्त्रियों का शोषण दिखाती है तो अपरोक्ष रूप से फ़िल्म यही दिखाती है कि मातृशक्ति को ही मुस्लिम समाज में सामने आकर बागडोर अपने हाथ में लेनी होगी वरना यह सिर्फ सैद्धांतिक और खोखला कथन ही रह जायेगा कि इस्लाम का तो शाब्दिक अर्थ ही शान्ति है और यह स्त्री को उसके अधिकार पुरुषों के बराबर देने की बात करता है| इन उपदेशों को अमल में लाने का काम मुस्लिम महिलाओं का है| वे अगर कट्टरता में कुत्सित इरादों वाले मुस्लिम पुरुषों के हाथों की कठपुतली बन जायेंगी तो दोज़ख की आग धरती पर ही सभी जगह मुहैया हो जायेगी और वे खुद इसकी तपिश से नहीं बच पाएंगी|
द केरल स्टोरी और द कन्वर्जन को सयुंक्त रूप से चेताने वाली फिल्मों के तौर पर देखा जाना चाहिए और इससे चेतना हरेक भारतीय के लिए आवश्यक है| गैर मुस्लिमों के साथ यह मुस्लिमों के लिए भी चेत कर उठने का समय है जिससे वे मानवता की राह से भटके अपने सम्प्रदाय के लोगों के विरुद्ध उठ खड़े होंगे, मूक दर्शक बन कर नहीं रहें|
फ़िल्में केवल चेताने के लिए होती हैं इनका सहारा लेकर किसी पर ऐसा आक्रमण करना कि उनकी तो हरेक बात गलत है दर्शक को भी उन्हीं लड़ाकुओं की श्रेणी में ला खडा करता है जिनके मानवता पर अत्याचारों पर इन फिल्मों में दिखाया है|
अन्य फिल्मों की तरह इन फिल्मों में भी कल्पित चरित्र हैं जिन्हें अभिनेताओं ने निभाया है| जितनी नापसंदगी दलाल, बाज़ार, इन्साफ का तराजू आदि के खलनायकों को देख उन चरित्रों के प्रति उपजती है वैसा ही ट्रीटमेंट इन फिल्मों के लिए भी आवश्यक है बाकी सामाजिक तर्क, विश्लेषण आदि हरेक समाज में होते रहने चाहियें|
महान लेखक प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ग को ज्यादातर शोषक, और कथाक्रम में बुरे चरित्र बना कर दर्शाया गया है, उन कहानियों से ब्राह्मण और क्षत्रियों ने तो कभी नहीं कहा कि उन्हें बदनाम करने के लिए प्रेमचंद ने ऐसा किया| ब्राह्मण और क्षत्रिय लोग भी प्रेमचंद के लेखन के नियमित पाठक ही नहीं बल्कि उनके लेखन के बड़े प्रशंसक रहे हैं|
उस नाते भी द केरला स्टोरी और द कन्वर्ज़न जैसी फिल्मों के बनाये जाने से ऐसा पहाड़ नहीं टूट जाता कि इनके बनाये जाने का ही इतना प्रबल विरोध किया जाए| इनकी भी समीक्षा इनकी सिनेमाई गुणवत्ता के आधार पर होनी चाहिए न कि उनके बनाये जाने के उद्देश्य को संदिग्ध बना कर|
औसतन फ़िल्म बनाने वाले का मुख्य उद्देश्य अपने लिए साख, और उसके जरिये पैसा कमाना होता है, वे इतनी समाज सेवा तो कर सकते हैं कि किन्ही विषयों पर फ़िल्म बना दें लेकिन अगर उनकी फ़िल्म, किसी शोषित वर्ग पर बनी हुयी, जम कर पैसा कमा डालेे, तो उस अर्जित धन से वे उस शोषित वर्ग के लिए कुछ नहीं करेंगे, अपवाद को छोड़ हमेशा ऐसा होता है| उनके अपने जमीर में बस इतना ही समाया होता है कि फ़िल्म बना कर लोगों को जागरूक तो कर दिया न समस्या के प्रति|
यह कडवा सत्य हर दर्शक को याद रखना चाहिए| मार्लन ब्रांडो जैसे अपवाद ही होते हैं जो नेटिव अमेरिकन के मुद्दे पर ऑस्कर ठुकरा दें|
…[राकेश]
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