कल्पना कीजिये कि एक युवक की प्रेमिका परिस्थितिवश उसकी माँ बन जाये तो क्या हो?

ऐसे रिश्ते से उपजे जटिल समीकरण को सुलझाने के लिए दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण और हिन्दी फिल्मों के प्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक एल वी प्रसाद, जो भारत की पहली सवाक फिल्म आलम आरा से एक अभिनेता के रूप में भी जुड़े हुये थे, ने हिन्दी फिल्मों में निर्देशन की अपनी पारी “शारदा” फिल्म से शुरू की| यह एक तमिल फिल्म का रिमेक थी| अभिनेता निर्देशक टीनू आनंद के यशस्वी लेखक पिता इंदर राज आनंद ने हिन्दी वर्जन का स्क्रीन प्ले लिखा और सी रामचन्द्र ने संगीत तैयार किया| हिन्दी फिल्मों के संगीत के दीवाने जिन श्रोताओं में “लताआशा में कौन श्रेष्ठ” का द्वंद चला करता है उनके कानों की दावत के लिए इसमें दोनों का एक बेहतरीन डुएट – ओ चन्दा जहां वो जाएँ” है| बाकी गीत तो साधारण ही हैं पर ये गीत बड़े मार्के का है|

कहानी का संक्षिप्त सा ब्यौरा – राज कपूरमीना कुमारी युवा प्रेमियों की भूमिका में हैं| राज को एक सांस्कृतिक दौरे के लिए चीन जाना पड़ जाता है और वह मीना कुमारी को चीन से लौटकर विवाह करने का वचन देकर चीन चला जाता है| प्लेन क्रैश, और सभी यात्रियों के मारे जाने की सूचना आती है| गरीब मीना कुमारी का अपने पिता के कहने पर एक अमीर विधुर पुरुष के यहाँ देखभाल करने जाना होता है| घर में तीन छोटे बच्चे भी हैं जिसमें एक विकलांग है| मीना की सेवा देखकर उसके पिता उसे वृद्ध से विवाह करने के लिए विवश कर देते हैं| विवाह उपरांत कुछ समय पश्चात राज वापिस आ जाता है और घर की नई स्थिति देख उसके पैरों तले की जमीन खिसक जाती है| जिससे वह स्वयं विवाह के स्वप्न देखता था कैसे उसे माँ के रूप में स्वीकार कर ले?

अपने में घुलता राज, अपने जीवन को बर्बाद करने की राह पर चल पड़ता है लेकिन मीना उसे पुनः राह पर लाती है और उसे एक योग्य युवती से विवाह के लिये मना लेती है| राज का विवाह श्यामा से हो जाता है लेकिन यह विवाह करेले पर नीम चढ़ा की स्थिति रच देता है क्योंकि श्यामा को शक हो जाता है कि राज मीना अभी भी एक दूसरे के प्रेमी हैं| इस जहरीले शक्की वातावरण में कैसे निभेगा? कैसे राज और मीना दोनों ही जिएंगे?

इस जटिलता को शारदा फिल्म दिखाती है और एक सार्थक सा मार्ग और कथा का अंत सुझाती है, दिखाती है| फिल्म बहुत पुरानी है अतः उस दौर के हिसाब से फॉर्मूला कॉमेडी परेशान कर सकती है पर फिल्म को इस नाते देखा जा सकता है कि ऐसे कठिन विषय से हिन्दी सिनेमा ने सन 1957 में ही सीधी टक्कर ले ली| और सिर चकरा देने वाले समीकरण में फंसी स्त्री की भूमिका में मीना कुमारी के प्रभावशाली अभिनय के लिए भी इसे देखा जा सकता है| यूं तो उस बरस का फिल्मफेयर मदर इंडिया के लिए नर्गिस को दिया गया लेकिन चरित्र के शेड्स और गहराई और उसमें अभिनय प्रदर्शन की कसौटी पर कसें तो यही लगता है कि मीना कुमारी भी एक सशक्त उम्मीदवार थीं| और पुरस्कार अभिनय से ज्यादा चरित्र को दिया गया लगता है| शारदा फ़िल्म के विषय के कारण मीना कुमारी अच्छे अभिनय के बावजूद पीछे रह गयीं|

फ़िल्म में राज कपूर और ओम प्रकाश की जोड़ी एक तरह से देवदास के देवदास और चुन्नी बाबू जैसी ही है और राज कपूर ने अपने चरित्र के देवदास से प्रेरित भागों को अपनी मौलिकता से निभाया है, वे के एल सहगल और दिलीप कुमार द्वारा इसे निभाये जाने के प्रभाव से अप्रभावित होकर इसे निभा गए और यह भी सिद्ध कर गए कि मौका मिलता तो वे भी देवदास का चरित्र शिद्दत से निभा जाते|

फ़िल्म – शारदा का महत्त्व राज कपूर और मीना कुमारी के बीच के जटिल रिश्ते और रिश्ते की पेचीदगियों को इन दो बड़े कलाकारों द्वारा प्रभावी ढंग से निभाये जाने के कारण ही है| फ़िल्म मनोहर कहानियों जैसे ऐसी स्थिति में अपराध और अनैतिकता के रास्तों की ओर न जाकर दोनों चरित्रों द्वारा यथास्थिति को स्वीकार करके अपनी भावनाओं को शुद्ध करने की यात्रा को दिखाती है|

बहुत बरसों बाद यश चोपड़ा द्वारा बनायी गयी लम्हे के बरक्स इसे रख कर देखें तो लम्हे मानवीय रिश्तों में नैतिकता की पटरी से उतरी फ़िल्म बन गयी जबकि शारदा ने नैतिक उंचाई प्राप्त की|

….[राकेश]


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