फिल्में जो समय के साथ उपलब्ध नहीं रह पातीं, उनके साथ लोगों की कल्पनाएँ जुड़ती चली जाती हैं और जैसे लोग एक ही घटना को अपनी ओर से कुछ लीपापोती के साथ प्रस्तुत करके उसका प्रारूप ही बदल देते हैं वैसा ही फिल्मों के साथ भी होता है| समय के साथ लोगों की याददाश्त पर असर आ जाता है और अक्सर ही कलाकार भी अपने ही जीवन से जुड़ी घटनाओं को सही से न याद कर पाते हैं न ही उन्हें सुना पाते हैं और कई घटनाओं को मिश्रित कर बैठना तो हर समय ही घटता रहता है|

फ़िल्मी गीतों, फिल्मों और फिल्मों से जुड़े प्रसंगों में इतना ज्यादा झोल हो जाता है कि सच क्या है और क्या अलग से जोड़ा गया है इसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है| इंटरनेट के युग में जहां कोई भी बात बहुत तेजी से चारों ओर फ़ैल जाती है, किसी भी बात के इर्द गिर्द मिथक गढ़ने की प्रक्रिया भी बहुत तेजी से बढ़ी है|

1973 में प्रदर्शित वेद राही द्वारा निर्देशित और शांति सागर द्वारा निर्मित, रेहाना सुल्तान अभिनीत फ़िल्म- प्रेम पर्बत के साथ इतने ज्यादा मिथक जुड़ चुके हैं कि ऐसा भी लगने लगता है कि क्या ऐसी कोई फ़िल्म बनी भी थी| दिलीप कुमारनर्गिस की मेला, दिलीप कुमार- सुचित्रा सेन की देवदास, और गिरीश कर्नाडशबाना आजमी की स्वामी जैसी कहानियों के एक भाग जैसी कहानी पर बनी प्रेमपर्बत जयदेव के रचे शानदार संगीत और लता मंगेशकर द्वारा गाये, जान निसार अख्तर द्वारा लिखे गए गीत- ये दिल और उनकी निगाहों के साए, की अमरता के कारण लोगों की स्मृति में पुनः पुनः जीवित हो जाती है| जो भी इस अविस्मरणीय गीत को सुनता है उसके अन्दर इसके विडियो को भी देखने की तीव्र अभिलाषा जन्म ले ही लेती है और वह इंटरनेट पर खोजता चला जाता है इस फ़िल्म की उपलब्धता के बारे में लेकिन उसे यही भ्रमित सन्देश प्राप्त होते हैं –

कि फ़िल्म प्रदर्शित नहीं हुयी

कि फ़िल्म के प्रिंट्स जल गए

कुछ को वेद राही द्वारा इस बारे में अपने साक्षात्कार में कही गयी बात का मर्म समझ आता है कि समय के साथ इसके प्रिंट नष्ट हो गए|

लोग कैसे इस फ़िल्म के इर्द गिर्द मिथक गढ़ते हैं इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि कुछ अरसा पहले एक सज्जन ने दावा कर दिया कि दरअसल इस फ़िल्म की नायिका रेहाना सुल्तान नहीं बल्कि हेमा मालिनी थीं| लोगों ने इस दावे को भी आगे परोस दिया|

यह बड़ा दिलचस्प है कि फ़िल्म के पोस्टर और उस दौर की किसी फ़िल्म पत्रिका में इसके विवरण मिलने चाहिए थे| फ़िल्म के किसी भी उपलब्ध पोस्टर पर कभी हेमा मालिनी का चित्र तक नहीं देखा किसी ने भी| यह तो संभव हो सकता है कि वेद राही ने पहले इसे हेमा मालिनी के साथ विज्ञापित किया हो लेकिन बाद में इसे रेहाना सुल्तान के साथ बनाया गया हो| जिस तरह का इसका बोल्ड विषय है और जैसे इसके पोस्टर्स मिलते हैं, वैसे दृश्य हेमा मालिनी तो कभी भी न कर पातीं जबकि चेतना और दस्तक की बुनियाद पर खड़ी रेहाना सुलतान के लिए यह एक सही विषय था| फ़िल्म के बारे में जितनी भी सही बातें पता लगती हैं उनसे हेमा मालिनी के अतिथि भूमिका में (रेहाना सुल्तान के चरित्र की सखी की भूमिका) नज़र आने की बात ही निश्चित ठहरती है| ऐसे कौन से फ़िल्म निर्देशक और निर्माता होंगे जो 1972-73 में व्यावसायिक सफलता के शिखर पर चढ़ती जाती हेमा मालिनी का नाम न पोस्टर पर लिखेंगे न उनका कोई फोटो किसी पोस्टर पर छापेंगे? ऐसे उटपटांग दावों से फ़िल्म के इर्द गिर्द मिथकों का घेरा और सघन हो जाता है|

फ़िल्म के पोस्टर पर फ़िल्म की टैग लाइन क्या है?

Crushed under the heavy hand of her old Husband She sought comfort in the arms of her lover.

पोस्टर्स में वृद्ध नाना पलसीकर के साथ विवाह के जोड़े में रेहाना सुल्तान हैं, बिस्तर पर के एक दृश्य में रेहाना सुल्तान के पड़ोस में नाना पलसीकर लेटे हुए हैं, युवा सतीश कौल ने अपनी बाहों में रेहाना सुल्तान को उठाया हुआ है, इन दोनों के अन्य दृश्य भी हैं| और फ़िल्म ऐसी ही कथा पर आधारित है जहाँ एक युवती आ विवाह एक वृद्ध से कर दिया गया है और वह एक युवा संग प्रेम संबंध स्थापित कर लेती है| इतना सब कुछ पोस्टर्स पर है, वेद राही का स्वंय का पुराना साक्षात्कार है जिसमें वे रेहाना सुल्तान की ही बात कर रहे हैं तब भी लोगों ने झूठ चला दिया कि फ़िल्म की नायिका असल में हेमा मालिनी हैं|

अब इससे जुड़े सबसे मिथक कि यह फ़िल्म कभी प्रदर्शित ही नहीं हुयी को देखें तो यह सरासर झूठ है| फ़िल्म बाकायदा प्रदर्शित हुयी, लोगों ने इसे सिनेमाघरों में देखा लेकिन बॉक्स ऑफिस पर यह एक फ्लॉप फ़िल्म थी सो कुछ ही दिनों में सिनेमाघरों से हटा दी गयी, लेकिन ऐसे बहुत से लोग अभी भी हैं जिन्होंने इसे सिनेमाघर में देखा| ऐसे भी लोग हैं जिन्होंने 70 के दशक के अंत तक दूरदर्शन पर चित्रहार में इसके गीत देखे|

तो यह दावा कि फ़िल्म अप्रदर्शित रह गयी सफ़ेद झूठ है|

वेद राही के कथन – कि समय के साथ इसके प्रिंट्स नष्ट हो गए, का तात्पर्य यह कतई नहीं निकला जा सकता कि फ़िल्म के प्रदर्शन से पूर्व ही प्रिंट्स नष्ट हो गए| जब फ़िल्म कहीं चली ही नहीं तो रखे रखे भी प्रिंट्स नष्ट हो सकते हैं| निर्माता और निर्देशक की जोड़ी में ऐसा विज़न नहीं रहा होगा कि इसका शानदार संगीत ही इस फ़िल्म को जीवित रखेगा सो इसका प्रिंट सुरक्षित कर लें| अगर वे पहले वीएचस, फिर वीसीडी और बाद में डीवीडी पर ट्रांसफर करने का मार्ग अपनाते तो फ़िल्म आज सहज ही उपलब्ध रह पाती|

लेकिन यह 1983 के क्रिकेट विश्व कप के भारत जिम्बाब्वे के मैच की रिकार्डिंग सम्बंधित मसला नहीं है कि जहाँ रिकार्डिंग अधिकारिक स्तर पर हुयी ही नहीं| यहाँ तो बाकायदा फ़िल्म बनी और प्रदर्शित हुयी बस लोगों को पसंद नहीं आई|

जिन्होंने फ़िल्म देखी थी उनका एकसमान दृष्टिकोण यही रहा कि फ़िल्म तो बेहद साधारण थी लेकिन संगीत कमाल का था|

एक यूट्यूबर ने कुछ अरसा पहले दावा कर दिया कि उसके पास प्रेम पर्बत का वीडियो है| नीचे के चित्र में अन्य फिल्मों के बीच वीडियो कैसेट नुमा आकार में प्रेम पर्बत की कैसेट/सीडी/डीवीडी भी देखी जा सकती है| लेकिन इन महाशय ने इतन कष्ट नहीं उठाया है कि 20-30 सेकेंड्स का एक क्लिप ही यूट्यूब पर डालकर इसकी उपलब्धता और अनुपलब्धता की अनवरत चलती बहस को विराम दे दें| वे इसे बेचने के प्रयास में हैं लेकिन अपना संपर्क इच्छुक लोगों को नहीं देते| जिससे इनके दावे पर संदेह उठता है|

इन सब बादलों से घिरे आसमान में कहीं एक क्षीण सी आशा अवश्य है कि अगर फ़िल्म का वीडियो न भी मिले इसके गीतों के विडियो पुनर्जन्म पा सकते हैं क्योंकि दूरदर्शन ने उनका प्रसारण चित्रहार के माध्यम से किया था|

कहीं तो मिलेगी बहारों की मंजिल ….

…[राकेश]


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