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#Jaidev

Gulzar@91 : सबने देखी है शब्दों से फैलती खुशबू

बंदिनी में सचिन देव बर्मन के साथ एक बेहद खूबसूरत गीत (मोरा गोरा अंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे) से फ़िल्मी गीत लिखने की शुरुआत करने वाले गुलज़ार पिछले 62 वर्षों से निरंतर संगीत निर्देशकों और फ़िल्म निर्देशकों... Continue Reading →

लफड़ा सदन – न बन पाने वाली फ़िल्म के लॉन्च की कथा

अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखता हूँ तो अवसरों भरे उन कुछ दिनों पर निगाहें ठहरती हैं जो  संयोग, सौहार्द और सिनेमाई उम्मीदों से भरे हुए रहे हैं| जैसे 2 अक्टूबर 1976 का चमकीला दिन! उस दिन बॉम्बे के फ़िल्म... Continue Reading →

आयी ऋतु सावन की : (Alaap 1977)

आई ऋतु सावन की पिया मोरा जाये रे आई ऋतु सावन की। बैरन बिजुरी चमकन लागी बदरी ताना मारे रे, ऐसे में कोई जाए पिया, ऐसे में कोई जाए पिया. तू रूठो क्यों जाये रे, आई ऋतु सावन की। तुम... Continue Reading →

Prem Parbat (1973): मिथक या सत्य

फिल्में जो समय के साथ उपलब्ध नहीं रह पातीं, उनके साथ लोगों की कल्पनाएँ जुड़ती चली जाती हैं और जैसे लोग एक ही घटना को अपनी ओर से कुछ लीपापोती के साथ प्रस्तुत करके उसका प्रारूप ही बदल देते हैं... Continue Reading →

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