हृषिकेश मुखर्जी एक महान फ़िल्म निर्देशक होने के साथ-साथ अच्छे संगीत के भी पारखी थे और यह उनकी फिल्मों के उच्च स्तरीय संगीत से स्पष्ट हो जाता है| हृषिदा की फिल्मों में संगीत इतना बहुपक्षीय और बहुरंगी रहा है कि इस बात में तो कोई संदेह हो ही नहीं सकता कि उन्हें श्रेष्ठ संगीत की समझ श्रेष्ठतम रूप में थी|
एक फ़िल्म निर्देशक एक फ़िल्म रुपी प्रोजेक्ट का सबसे बड़ा नियंत्रक होता है, उसी की कल्पित या चयनित कहानी पर उसी के द्वारा कल्पित और चयनित ट्रीटमेंट द्वारा एक फ़िल्म का निर्माण होता है|
एक रोचक मनोरंजक फ़िल्म बनानी हो तो उस दौर के सफल संगीतकार और गीतकारों को निर्देशक अपनी फ़िल्म से जोड़ ले और वे उसकी फ़िल्म का संगीत वाला पक्ष संभाल लेते हैं| लेकिन अगर कथानक की फसल संगीत की पृष्ठभूमि पर ही उगनी हो तो मामला गंभीर हो जाता है|
हृषिदा की संगीत के मामले में विज़न कितना स्पष्ट था यह पता लगता है उनकी तीन फिल्मों अनुराधा, आशीर्वाद और आलाप से|
अनुराधा में विषयानुसार उन्होंने पंडित रविशंकर से फ़िल्म का संगीत तैयार करवाया|
आशीर्वाद एक जटिल विषय पर बनाई गयी थी तो उन्होंने दर्शन से भरे गीतों और लोकसंगीत के समावेश के लिए वी शांताराम की कुछ महत्वपूर्ण फिल्मों में संगीत दे चुके प्रसिद्द संगीतकार वसंत देसाई से इस फ़िल्म के लिए संगीत बनवाया|
आलाप विशुद्ध अर्द्ध शास्त्रीय और शास्त्रीय संगीत की पृष्ठभूमि पर आधारित फ़िल्म थी तो इस बार उन्होंने जयदेव को आमंत्रित किया संगीत प्रदान करने के लिए| और पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश की थी तो संवाद लेखन और गीत लिखने के लिए निमंत्रण भेजा प्रसिद्द लेखक डॉ राही मासूम रज़ा को|
फ़िल्म में एक भूमिका है एक तवायफ सरजू देवी की जिसे निभाया था बंगाली सिनेमा की अभिनेत्री छाया देवी ने|
एक निर्देशक की आधी सफलता अपनी कल्पित भूमिकाओं में सही अभिनेता के चयन से प्राप्त हो जाती है| छाया देवी का चयन एकदम सटीक है फ़िल्म की इस भूमिका के लिए| जैसी अनुभवी शास्त्रीय गायिका परदे पर चाहिए थी उस कसौटी पर छाया देवी बेहद प्रतिभाशाली बनकर उभरती हैं, जैसे कि उनके संगीत के प्रशंसक और एक दौर में उनके आर्थिक हितों का ख्याल रखने वाली राजा बहादुर की भूमिका में संजीव कुमार और सरजू बाई के प्रेम में गिरफ्तार उनकी परछाई बनकर तबला, पखावज वादक बने महाराज की भूमिका में वरिष्ठ चरित्र अभिनेता मनमोहन कृष्ण|
व्यवहारिक वकील अमीर पिता त्रिलोकी प्रसाद (ओम प्रकाश) और संगीत प्रेमी कलाकार मन के बेटे आलोक (अमिताभ बच्चन) के आपसी द्वन्द में धीरे धीरे कैसे नाजुक ह्रदय युवा कलाकार की बलि चढ़ती है, उस कथा को बेटे के प्रथम प्यार- संगीत, के व्यापक आसमान के नीचे घटता हुआ दिखाती है “आलाप“|
संगीतमयी होने के बावजूद, “आलाप” इतना निराशामयी वातावरण रच देती है अंत तक कि इस पर लिखना, बोलमा, बात करना मुश्किल हो जाता है, दूसरे इसके संगीत के असर को एकदम से हटा देना बड़ा मुश्किल काम है| जिस दिन आलाप का संगीत सुनना हो, उस पूरे दिवस को इसके लिए संरक्षित कर देना चाहिए इसकी बारीकियों में खो जाने के लिए|
आलाप के संगीत के असर को दर्शाने के लिए इसके केवल एक गीत की चर्चा करना मुनासिब रहेगा| आलोक की जब पहली भेंट सरजू बाई से होती है तो बातों के सिलसिले से राजा बहादुर की बात निकल आती है और सरजू सुनाती हैं उस रात की बात जब राजा बहादुर की पत्नी का देहांत हो गया था और नितांत दुखी राजा बहादुर ने अपने को अपने कक्ष में बंद कर लिया था| उनके दुःख से विचलित और उनसे मानसिक रूप से गहराई से जुडी सरजू उनके कक्ष का दरवाजा खटखटाने के जुर्रत कर बैठती है लेकिन उसकी आवाज़ सुनकर राजा बहादुर दरवाजा खोलकर उसे अन्दर बुला लेते हैं| और चंद बातों से दृश्य ऐसे विकसित हो जाता है कि राजा बहादुर सरजू से तानपूरा लाने के लिए कहते हैं ताकि संगीत के माध्यम से अपने दुखी विचलित मन को संभाल सकें|
संगीत सम्राट तानसेन ने राग मिया मल्हार की रचना की थी | बिरह की अग्नि से ताप रहे राजा बाहादुर के मन को शीतलता प्रदान करने के लिए जयदेव ने बरखा ऋतु की पानी बरसाती रात के प्रहर में गाये जाने वाले इस राग मल्हार को चुना और बड़े ख्याल में विलंबित लय में इसे कुमारी फय्याज से गवाया और इसमें गायक भूपिंदर के गायन का भी प्रवेश होता है|
आई ऋतु सावन की
पिया मोरा जाये रे
आई ऋतु सावन की।
बैरन बिजुरी चमकन लागी
बदरी ताना मारे रे,
ऐसे में कोई जाए पिया,
ऐसे में कोई जाए पिया.
तू रूठो क्यों जाये रे,
आई ऋतु सावन की।
तुम ही अनुक बिदेस जाईया
सब आये है द्वार रे,
ऐसे में कोई जाए पिया,
ऐसे में कोई जाये पिया,
तू रूठो क्यों जाये रे
आई ऋतु सावन की।
कुमारी फय्याज और भूपिंदर ने गया और जयदेव ने संगीतबद्ध कर दिया गीत को और गीत बेहद प्रभावशाली बन गया लेकिन एक निर्देशक के लिए तो असली का अब शुरू होता है कि इतने खूबसूरत गीत को परदे पर उतनी ही खूबसूरती से कैसे प्रस्तुत करे? जिसे फ़िल्म की कहानी का अंग बन कर गीत पूरी फ़िल्म के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दे|
हृषिदा कैसे प्रस्तुत करते हैं इस गीत को?
राजा बहादुर की यादों में खोकर उनके अतीत में देखे हुए दुःख से आज भी रोती हुयी सरजू महाराज जी के आग्रह पर अपने आंसू पोंछ कर आलाप लेकर गाना शुरू कर देती हैं| उनके गायन की मधुरता से बंधकर संगीत को अच्छे से न समझने वाली और लगभग अनपढ़ रधिया (रेखा ) भी उठाकर खिड़की के बाहर से ही अन्दर झांककर गीत गाती सरजू को देखती है, जिन्हें संगीत की परख रखने वाले अमिताभ भी मंत्रमुग्ध होकर देख रहे हैं| सरजू बाई संगीत के प्रभाव में अपनी आँखें मूँद कर अतीत में राजा बहादुर के कक्ष में उसी बीते दिन में पहुँच जाती हैं| वहां उस घटना वाले दिन भी उनके गलों पर आंसू ढलक ढलक का पूरी तरह सूखे नहीं हैं और उनके निशान आँखों के नीचे बने हुए हैं| सरजू का गायन सुनकर राजा बहादुर के संगीत प्रेमी ह्रदय के उदगार गीत के अंतरे के रूप में सामने आते हैं| खिड़की से बाहर आसमान को देखते हुए राजा बहादुर गाना आरम्भ करते हैं
और जब पलटते हैं तो संजीव कुमार की आँखें आंसुओं की उपस्थिति से जलमग्न चमक छलक रही हैं,
बैरन बिजुरी चमकन लागी
बदरी ताना मारे रे,
ऐसे में कोई जाए पिया,
गाते हुए उनकी दृष्टि अपनी आज ही गुजरी पत्नी के पोर्टेट पर जा अटकती है|
भीगे आँखों से गाते राजा बहादुर के दुःख को क्लोज अप शॉट्स के माध्यम से पकड़ने के बाद निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी उनके दुःख की बेहद बड़ी मात्रा परदे पर दिखाने के लिए लो एंगल शॉट से संजीव कुमार को ऐसे कैमरे की तरफ चलते हुए कैप्चर कराते हैं कि राजा बहादुर की पत्नी की पेंटिंग राजा बहादुर की काया के पीछे छिप जाती है और उनके दायीं ओर शय्या पर बैठ तानपूरा बजाती सरजू बाई राजा बहादुर के साथ एक फ्रेम में आ जाती है और कैमरा लो एंगल से ही राजा बहादुर के बस्ट को कवर करते हुए उनके चेहरे पर फैले दुःख को दिखाकर दृश्य को डिज़ोल्व कर देता है और अतीत की यादों में खोयी वृद्ध सरजू परदे पर पुनः आ जाती हैं गाते हुए, जहां कैमरा धीरे धीरे पीछे जाकर उनके दायीं ओर खड़े महाराज जी और बाईं ओर बैठे आलोक को भी दिखाता है| महाराज जी इस किस्से से, इसमें बसे दुःख से परिचित हैं, और उनके लिए सरजू का दुःख उनका अपना है, अतः उनके मुख पर एक दुःख भरा गीत सुनने और उस दुःख से व्यक्तिगत स्तर पर गुजरने का भाव छाया हुआ है| आलोक पहली बार ही किस्से से परिचित हुआ है और वह गीत के दुःख से और सरजू बाई के गायन की श्रेष्ठता से बंधा हुआ एकटक सरजू बाई को देख रहा है| पीछे खडी रधिया भी किस्से और गीत में छिपे दुःख से प्रभावित दिखाई दे रही है|
कैमरा ज़ूम होता हुआ गीत गाती सरजू के चेहरे पर फोकस होता जाता है जहां गीत के माध्यम से घटित और संगीत में गहरे डूब गयी सरजू बाई की आँखों में झलकते आंसू उनके गालों पर अभी भी ढलक रहे हैं|
दर्शक इतना दुःख मनोरंजन के लिए देखी जाने वाले फ़िल्म में बर्दाश्त नहीं करते इसलिए तुरंत जम्प कट लगवा कर निर्देशक अगले ही दृश्य में त्रिलोकी प्रसाद की व्यवहारिक, और पैसे के लाभ हानि गिनते संसार में दर्शकों को ले जाते हैं|
फ़िल्म में तो इस गीत को कुमारी फय्याज और भूपिंदर के गायन में देखा सुना जाता है लेकिन इसके ऑडियो में इस पूरे गीत को केवल कुमारी फ़य्याज की गायिकी में भी सुना जा सकता है|
यह तो केवल एक गीत है आलाप का, इसके हरेक गीत को, यहाँ तक कि असरानी द्वारा गाये गए गीत को भी समुचित फिल्मांकन और महत्त्व संगीत पारखी निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी देते हैं|
और उनकी तमाम फिल्मों में उनकी संगीत की गहरी समझ के दर्शन तो होते ही हैं|
…[राकेश]
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