भारतीय मिथक के किस्सों में खोजें तो बहुत से उदाहरण (श्रीराम –ब्रह्मास्त्र, अश्वत्थामा – द्रौपदी पुत्र एवं उत्तरा गर्भ, परशुराम–कर्ण शस्त्र विद्या प्रसंग आदि) मिल जायेंगे जहां युद्ध कला या शस्त्र विद्या के दुरूपयोग से तबाही मची|
इसलिए इसके लिये हर काल में कुछ नियम कायदे बनाए गए और पात्रता को सुपात्र और कुपात्र के मध्य स्पष्ट रूप से विभाजित किया क्योंकि युद्धकला और इसमें कौशल प्राप्त करने के आदर्श नियम यदि मानव न गढ़े और उनका पालन न करे तो मानव अस्तित्व इस धरा से मिट सकता है, इसके संकेत दुनिया हिरोशिमा नागासाकी में यत्नपूर्वक की गयी मानवीय कारगुजारियों और चेर्नोबिल में मानवीय भूल और भोपाल में मानवीय लापरवाही के नतीजों के रूप में देख चुकी है|
द कराटे किड की बहुत सी विशेषताएं हैं| चूंकि पूर्व पश्चिम दोनों विचारधाराओं और बाज़ारों को फ़िल्म को संभालना था अतः दोनों पक्षों को संतुलित किया गया है|
इसमें पूर्व और पश्चिम में जन्मी सभ्यताओं में कुछ मूलभूत अंतर है इसे बेहद सरल रूप में दिखा दिया गया है| पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवनशैली से दैनिक जीवन ही नहीं बल्कि इस उपग्रह पर जीवन मात्र पर कितना बुरा असर पड रहा है वह जैकी चैन का चरित्र जादेन स्मिथ के चरित्र को गीज़र के उदाहरण से समझा देता है|
सांस्कृतिक अंतर के कारण बच्चों में स्थान्तरण का कितना भारी महत्त्व होता है यह भी फ़िल्म दिखाती है और बच्चों से ज्यादा बड़ों में पूर्वग्रह ज्यादा स्थायी किस्म के होते हैं, इसके भी दर्शन होते हैं|
युद्ध कला और शस्त्र विद्या में निपुणता, अपने और अपने शारीरिक एवं मानसिक विचलनों पर पूर्ण नियंत्रण करते/सीखते हुए ध्यान और धैर्य से अनुशासन के साथ किये निरंतर अभ्यास पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है| यह न तो इंस्टेंट कॉफ़ी है और न दो मिनट में तैयार फास्ट फ़ूड आइटम| बरसों के निरन्तर अभ्यास से ही इसमें कुछ गहराई आ सकती है और इसे प्राप्त करने के बाद इस कला में दक्ष व्यक्ति के नैतिक दायित्व बहुत बड़े हो जाते हैं| यह अपनी और कमजोरों की सुरक्षा के लिए उपयोगी है, यह किसी पर आक्रमण करने का हथियार नहीं है|
गुरु-शिष्य परंपरा से सीखे जाने वाली सभी कलाओं में शिष्य का गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण बहुत मायने रखता है| शिष्य की शारीरिक विशेषताओं और उसकी मनस्थितियों को देख समझ कर ही गुरु उसके लिए अभ्यास के सीखने का क्रम निर्मित कर सकता है|
युद्ध कला अगर खेल के रूप में प्रतियोगिता है तो एक कुगुरू अपने मन में छिपी कुंठाओं, दंभ, लालच, स्वनिर्मित मिथ्या श्रेष्ठता, और अन्यों पर शासन करने की इच्छाओं से अपने शिष्यों को किलिंग मशीन के रूप में भी तैयार करके चारों ओर विध्वंस फैला सकता है|
जबकि एक सद्गुरु अनगढ़ शिष्यों को सुघड़, मजबूत लेकिन संवेदनशील और अहिंसक मनुष्य बना सकता है जिनके लिए हिंसा आपद धर्म हो और जब भी यह जीवन में आये तब जीव और जीवन की रक्षा हेतु उनके अन्दर अवतरित हो|
एक युद्ध कला का गुरु ही शिष्य को सिखा सकता है और दैनिक व्यवहार के माध्यम से सिखा सकता है कि कला बड़ी क्रिया सीखने का नाम नहीं बल्कि अन्दर उमड़ने वाली छोटी छोटी प्रतिक्रियाओं को गिराते जाने का नाम है| प्रतिद्वंदी की क्रियाओं की प्रतिक्रियाओं से निर्णित होगा कि अन्दर कितनी गहराई है?
गुरु के विज़न से ही कच्ची मिट्टी के सामान शिष्य के अन्दर एक कुशल योद्धा के अस्तित्व का निर्माण होगा|
फ़िल्म में एक बेहद महत्त्वपूर्ण दृश्य है जहां जादेन स्मिथ एक स्त्री को पहाड़ की चोटी पर बने भवन के एक कंगूरे पर खड़े होकर मार्शल आर्ट का अभ्यास करते हुए देखता है| इसमें सबसे आश्चर्यजनक है स्त्री के सामने उससे 2 फुट की दूरी पर एक स्तम्भ पर कोबरा बैठा हुआ है और जादेन को खिड़की से दिखाई देता है कि स्त्री कोबरा की हरकतों की नक़ल कर रही है|
जैकी चैन, जादेन की दृष्टि से उपजी देखे हुए की व्याख्या को ठीक करते हुए कहते हैं कि कोबरा स्त्री की नक़ल कर रहा है क्योंकि स्त्री शांत हो गयी है दिमाग से और दिल/चित्त से |
कहते हैं कि जानवर विशेषकर सर्प परिवार के सदस्य मनुष्य के भावों की प्रतिक्रिया देते हैं अगर उनके सामने पड़ा मनुष्य घबरा रहा है तो बहुत संभावना है कि सर्प उसे डस लेगा क्योंकि उसे भय है कि उससे भयभीत मनुष्य उस पर आक्रमण अवश्य करेगा|
जैकी जादेन को सबसे बड़ा सबक देते हैं –
“बीइंग स्टिल” एंड “डूइंग नथिंग” आर टू वेरी डिफरेंट थिंग्स
इस फ़िल्म में जिस तरह से अध्यात्म से सम्बंधित दर्शन को पिरोया गया है उससे यह एक विशिष्ट फ़िल्म बन गयी है| और जैकी चैन की एक्शन कॉमेडी फिल्मों से भरी फिल्मोग्राफी में एक अति विशिष्ट और सार्थक फ़िल्म|
आधुनिक जीवन की झलकियों के साथ एक प्राचीन मार्शाल आर्ट कला के रहस्यमयी तौर तरीकों के समुचित मात्रा वाले मेल से फ़िल्म शुरू से अंत तक रोचक बनी रहती है|
जादेन स्मिथ,एक अमेरिकन किशोर, ही फ़िल्म के नायक हैं लेकिन समूची फ़िल्म से भी बड़ा होकर जो उभरता है वह उसके मार्शल आर्ट और जीवन गुरु के रूप में सामने आया, दूसरी संस्कृति में जन्मा, पला बढ़ा, एक प्लंबर कम इलेक्ट्रिशियन कम मेकेनिक का चरित्र है जिसे जैकी चैन ने निभाया है| यह चरित्र फ़िल्म का दर्शन है|
मनुष्य सम्पूर्ण नहीं होता और हरेक में कुछ न कुछ मानवीय कमजोरी अवश्य होती है| जैकी चैन के चरित्र की साधारणता में भी विशिष्टता के बावजूद एक रहस्यमयी कमजोरी है जिसे बहुत फ़िल्में देख चुके दर्शक तो अपने सिनेमाई अनुभव के कारण पहली ही बार में पहले ही पहचान सकते हैं लेकिन फ़िल्म के अन्दर एक किशोर चरित्र के लिए वह अबूझ और रहस्यमयी पहेली हो सकती है|
जिस कार को बड़े जतन से सजाते हुए जादेन अपने गुरु को देखता है, उसे एक दिन तहस नहस करते देख उसका भयभीत होना स्वाभाविक है कि क्या वह सही गुरु के पास मार्शल आर्ट की ट्रेनिंग ले रहा है?
फ़िल्म में भावनाओं, और कॉमेडी का संतुलित मिश्रण सामने आता है तो मार्शल आर्ट की प्रतियोगिता का उत्तेजित कर देने वाला रोमांच भी उपलब्ध है|
कराटे किड की इसकी पूर्ववर्ती फिल्मों से अलग जैकी चैन इसें मार्शल आर्ट गुरु के चरित्र को एकदम आधुनिक साधारण इंसान बना पाने में सफल रहे हैं, ऐसा व्यक्ति जिसे ऊपर से देखने पर उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के बारे में अनुमान लगाना असंभव है|
हॉलीवुड प्रोडक्शन की भव्यता लिए हुए फ़िल्म चीन की कुछ ऐतिहासिक इमारतों और पर्वतीय सुन्दरता को बखूबी प्रस्तुत करती है| फ़िल्म मार्शल आर्ट के साथ जुडी एक मिथकीय रहस्यमयी छवि को बरकरार रखती है और इसमें सबसे बड़ा उओग्दान निस्संदेह जैकी चैन के परदे पर दिखाए करतबों और उनके द्वारा मार्शल आर्ट गुरु के चरित्र को निभाने के तौर तरीकों का है|
सांस्कृतिक सम्मिश्रण में उदारता और लचीलापन कितनी बड़ी भूमिका निभाते हैं यह भी फ़िल्म का एक मुख्य फोकल प्वाइंट है और वास्तविक जीवन में हांगकांग से हॉलीवुड में जाकर अपनी सफलता के परचम लहराने वाले एशिया के सबसे बड़े सितारा अभिनेता जैकी चैन से ज्यादा इस बात को कौन समझता होगा और कौन इसे परदे पर प्रस्तुत कर पाता!
फ़िल्म की इससे बड़ी सफलता क्या होगी कि कराटे शीर्षक से बनी फ़िल्म एक तरह से कुंग फू और अन्य फ्री स्टाइल लड़ाका पद्यतियों के मिश्रण को प्रतियोगिता में दिखाती है और दर्शक को इस मिलावट से कोई दिक्कत नहीं होती|
…[राकेश]
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