
जब मैंने कहा, तकरीबन बीस बरस पहले, कि
आदमी-आदमी समान नहीं हैं,
भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी (सी.पी.आई) ने मेरी आलोचना करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया और कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष – एस. ऐ . डांगे ने घोषणा की कि शीघ्र ही उनका दामाद, जो कि एक प्रोफ़ेसर है, एक किताब लिखने वाला है, मेरे विचार – कि आदमी आदमी समान नहीं होते– के खिलाफ| उसने मेरे खिलाफ एक किताब लिखी है, हालांकि उसमें कोई तर्क नहीं है, वहाँ है केवल गुस्सा, गालियाँ और झूठ- कहीं कोई तर्क नहीं यह सिद्ध करने को कि आदमी समान होते हैं|
उसने मेरे खिलाफ थीसीस लिखी है क्योंकि मैं लोगों के दिमागों को भ्रमित कर रहा हूँ| ठीक ठीक यह पता लगाना असंभव है कि मैं ईश्वरवादी हूँ या अनीश्वरवादी, मैं एक धार्मिक व्यक्ति हूँ या धर्मो की खिलाफत करने वाला| पूरी थीसिस में वह यह सुनिश्चित करने की कोशिश करता है कि – मैं कौन हूँ- और यह काम असंभव जान पड़ता है और वह निष्कर्ष निकालता है कि मैं केवल भ्रम उत्पन्न करने वाला व्यक्ति हूँ|
अमृत डांगे, भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष और दुनिया के सबसे पुराने कम्यूनिस्टों में से एक, रशियन क्रान्ति के समय अन्तर्राष्ट्रीय कम्यूनिस्ट पार्टी के सदस्य भी थे, लेनिन और ट्रोट्स्की के साथ वे भी एक सदस्य थे| संयोग से हम दोनों एक ही कूपे में यात्रा कर रहे थे|
उन्होंने मुझसे कहा,
” क्या आपने देखा, मेरे दामाद ने आपके बारे में एक किताब लिखी है| वह तीन साल तक आपका अध्ययन करता रहा है| आपने इतना ज्यादा साहित्य रच दिया है कि आपके ऊपर शोध करना लगभग असंभव काम है| वह रात दिन लगा हुआ था और पागल हुआ जा रहा था| और आप असंभव लक्ष्य प्रतीत होते हैं| केवल यही नहीं कि आप पहले अपने ही कहे के विरोध में कहते हैं बल्कि आप इस नये कहे के भी विरोध में कहते हैं और उससे नये कहे के भी विरोध में कह देते हैं और अंत में यह पता लगाना असंभव हो जाता है कि आप क्या कहना चाहते हैं… और अंत में वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा है|”
मैंने कहा,
”आप इस किताब को ट्रेन से बाहर फेंक दें| उनसे कहियेगा कि वे मूर्ख हैं| उन्होंने क्यों तीन साल बर्बाद कर दिए| जीवन इतना छोटा है और आप एक कम्यूनिस्ट हैं: ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत | मेरे जैसे पागल आदमी के ऊपर इतना समय क्यों बर्बाद करना?”
मैंने उनके हाथ से किताब ली और खिड़की से बाहर फेंक दी|
उन्होंने कहा,” यह क्या किया आपने| यह तो बहुत हो गया|”
मैंने कहा,” आप इमरजेंसी चेन खींच सकते हैं| आखिर यह लाल चेन किसलिए हमेशा लटकी रहती है|” पर तब तक ट्रेन मीलों दूर आ चुकी थी और मध्य रात्री का वक्त था|
अमृत डांगे ने कहा,”अब चेन खींचने से कोई लाभ नहीं होगा, अगर मैं चेन खींच भी दूँ …हम मीलों दूर आ चुके हैं और आधी रात हो चुकी है- हम कहाँ किताब को तलाशेंगे| वैसे भी बहुत चिंता की बात नहीं है| मेरे दामाद के पास इस किताब का पूरा का पूरा संस्करण पड़ा हुआ है| एक भी किताब बिकी नहीं है| क्योंकि लोग कहते हैं – भारत में एक स्पष्ट विभाजन था , या तो लोग मेरे पक्ष में थे या विरोध में, जो मेरे पक्ष में थे वे मेरी किताबें पढ़ रहे थे और वे उनके दामाद की लिखी किताब पर समय नष्ट करने की बात सोचते भी नहीं और जो मेरे विरोध में थे वे मेरा नाम भी सुनना नहीं चाहते थे- मुझ पर लिखी किताब पढ़ना तो दूर की बात है|”
सो अमृत डांगे ने कहा,”हमारे पास सारी किताबें हैं| शायद आप ठीक कहते हैं, मेरा दामाद मूर्ख है| उसने तीन साल नष्ट कर दिए और यह किताब उसने अपने पैसे से छपवाई है क्योंकि कोई भी प्रकाशक तैयार नहीं था इसे छापने के लिए, “क्योंकि”, उन्होंने कहा,” इस विषय में भारत में एक स्पष्ट विभाजन है, निष्पक्ष लोग हैं ही नहीं तो इस किताब को खरीदेगा कौन”| उसने अपने पैसे से किताब छपवाई और अब उनके ढेर पर बैठा हुआ है|”
मैंने कहा,” आप इसे बाँट सकते हैं जैसे आपने मुझे दी| बाँट दीजिए| लोगों को पढ़ने दीजिए| हालांकि उन्हें कुछ सार्थक सामग्री नहीं मिलेगी, क्योंकि आपके दामाद तीन साल लगा कर भी नहीं खोज पाए कि मेरा तात्पर्य क्या है| यह कोई भी नहीं जान सकता क्योंकि में कोई तार्किक, दार्शनिक सिद्धांत नहीं कह रहा हूँ…मैं पूर्ण अस्तित्व हूँ|”
विश्वसनीय धर्म न तो ईश्वरवादी होगा और न ही अनीश्वरवादी!
विश्वसनीय धर्म न तो भौतिकवादी होगा और न ही आध्यात्मिक!
विश्वसनीय धर्म पूर्णतावादी होगा!
यह जीवन को खांचों में विभाजित नहीं करेगा| यह पापी और पुण्यात्मा, और स्वर्ग और नरक के सारे विभाजनों को नष्ट करेगा|
मैंने बहुत सारे कम्यूनिस्टों से पूछा है, बहुत पुराने कम्यूनिस्टों से …
मैंने डांगे से पूछा,”क्या आपने कभी ध्यान (मेडिटेशन) किया है?”
उन्होंने कहा,”ध्यान? किसलिए? मुझे ध्यान क्यों करना चाहिए?”
मैंने कहा,” अगर आपने कभी ध्यान नहीं किया तो आपके पास अधिकार नहीं है यह कहने का कि कोई आत्मा नहीं है, कोई ईश्वर नहीं है, कोई चेतना नहीं है| अपने अंदर गहरे में उतरे बिना आप कैसे कह सकते हैं कि अंदर कोई नहीं है? और ऐसे कथनों की निरर्थकता देखिये- कौन कह रहा है कि अंदर कोई नहीं है? निषेध के लिए भी आपको यह स्वीकार करना होगा कि कोई है| यह भी कहने के लिए कि कोई नहीं है इस बात की कल्पना करनी होगी कि कोई है|”
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