योगेन्द्र यादव के मूल रूप से अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत है :-
अगर हम आज सकारात्मक राष्ट्रवाद को पुनः प्राप्त करने के लिए कदम बढायें तो बहुतों की निगाह निर्मल वर्मा की वैचारिकी की ओर बिल्कुल न जायेगी, उसे अपनाने की बात तो दूर है| कुछ के लिए वे ऐसी श्रेणी के विचारक हैं जिन्हें अपनाना एक असंभव सी बात दिखाई देती है| बहुत से लोग उन्हें इस परियोजना के लिए इसलिए अयोग्य मानेंगे, क्योंकि उन्हें भय लगता है कि निर्मल वर्मा के विचारों को अन्य संकीर्ण मानसिकता वाले राष्ट्रवादियों द्वारा अपनाया जा सकता है| निर्मल वर्मा की वैचारिकी के प्रति ऐसी धारणा ही एक ठोस वजह प्रदान करती है कि हमें विचारक निर्मल वर्मा को पुनः याद करने की आवश्यकता है| इस वर्ष अक्टूबर में उनकी 20वीं पुण्यतिथि ऐसा एक अवसर हमारे लिए लेकर आ रही है|
समकालीन भारत में विचारों की दुनिया में निर्मल वर्मा कोई बहुत ज्यादा जाना-पहचाना नाम नहीं है। बहुत कम लोग उनके बारे में जानते हैं| जो लोग उन्हें जानते भी हैं, वे आमतौर पर उन्हें साहित्यिक दुनिया में फिक्शन लिखने वाला लेखक ही समझते हैं। कुछ लोग अगर उनके सामाजिक और राजनीतिक लेखन को पढ़ते भी हैं, तो वे इस बात को लेकर अनिश्चित रहते हैं कि उनके निबंधों से क्या अर्थ निकाला जाए?
यद्यपि वे कोई अज्ञात भारतीय तो थे नहीं| अगर उनके रचनात्मक कार्यों का लेखा जोखा देखें तो पांच उपन्यासों, एक दर्जन कहानी संग्रहों, नाटक और यात्रा-वृत्तांतों तथा यूरोपीय क्लासिक्स के एक दर्जन से अधिक अनुवाद रचकर वे हिंदी संसार में 20वीं सदी के सर्वश्रेष्ठ कथा लेखकों में से एक रहे हैं| ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित निर्मल वर्मा को मुख्य रूप से एक रचनात्मक लेखक के रूप में याद किया जाता है, न कि एक विचारक के रूप में। अंग्रेजी में भी उतने ही निष्णात होने के बावजूद उन्होंने हिंदी में ही लिखना चुना, लेकिन इस बात ने उनकी छवि बनाने या सुधारने में सहायता नहीं दी| उन पर आरोप लगाए गए कि जीवन के अंतिम वर्षों में उनका झुकाव भाजपा की ओर हो गया और उन्हें हिंदुत्व समर्थक कहा जाने लगा। उन्होंने ऐसे आरोपों को तिरस्कार की दृष्टि से देखा, लेकिन मंदिर और मंडल विवादों पर उनके विवादास्पद विचारों के कारण ऐसे आरोप उनसे चिपक कर रह गए|
साहित्यिक आलोचकों ने तो उनके उपन्यासों और अन्य रचनात्मक लेखन के बारे में विस्तार से लिखा है, लेकिन उनके चिंतनशील निबंधों के 10 संग्रह न्यायोचित ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए हैं।
यह विरोधाभास महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके निबंध उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का विस्तार मात्र नहीं हैं। जैसा कि आलोक भल्ला ने उनकी पुस्तक इंडिया एंड यूरोप : सिलेक्टेड एसेज (2000), जो उनके निबंधों का एकमात्र अंग्रेजी संग्रह है, की भूमिका में लिखा है| उनके साहित्यिक और निबंध लेखन, दोनों के बीच स्पष्ट अंतर है। निर्मल वर्मा के उपन्यास स्पष्ट रूप से आधुनिकतावादी थे, यह उन लोगों के बीच व्याप्त शुष्क चुप्पी को उजागर करते थे जो एक-दूसरे पर विश्वास खो चुके थे। लेकिन उनके चिंतनशील निबंध आधुनिकता से मोहभंग की अभिव्यक्ति हैं। सबसे पहले संग्रह शब्द और स्मृति (1976) ने एडवर्ड सेड के ओरिएंटलिज्म के प्रकाशन से पहले, प्राच्यवादी ज्ञान की भारतीय आलोचना की नींव रखी। पुस्तक के एक अग्रणी निबंध, अतीत: एक आत्मनिर्भर मंथन, ने जो मार्ग प्रशस्त किया,उसी पर चलकर बाद में वैसे ही तर्क आशीष नंदी ने दिए; कि अतीत से संबंध बनाने का भारतीय तरीका बहुत अलग है, और उनका सोचना है कि इससे बुरा कुछ नहीं हुआ, जिसे हम इतिहास कहते हैं|
कला का जोखिम(1981), इतिहास, स्मृति, आकांक्षा (1991), और साहित्य का आत्म सत्य (2005) जैसे संग्रहों में उपस्थित उनके निबंधों को व्यापक अर्थों में सांस्कृतिक आलोचना कहा जा सकता है| उनके निबंध अक्सर साहित्य, कला, और सृजनात्मकता के विषयों से संबंधित होते थे|
उनके सभी चिंतनशील लेखन के पीछे एक मौलिक प्रश्न छिपा है: क्या हम भारतीय सभ्यता को उस आंतरिक विघटन से बचा सकते हैं जो उसने औपनिवेशिक मुठभेड़ के परिणामस्वरूप अनुभव किया?
शताब्दी के ढ़लते वर्षों में (1995), और, दूसरे शब्दों में (1999), जैसे संग्रहों में, उन्होंने यह प्रश्न राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, सभ्यता और यूरोप के साथ भारत की मुठभेड़, के माध्यम से सीधे तौर पर उठाया। यूरोपीय साहित्य और कला के बारे में 20वीं सदी के किसी भी अन्य हिंदी लेखक का अध्ययन और समझ, निर्मल वर्मा के अध्ययन और समझ की गहराई से मेल नहीं खाती।
1988 में हेडेलबर्ग विश्वविद्यालय में दिया गया उनका व्याख्यान, भारत और यूरोप: प्रतिश्रुति के क्षेत्र, औपनिवेशिक मुठभेड़ की सूक्ष्म व्याख्याओं और उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन के युग में एक स्वतंत्र आवाज को बनाए रखने के लिए उल्लेखनीय है। 2024 में दो खंडों में संकलित, उनके साक्षात्कारों के संग्रह – संसार में निर्मल वर्मा, के प्रकाशन से विचारक निर्मल वर्मा की एक समग्र तस्वीर सामने आती है।
इतने सारे रचनात्मक कार्य के बावजूद, मुझे एक भी विद्वत्तापूर्ण पुस्तक या यहां तक कि एक भी विस्तृत निबंध नहीं मिला जो उथले वाद-विवाद से परे जाकर उनके विचारों की गंभीर रूपरेखा या आलोचना प्रस्तुत करता हो। निश्चय ही इस कमी को दूर करने की जरूरत है।
इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि राजनीतिक साझेदारी इस शून्य को भरने में बाधा बनती है। निर्मल वर्मा के जीवनपथ के मोड़ों ने उनके जीवनकाल में ही काफी विवाद उत्पन्न किया| उन्होंने कम्युनिस्ट के रूप में शुरुआत की लेकिन चेकोस्लोवाकिया में एक दशक तक रहने के दौरान उनका इस विचारधारा से मोहभंग हो गया|
उनकी उपन्यास सृजन यात्रा राजनीतिक विवादों से दूर रही, लेकिन उनके निबंधों ने धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और आधुनिक विकास के आदर्शों पर प्रश्न उठाना शुरू कर दिया, जो उस समय आस्था के विषय थे। उन्होंने बौद्धिक प्रेरणा के लिए भारतीय परंपराओं, बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस (विवेकानंद से भी अधिक), श्री अरबिंदो और सबसे बढ़कर महात्मा गांधी (जवाहर लाल नेहरू नहीं) की ओर रुख किया। आपातकाल और उसके बाद ओबीसी आरक्षण के प्रति उनके विरोध, तथा बाबरी मस्जिद विध्वंस और पोखरण परीक्षणों पर उनकी दुविधा ने उनके बौद्धिक एकाकीपन को और घनीभूत कर दिया।
दिलचस्प यह भी हुआ कि एक तरफ वामपंथियों ने तो उनका बहिष्कार किया, उन पर हमला किया, लेकिन दक्षिणपंथी कभी भी आगे बढ़कर उनके विचारों को अपना नहीं सके।
हमें निर्मल वर्मा जैसे विचारक पर दोबारा विचार क्यों करना चाहिए? और अब ऐसा करने की आवश्यकता क्यों आन पडी है? इसकी आवश्कियकता इसलिए है क्योंकि –
- निर्मल हमें ऐसे प्रश्न पूछने के लिए मजबूर करते हैं, जिन्हें प्रगतिशील आधुनिक भारतीय टालते रहे हैं|
- इस चुप्पी और उदासीनता से पैदा हुए रिक्त्त स्थान ने हमारे राष्ट्रवाद को एक नकली रूप में कैद कर लिया है|
- निर्मल वर्मा ने ये प्रश्न एक साथ तीखे और रचनात्मक तरीके से पूछे हैं|
- जब तक हम इन असुविधाजनक प्रश्नों का सामना नहीं करेंगे, हम अपना राष्ट्रवाद पुनः प्राप्त नहीं कर सकते|
सांस्कृतिक या कहें सभ्यतागत मुद्दे निर्मल वर्मा की बौद्धिक खोज के केन्द्र में हैं। वह स्वतंत्रता के बाद के भारतीय राष्ट्रीय राज्य को भारतीय सभ्यता का उत्तराधिकारी, एक आधुनिक राज्य मानते हैं, जो विकास के प्रमुख पश्चिमी प्रतिमान का विकल्प गढ़ने की जिम्मेदारी वहन करता है।
भारत की एकता और इसकी क्षेत्रीय अखंडता के बारे में उनका बेबाक चिंतन एक व्यापक गैर-भाषाई चिंता में निहित है। उनका उत्तर अस्पष्ट है और अक्सर संकेत करता दिखाई देता है कि हिंदू राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संरक्षक हैं|
फिर भी हमारे सामने यह प्रश्न तो है ही कि हम भारत की एकता और अखंडता के लिए राष्ट्रवादी चिंता को कैसे परिभाषित करें और राष्ट्रवाद पर दावा कैसे करें?
धर्मनिरपेक्षता की उनकी आलोचना, निर्मम और कभी-कभी अतिशयोक्तिपूर्ण दिखाई देती है| फिर भी इसमें हिंदू कट्टरवाद की आलोचना के लिए तर्क भी प्रस्तुत किए गए। उनकी वैचारिकी हमें आत्मचिंतन करने के लिए आमंत्रित करती है: क्या अब तक की धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने मनचाहे स्मृतिलोप में लिप्त होने का मार्ग नहीं अपनाया?
निर्मल वर्मा ने भारत की जीवंत परम्पराओं का गहरा, यद्यपि थोड़ा रोमांटिक, बचाव किया। इन परंपराओं के प्रति उनकी मान्यता जातीय केन्द्रवाद से ग्रसित नहीं है; उनके लिए भारतीय सभ्यता एक ऐसे ब्रह्माण्ड के समग्र दृष्टिकोण को आगे बढ़ाती है, जो निश्चित रूप से केवल मनुष्य को ही विश्व का केन्द्र नहीं मानता| इस धारणा को आधुनिक पश्चिम संसार ने खो दिया है।
निर्मल वर्मा ने बंगाल पुनर्जागरण के दिग्गजों सहित आधुनिक भारतीय मानस की आलोचना इस नाते की कि उन्होंने पश्चिम के समक्ष बौद्धिक आत्मसमर्पण कर बौद्धिक गुलामी स्वीकार कर ली| आप कह सकते हैं कि निर्मल वर्मा की भारतीय सभ्यता की कहानी में हिंदू, बौद्ध और सिख धर्म का समावेश है, और भारत में इस्लाम की भूमिका के बारे में उनकी कहानी अस्पष्ट है। भारतीय समाज में जातिगत असमानता के प्रश्न को उन्होंने नकारा नहीं लेकिन स्पष्ट रूप से एक असहजता अवश्य है।
फिर भी वे हमारे सामने बड़े प्रश्न छोड़ गए हैं;
क्या उपनिवेशवाद की हमारी आलोचना उसके राजनीतिक और आर्थिक परिणामों तक ही सीमित है?
या फिर हम उपनिवेशवाद के भारतीय स्वत्व पर पड़ने वाले बौद्धिक और सांस्कृतिक परिणामों को देखने के लिए तैयार हैं?
और यदि हम ऐसा करते हैं, तो
हम उस सांस्कृतिक विषमता का सामना कैसे नहीं कर सकते हैं, जो राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद से भारतीय मानस को आकार देती रही है?
हम इस निरन्तर सांस्कृतिक उपनिवेशवाद का किस प्रकार जवाब देंगे जो हमारे राजनीतिक, आर्थिक और शैक्षिक संस्थानों में व्याप्त हो गया है?
निर्मल वर्मा अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं थे जिन्होंने ऐसे प्रश्न पूछे और जो आधुनिक भारतीय बुद्धिजीवियों के संसार में हाशिये पर धकेल दिए गए| ऐसे कई नाम सामने आते हैं, ए के सरन, जे पी एस उबेरॉय, रमेश चन्द्र शाह, दया कृष्ण, धर्म पाल, और आशीष नंदी|
उन सब नामों में से कुछ के विपरीत, निर्मल वर्मा ने उपरोक्त प्रश्नों को अपने समय के मुद्दों से जोड़ा, कभी-कभी वाद-विवाद का सहारा भी लिया|
उनके उत्तरों को नये राष्ट्रवाद का अंतिम उत्पाद या परिणाम मानना जल्दबाजी होगी। लेकिन उनके सवालों को अपने राष्ट्रवाद पर पुनर्विचार करने के लिए शुरुआती बिंदु के रूप में न लेना तो निश्चय ही एक बड़ी गलती होगी।
(योगेन्द्र यादव)
हिंदी अनुवाद …[राकेश]

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