ख़ुदा के वास्ते इस को न टोको
यही इक शहर में क़ातिल रहा है

~ मज़हर मिर्ज़ा जान-ए-जानाँ

सर्वप्रथम तो मिसेज देशपांडे की सबसे बड़ी खासियत है कि इसने माधुरी दीक्षित जैसी समर्थ अभिनेत्री को ओटीटी के अखाड़े में ही नहीं उभारा दिया बल्कि फिल्म जगत को भी यह नोटिस करवा दिया होगा कि माधुरी पर केन्द्रित बहुत सी सिनेमाई कल्पनाएँ साकार हो सकती हैं| उनके जैसी सशक्त अभिनेत्री पचास पार के चरित्रों को परदे पर साकार कर भारतीय सिनेमा को परिपक्व बनाने में भरपूर योगदान दे सकती हैं|

माधुरी दीक्षित की एक उल्लेखनीय फिल्म थी राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित पुकार, जिसमें माधुरी ने प्रेम में असफलता मिलने के कारण देश के विरुद्ध काम कर जाने वाली खलनायिका की भूमिका प्रभावशाली ढंग से निभाई थी| पुकार में माधुरी दीक्षित ने अपनी आँखों से क्रोध, कुंठा और बदले की चमक इस असलियत से दर्शाई थी कि उनका चरित्र सारी फिल्म पर भारी पड़ गया था| हालांकि उन्हें कई पुरस्कारों में नामांकन के बावजूद कोई भी पुरस्कार इस सशक्त अभिनय के लिए नहीं मिला| पुकार ने यह तो तभी सिद्ध कर दिया था कि माधुरी ऋणात्मक भावों वाले चरित्र भी बेहतरीन ढंग से निभा सकती हैं|

मिसेज देशपांडे में चेहरे पर मुस्कान और आँखों में एक रहस्यमयी चमक बनाए रखकर माधुरी ने सीमा देशपांडे/जीनत के चरित्र को जैसा वजूद चाहिए वैसा ही प्रदान किया है| सूर्य- नमस्कार और अन्य योग-अभ्यास सहज रूप से करती हुयी माधुरी मौन रूप में ही यह स्थापित कर देती हैं कि शारीरिक रूप से उनके पास उनके चरित्र द्वारा आवश्यक शारीरिक गठन, सक्रियता, साहस, और हाव भाव आसानी से उपलब्ध रहा है| जैसे जैसे सीरीज में उनका चरित्र आगे बढ़ता है उनके चरित्र के इर्द गिर्द उपस्थित रहस्य की परतें हटना शुरू होती हैं लेकिन उनके हाव भाव से यह असर हर दृश्य में बना रहता है कि अभी इस चरित्र ने सारे राज नहीं खोले हैं और अभी भी बहुत कुछ है जो सीमा/जीनत किसी को भी नहीं बता और जता रही| यहाँ तक कि जब लगता है सभी कुछ तो बताया जा चुका है, चरित्र के रूप में माधुरी दीक्षित का रुख दर्शकों में उत्सुकता बरक़रार रखता है और पूरी सीरीज में दर्शक एक इसी उत्सुकता के भरोसे “अब क्या होगा” से ज्यादा अब “माधुरी क्या करेंगीं” के इंतज़ार में रहता है| यहाँ तक कि सीरीज के अंत में जब परदे पर सभी कुछ निबट गया प्रतीत होता है, माधुरी अपनी आँखों की चमक और चेहरे की मुस्कान से संदेह जगाने में कामयाब हो जाती हैं कि पिक्चर अभी बचती है और ऐसा ही होता भी है और दर्शकों को उत्सुकता के साथ छोड़ सीरीज का पहला भाग इस अदा के साथ निबटता है कि आगे बहुत सारी संभावनाएं हैं!

सीरीज में दर्शाई सामग्री का विश्लेषण किया जाए तो फ्रेंच सीरीज La Mante पर आधारित इस भारतीय संस्करण – मिसेज देशपांडे, में कुछ बदलाव किये गए हैं| फ्रेंच सीरीज को भी मनोविज्ञान की कसौटी पर कसा जाए तो उसमें भी कुछ मूलभूत कमियां थीं, वे सभी तो मिसेज देशपांडे में आ ही गयीं, सीरीज़ का भारतीयकरण करने के लिए की गयी कार्यवाही के कारण मिसेज देशपांडे में कुछ और भी कमियाँ जुड़ गयीं जो भारतीय परिवेश से मेल नहीं खातीं|

मिसेज देशपांडे इस पहले भाग में कहीं भी यह स्थापित नहीं कर पाती कि सीमा देशपांडे ने अपने पति का क़त्ल क्यों और कब किया? 8 हत्यायों की दोषी सीमा देशपांडे ने अपने पति की हत्या करने से पूर्व जितनी भी हत्याएं की होंगी उस काल में उनका बर्ताव पति अभय देशपांडे के साथ कैसा रहा, या उनके बीच उस दौरान कैसा रिश्ता रहा? पुलिस कमिश्नर अरुण (प्रियांशु चटर्जी) के माध्यम से ही पता चलता है कि सीमा को अपने पीटीआई की हत्या के आरोप में पकड़ा गया था और बाकी अपराध उसने स्वयं ही कुबूल किये| लेकिन बाकी अपराध वह स्वयं क्यों स्वीकारेगी, इसका कारण नहीं दिखाया गया? क्या समाज में शोषण बंद हो गया जो अब वह बाकी ज़िंदगी जेल में काटने पर राजी हो गयी है? अगर अगला भाग बनता है तो बहुत कुछ सामने आ सकता है और तब इस भाग की कमियाँ इतना नहीं खालेंगीन लेकिन अगर अगला भाग नहीं बन पाता तो इस भाग से कमियों को नज़रंदाज़ करना मुश्किल है|

सीरीज की सबसे बड़ी कमी पिता का चरित्र और सीमा देशपांडे संग पिता का रिश्ता है| यह कमी मूल फ्रेंच सीरीज में भी है| मनोविज्ञान को दोनों फ्रेंच और हिन्दी, संस्करणों में नाकामी देखनी पड़ती है| ट्रामा का कारण फ्रेंच में अगर बार बार का शोषण है तो यहाँ हिन्दी में सिर्फ़ एक बार का शोषण दिखाया है| सीमा देशपांडे को जिस वजह से एक सीरियल किलर बनते दिखाया गया है वह दोनों ही श्रंखलाओं में कमी से परे नहीं है| हिंदी में तो सीमा देशपांडे को हत्याओं के समय विवाहित भी दिखा दिया| पति का अत्याचारी रूप उसे हत्यारिन क्यों नहीं बना सकता था? अगर सीरीज उसे जोसेफ के बदले अपने पति की हत्या करते दिखाती और उसके पिता को केवल उसकी सहायता और रक्षा करने वाला अभिभावक तो सीरीज़ का भारतीयकरण ज्यादा सटीक ढंग से होता| तब उसका पिता हत्यारा भी नहीं बनता|

सीरीज अपने रहस्य से बंधे रखती है उस समय तक जब तक कि सीमा के पिता का कोण सामने नहीं आता| उसके सामने आने पर वह एक लचर भाग लगता है अभी तक के बीते के तर्क पर खरा नहीं उतरता| तब बहुत से वैध प्रश्न खड़े होते हैं कि सीमा ने अब तक उससे बदला क्यों नहीं लिया?

माधुरी दीक्षित के अभिनय के दर्शन हेतु यह दर्शनीय सीरीज है जिसे निर्देशकनागेश कुकुनूर और ज्यादा तार्किक बना सकते थे| अन्य कलाकार माधुरी दीक्षित को प्रभावशाली बनाने में अपने भूमिकाएं ठीक निभा जाते हैं| पर ऐसा कोई नहीं लगता कि जिसे अलग से इस तरह से नोटिस किया जा सके कि क्या शानदार अभिनय किया है| एलेक्स की छोटी भूमिका में विश्वास किनी अवश्य ध्यान खींचते हैं, संदिग्ध से मासूम होने के आर्क के बीच सीरीज उनके चरित्र का अच्छा इस्तेमाल करती है और इस लम्बे अंतर को वे बखूबी निभा जाते हैं|

…[राकेश]


Discover more from Cine Manthan

Subscribe to get the latest posts sent to your email.