मधुलिका कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी, वे सब बरौयों में गुँथे जा रहे थे| रुण देख रहा था कृषक कुमारी मधुलिका को।
आह ! कितना भोला सौंदर्य ! कितनी सरल चितवन ! (पुरस्कार ~ जय शंकर प्रसाद)


…[राकेश]
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