श्याम बेनेगल की फ़िल्म - Welcome To Sajjanpur (2008) मात्र एक कॉमेडी फ़िल्म न होकर सामाजिक-राजनीतिक व्यंग्य है और एक अच्छे व्यंग्य की तरह सामाजिक विसंगतियों पर हास्य-व्यंग्य के माध्यम से चुटीली चोट करती है| इस फ़िल्म में कथा-पटकथा लेखक अशोक मिश्रा की लेखनी... Continue Reading →
श्याम बेनेगल का सिनेमा वर्तमान के "Make in India" नारे पर विशुद्ध रूप से खरा उतरता है| श्याम बेनेगल की विविधता से भरी फिल्मोग्राफी इतनी संपन्न है कि भारत के सामजिक-राजनीतिक इतिहास को देखने, जानने और समझने के लिए दर्शक की... Continue Reading →
भारतीय मिथक के किस्सों में खोजें तो बहुत से उदाहरण (श्रीराम -ब्रह्मास्त्र, अश्वत्थामा - द्रौपदी पुत्र एवं उत्तरा गर्भ, परशुराम-कर्ण शस्त्र विद्या प्रसंग आदि) मिल जायेंगे जहां युद्ध कला या शस्त्र विद्या के दुरूपयोग से तबाही मची| इसलिए इसके लिये हर काल में कुछ नियम कायदे बनाए गए और... Continue Reading →
जैकी चैन के मनोरंजक सिने संसार में प्रवेश करने का कार्य इस फ़िल्म के माध्यम से पूरा किया जा सकता है| इस फ़िल्म में कई फिल्मों को देखने का आनंद प्राप्त होता है| इसमें स्पाई फिल्मों की रहस्यमय दुनिया है, साजिशें... Continue Reading →
18-19 साल का अरसा बड़ा होता है एक फ़िल्म के पुराने पड़ जाने, और विषय के बासी हो जाने के लिए, लेकिन अपने बहुत से गुणों के कारण दिबाकर बनर्जी की अभी तक की सबसे अच्छी फ़िल्म खोसला का घोसला ने अपना जादू... Continue Reading →
अभिनेता अमिताभ बच्चन और निर्देशक यश चोपड़ा की जोड़ी ने हिंदी फिल्मों के लिए एक बहुत ही उपयोगी संयोजन प्रस्तुत किया है| 1975 से 1981 के बीच इस जोड़ी ने जिन पांच फिल्मों दीवार, कभी कभी, त्रिशूल, काला पत्थर और सिलसिला में काम किया और इन पाँचों फिल्मों में अमिताभ ने नायक... Continue Reading →
किसी फिल्मकार से कहा जाए कि ये जो वर्तमान के भोजपुरी गीतों में अश्लीलता की बातें चल रही है उनमें से किसी जीवित, सक्रिय और प्रसिद्द गायक - गायिका पर एक बायोपिक बना दो तो उसके पसीने छूट जायेंगे क्योंकि श्लील और... Continue Reading →
कवि शैलेन्द्र सा महान गीतकार हो, सचिन देव बर्मन जैसा महान संगीतकार, जिसके गीतों की मिठास की प्रतियोगिता में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले संगीतकार ही रहे हैं, साथ हो, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, जैसे महानतम गायक और एक एक गीत से फ़िल्म के संगीत... Continue Reading →
वी. शांताराम निस्संदेह दृश्यात्मक कल्पना के बेहद उच्च कोटि के सिनेमाई शिल्पी थे| वी.शांताराम की फ़िल्में, अभिनय और संवाद के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा प्रस्तुत दृश्यात्मक कल्पनाओं के लिए हमेशा सराही जायेंगी| एक आम दर्शक या फ़िल्म समीक्षक उनकी फिल्मों पर... Continue Reading →
वी. शांताराम, हिन्दी और मराठी सिनेमा के बहुत बड़े निर्माता, निर्देशक, प्रसिद्द फ़िल्म निर्माण कम्पनी - राजकमल कलामंदिर के स्थापक ही नहीं बल्कि सिनेमा में भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करने वाले अद्भुत कल्पनाशीलता के स्वामी निर्देशक और आपदा में नई विधियां खोज... Continue Reading →
प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किताबों से पढ़कर बच्चे नहीं समझ सकते, लाख अध्यापक अच्छा हो लेकिन अगर बच्चों ने सुबह की बेला में सूर्योदय की हल्की से गहरी होती लालिमा से नारंगी होते जाते आकाश को अपनी आँखों से नहीं... Continue Reading →
ओ टी टी पर प्रदर्शित श्रंखलाओं में पंचायत की अलग ही महिमा है| इसके अलग स्वभाव और इसमें दिखाए संसार ने दर्शकों को बेहद मजबूती से अपना प्रशंसक बनाया है| नामी गिरामी अभिनेताओं से सजी श्रंखलाओं ने वैसा दर्शक वर्ग... Continue Reading →
इंसान के लिए हँसना तो बहुत जरुरी है| यह अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक एवं शारीरिक, का द्योतक भी है और हंसने से व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता भी है| जैसे पौ फट रही हो जंगल में यूँ कोई मुस्कुराए... Continue Reading →
हृषिकेश मुखर्जी एक महान फ़िल्म निर्देशक होने के साथ-साथ अच्छे संगीत के भी पारखी थे और यह उनकी फिल्मों के उच्च स्तरीय संगीत से स्पष्ट हो जाता है| हृषिदा की फिल्मों में संगीत इतना बहुपक्षीय और बहुरंगी रहा है कि इस बात... Continue Reading →
विजय आनंद ने एक निर्देशक के तौर पर अद्भुत गीतों को सिनेमा के परदे पर जन्माया है| विजय आनंद ने शुरू की नौ फ़िल्मों में से एक तीसरी मंजिल को छोड़कर शेष 8 फ़िल्में देव आनंद को नायक बनाकर ही बनाई थीं| तीसरी मंजिल भी निर्माता नासिर हुसैन और निर्देशक विजय... Continue Reading →
मेरी जाँ, मुझे जाँ न कहो मेरी जाँ बरसात की एक रात का गीत है| बरसात के मौसम में अलग अलग सुबह, दिन, शाम और रात की बरसात, बरसात से सम्बंधित किसी न किसी फ़िल्मी गीत की याद दिलाती ही है|... Continue Reading →
मुझे बारिश में चलना सदैव अच्छा लगता है क्योंकि ऐसे में कोई मुझे रोता हुआ नहीं पा सकता - दुनिया के सबसे महान सिनेमाई हास्य कलाकार - चार्ली चैपलिन ने एक बेहद साहित्यिक महत्त्व वाली रचनात्मक बात कही| अभी हाल ही में भारत... Continue Reading →
अष्टावक्र का शरीर 8 जगह से झुका हुआ था इसलिए बचपन से ही उन्हें अष्टावक्र नाम से संबोधित किया जाता था| जब अष्टावक्र केवल 12 वर्ष के थे, तब वे राजर्षि राजा जनक के दरबार में चल रहे शास्त्रार्थ से अपने पिता को बुलाने गये| जनक के दरबार... Continue Reading →
स्कूल के दिन भी क्या दिन होते हैं और व्यक्ति को जीवन भर उनकी स्मृतियाँ अपनी ओर खींचती रहती हैं| हिंदी फ़िल्म उद्योग में जमशेदपुर वासियों की ओर से बनाई गई यह फ़िल्म कम से कम दस साल पुरानी है लेकिन प्रदर्शित... Continue Reading →
दर्द हो दुख हो तो दवा कीजे फट पड़े आसमाँ तो क्या कीजे एक सिनेमा वैसा होता है जिसके लिए कहा जाता है Clash of the Titans. बड़े बड़े धुरंधर अभिनेता एक साथ अपने अभिनय के जौहर दिखाकर सिनेमा के परदे... Continue Reading →
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