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Cinema, Theatre, Music & Literature

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Classics

मीना कुमारी की दौड़ !

मधुलिका कुमारी थी, सुंदरी थी। कौशेय वसन उसके शरीर पर इधर-उधर लहराता हुआ स्वयं शोभित हो रहा था। वह कभी उसे संभालती और कभी अपनी रूखी अलकों को। कृषक बालिका के शुभ्र भाल पर श्रमकणों की भी कमी न थी,... Continue Reading →

Anupama(1966): एक स्त्री और एक पिता की मूर्तियों की गढ़न

JwarBhata(1944): दलीप कुमार की पहली फ़िल्म की समीक्षा

प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक बाबूराव पटेल ने दलीप कुमार की पहली फिल्म ज्वार भाटा (1944) की समीक्षा में दलीप कुमार की बेरहमी से आलोचना की थी| Review Courtesy : Jhinjhar @ IMDB

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं (सनी 1984) : धर्मेन्द्र फैक्टर

और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैंलोग मिलते हैं, जुदा होते हैं कब बिछड़ जाए, हमसफ़र ही तो हैकब बदल जाए, एक नज़र ही तो हैजान-ओ-दिल जिसपे फ़िदा होते हैं और क्या अहद-ए-वफ़ा होते हैं जब रुला लेते हैं जी भर के... Continue Reading →

धर्मेन्द्र : परदे पर स्त्री तिरस्कार का सामना

...[राकेश]

तुम्हारा इंतज़ार है तुम पुकार लो : Khamoshi(1969)

...[राकेश]

Mani Kaul : जहाँ सिनेमा एक ‘राग’ बन गया (HK Verma)

~ © HK Verma हिन्दी अनुवाद – …[राकेश] [नोट : यह लेख श्री एच के वर्मा के अंगरेजी में लिखे लेख का हिंदी अनुवाद है| HK Verma, an alumnus of FTII, is a renowned cinematographer who earlier in his career collaborated with celebrated cinematographer KK... Continue Reading →

चल अकेला, चल अकेला … मुकेश

जोड़ी तोर डाक शुने केऊ ना एशे तोबे एकला चोलो रे। तोबे एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो, एकला चोलो रे। (रविन्द्रनाथ टैगोर) चल अकेला, चल अकेला, चल अकेलातेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला हज़ारों मील लम्बे रास्ते तुझको... Continue Reading →

Chetna (1970) : सिनेमेटोग्राफर कौन?

लेखक निर्देशक बाबू राम इशारा की बहुचर्चित व कुख्यात फ़िल्म चेतना में कैमरे के विशिष्ट प्रयोग किये गए, जिन्होंने दर्शकों के सम्मुख भ्रम उत्पन्न किये, सेंसर बोर्ड के सदस्यों ने भी भ्रम को सच मान इसे "A" श्रेणी में सर्टिफाइड... Continue Reading →

‘श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते’ : ‘दिनकर जोशी’ की कालजयी कृति

गुजराती साहित्यकार दिनकर जोशी जी ने अपने अदभुत उपन्यास “श्याम फिर एक बार तुम मिल जाते” में कृष्ण के न रहने से उपजी एक पर्वत सी ऊँची पीड़ा को दर्शाने का कठिन काम साधा है। कृष्ण के देहत्याग के बाद पीछे छूट... Continue Reading →

दादा साहब फाल्के : लाइट्स…कैमरा…एक्शन!

साभार : Pratham Books Author: Rupali Bhave; Illustrator : Sunayana Nair Kanjilal; Translator: Deepa Tripathi

Call of The Valley (1967) : एक चरवाहे की दैनन्दिनी

© ...[राकेश]

राज कपूर : श्रेष्ठ फ़िल्मी गीतों के निर्देशक

राज कपूर की फिल्मों के गीत विशाल जनसमूह के ह्रदय को छूने वाले गीत रहे हैं| महासागर जैसे उनके संगीत संसार से 2-3 झलकियाँ भी देख ली जाएँ तो उनकी फिल्मों के संगीत संसार से परिचित होने के लिए वे ही... Continue Reading →

वतन पर खतरे के समय फ़िल्म उद्योग के कर्त्तव्य

सन 1962 में भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरु की वैश्विक शांति में आस्था पर चोट करते हुए उनके पंचशील के सिद्धांत को ठुकराते हुए पड़ोसी चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया| अंगरेजी हुकूमत से आज़ादी मिले डेढ़ दशक... Continue Reading →

जाने वाले सिपाही से पूछो (उसने कहा था 1960) – गीतकार शैलेन्द्र या मख़दूम?

बिमल रॉय निर्मित और मोनी भट्टाचार्जी निर्देशित फ़िल्म - उसने कहा था, हिंदी के लेखक चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' की एकमात्र उपलब्ध कहानी - उसने कहा था, पर आधारित है| सलिल चौधरी के मधुर एवं आकर्षक संगीत से सजी इस फ़िल्म... Continue Reading →

Mahandi (1994) : एक पिता की मार्मिक कथा

80 के दशक के अंत में और 90 के दशक के शुरू में दो घटनाएं हुईं| तमिलनाडू के एक राजनेता पर पीडोफ़ाइल्‌ होने के आरोप लगे थे, उससे पहले भी एक राज्य के मुख्यमंत्री पर ऐसे आरोप लगे थे और इलस्ट्रेटेड... Continue Reading →

1942 A Love Story : देश-प्रेम बनाम वैयक्तिक प्रेम

दो तरह के प्रेम (निजी प्रेम और देश प्रेम) के मध्य संघर्ष इस फ़िल्म के बुनियादी तत्वों में से एक है| प्रेम, देशप्रेम, और स्वतंत्रता आन्दोलन का संघर्ष की पृष्ठभूमि में देशप्रेम जब आहुति माँगता हो तो व्यक्तिगत प्रेम एक व्यसन की तरह... Continue Reading →

महादेव देसाई और रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म – गांधी

गांधी फ़िल्म की विश्व स्तरीय सफलता के बाद के वर्षों में कभी किसी पत्रकार ने बासु भट्टाचार्य से उनके घर जाकर साक्षात्कार लिया था तो उन्होंने रिचर्ड एटनबरो की फ़िल्म - गांधी पर कुछ टिप्पणियाँ करते हुए यह भी कहा... Continue Reading →

Jewel Thief (1967) : बेशकीमती संगीतमयी सस्पेंस थ्रिलर

अगर थ्रिलर फिल्मों की बात छिड़ ही जाए तो हिंदी सिनेमा मुख्य तौर पर दो हिस्सों में बंटता है, विजय आनंद की ज्वैल थीफ से पहले और इसके बाद| और दोनों ही कालों में एक भी फ़िल्म इसकी बराबरी में खड़े होने लायक नहीं... Continue Reading →

And Still I Rise : Maya Angelou

तुम मुझे पराजित हुआसाबित कर सकते हो स्वयं गढ़े इतिहास के पन्नों मेंअपनी कड़वाहट और तोड़ मरोड़ कर परोसे गए झूठों के जरियेतुम मुझे धूल -धूसरित कर सकते होपर मैं तब भी धूल की तरह ही उठ जाउंगी| क्या मेरी... Continue Reading →

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