अगर थ्रिलर फिल्मों की बात छिड़ ही जाए तो हिंदी सिनेमा मुख्य तौर पर दो हिस्सों में बंटता है, विजय आनंद की ज्वैल थीफ से पहले और इसके बाद| और दोनों ही कालों में एक भी फ़िल्म इसकी बराबरी में खड़े होने लायक नहीं... Continue Reading →
दुष्यंत पर्वतीय अंचल में घूमते-घूमते पहुँच गया| वहां जंगल में उसे सुन्दर, मासूम, और अल्हड़ता से भरपूर जीवन जीती शकुन्तला दिखाई दी| घर में पितृहीन, सौतेली माँ के कटु वचनों से आहत रहती 17-18 साल की गरीब लड़की, जिसके अन्दर... Continue Reading →
कवि शैलेन्द्र सा महान गीतकार हो, सचिन देव बर्मन जैसा महान संगीतकार, जिसके गीतों की मिठास की प्रतियोगिता में उँगलियों पर गिने जा सकने वाले संगीतकार ही रहे हैं, साथ हो, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी, जैसे महानतम गायक और एक एक गीत से फ़िल्म के संगीत... Continue Reading →
वी. शांताराम निस्संदेह दृश्यात्मक कल्पना के बेहद उच्च कोटि के सिनेमाई शिल्पी थे| वी.शांताराम की फ़िल्में, अभिनय और संवाद के लिए नहीं बल्कि उनके द्वारा प्रस्तुत दृश्यात्मक कल्पनाओं के लिए हमेशा सराही जायेंगी| एक आम दर्शक या फ़िल्म समीक्षक उनकी फिल्मों पर... Continue Reading →
वी. शांताराम, हिन्दी और मराठी सिनेमा के बहुत बड़े निर्माता, निर्देशक, प्रसिद्द फ़िल्म निर्माण कम्पनी - राजकमल कलामंदिर के स्थापक ही नहीं बल्कि सिनेमा में भारतीय संस्कृति को प्रस्तुत करने वाले अद्भुत कल्पनाशीलता के स्वामी निर्देशक और आपदा में नई विधियां खोज... Continue Reading →
इंसान के लिए हँसना तो बहुत जरुरी है| यह अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक एवं शारीरिक, का द्योतक भी है और हंसने से व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता भी है| जैसे पौ फट रही हो जंगल में यूँ कोई मुस्कुराए... Continue Reading →
विजय आनंद ने एक निर्देशक के तौर पर अद्भुत गीतों को सिनेमा के परदे पर जन्माया है| विजय आनंद ने शुरू की नौ फ़िल्मों में से एक तीसरी मंजिल को छोड़कर शेष 8 फ़िल्में देव आनंद को नायक बनाकर ही बनाई थीं| तीसरी मंजिल भी निर्माता नासिर हुसैन और निर्देशक विजय... Continue Reading →
अष्टावक्र का शरीर 8 जगह से झुका हुआ था इसलिए बचपन से ही उन्हें अष्टावक्र नाम से संबोधित किया जाता था| जब अष्टावक्र केवल 12 वर्ष के थे, तब वे राजर्षि राजा जनक के दरबार में चल रहे शास्त्रार्थ से अपने पिता को बुलाने गये| जनक के दरबार... Continue Reading →
ताजिराते हिन्द की दफा 304 के लिए एक अनोखी सजा सुनाकर दुश्मन फ़िल्म में जज महोदय (रहमान) गैर- इरादतन अपराध कर जाने वाले व्यक्ति को सुधरने का अवसर देते हैं| किसी सामान्य व्यक्ति से गैर-इरादतन कोई अपराध हो जाए, इसमें... Continue Reading →
फिल्में जो समय के साथ उपलब्ध नहीं रह पातीं, उनके साथ लोगों की कल्पनाएँ जुड़ती चली जाती हैं और जैसे लोग एक ही घटना को अपनी ओर से कुछ लीपापोती के साथ प्रस्तुत करके उसका प्रारूप ही बदल देते हैं... Continue Reading →
मूलतः अभिनय के लिए जाने जाते डैनी की गायन प्रतिभा को भी सराहना मिलती रही है| फिल्म- काला सोना, में आशा भोसले संग गाया उनका गीत "सुन सुन कसम से" खासा चर्चित रहा है, इसे डैनी ने पर्दे पर खुद... Continue Reading →
लता मंगेशकर ने गायन में अपनी एक अधूरी रह गई इच्छा के बारे में कहा था कि वे दिलीप कुमार के लिए गीत नहीं गा पायीं और यह संभव भी नहीं था क्योंकि कई अन्य अभिनेताओं की तरह दिलीप कुमार... Continue Reading →
गुलज़ार साब के गीत ऐसे होते हैं जो श्रोता और पाठक की भावनाओं को अपने साथ अपनी इच्छित दिशा में ले जा सकते हैं| गुलज़ार भावनाओं के ट्रैफिक के नियंत्रक कवि हैं| बहुत सी फ़िल्में ऐसी हैं जिनसे वे केवल एक गीतकार... Continue Reading →
(4) मिली (1975): यहां हृषिदा ने अमिताभ को एक और जटिल किरदार- शेखर, निभाने को दिया। वह अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण अकेला रहने को मजबूर है और वह किसी से मिलना नहीं चाहता। वह कोई दुष्ट व्यक्ति नहीं है लेकिन जहां तक बाहरी दुनिया का... Continue Reading →
हृषिदा के साथ अमिताभ बच्चन का जुड़ाव बहुत ही सफल और फलदायी रहा है| अमिताभ को जो एक अच्छा कलाकार होने का सम्मान, उनके पैन इण्डिया सुपर स्टार होने से इतर मिला उसमें सबसे बड़ी भूमिका हृषिकेश मुखर्जी द्वारा निर्देशित फिल्मों में निभाई गई भूमिकाओं... Continue Reading →
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