नेटफ्लिक्स पर प्रदर्शित हुयी इम्तियाज़ अली की नई फ़िल्म – मैं वापिस आऊँगा, के एक सिक्वेंस में 1947 में नायक (वेदांग रैना) अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ पाकिस्तान से ट्रेन में लद कर भारत पहुँचता है तो अमृतसर रेलवे स्टेशन पर दीवार पर एक ब्रांड – Neer, का पोस्टर चिपका रहता है|

अब यह रेल नीर (पेयजल) ब्रांड तो नहीं ही होगा, इम्तियाज अली इतनी बड़ी गलती तो नहीं करेंगे कि 2003 में लॉन्च हुए ब्रांड का पोस्टर 1947 के काल में दिखा दें|

पोस्टर इतनी दूर से दिखाया गया है और पलक झपकते ही गायब भी हो जाता है कि ढंग से ब्रांड की तस्वीर देखना मुश्किल है| लेकिन यह भी लगता है कि जो स्त्री मॉडल इस पोस्टर पर उपस्थित हैं वे 1947 के काल की नहीं लगतीं और यह 1965 या इसके बाद का पोस्टर लगता है|

1947 में जिन्होंने अमृतसर रेलवे स्टेशन होशोहवास में देखा हो ऐसे लोग कम ही जीवित होंगे और जो होंगे वे सोशल मीडिया के नेट संसार में सक्रिय नहीं होंगे| लेकिन ऐसे लोग सोशल मीडिया पर हो सकते हैं जिन्होंने बचपन में अमृतसर रेलवे स्टेशन 1950-1970 के बीच देखा हो और उन्हें ऐसे ब्रांड को देखा जाना याद हो|

इम्तियाज अली ऐसे संशय भरे माहौल का लाभ अवश्य उठा सकते हैं और पुराने काल (1947) को जीवंत करने के लिए उन्होंने यह पोस्टर स्टेशन (जो हो सकता है फ़िल्म के लिए निर्मित किया गया हो और वास्तविक न हो) की दीवार पर चिपकवाया| उन्हें यह लगभग निश्चित ही तय होगा कि इस पर कोई संदेह की दृष्टि से नज़र नहीं डालेगा| यह भी संभव है कि उनकी रिसर्च टीम ने यह कारनामा किया हो और उन्हें यही बताया हो कि यह पुष्ट प्रमाण है|

लेकिन इस पोस्टर के साथ एक समस्या है| रेल-नीर पेयजल ब्रांड को IRCTC 2003 में लॉन्च न करता तो बहुत संभव था कि फ़िल्म के पोस्टर पर दर्शक एक सरसरी निगाह डाल आगे बढ़ जाता और उसके दिमाग में यह ठहरता ही नहीं लेकिन रेल-नीर से परिचित दर्शक इस पोस्टर पर लिखे Neer ब्रांड नेम को अवश्य ही पढेंगे|

और जो लोग Neer ब्रांड नेम से भी परिचित हैं, जैसे विज्ञापन की दुनिया के लोग या विज्ञापन की दुनिया के इतिहास से परिचित या उसके शोधार्थी लोग, वे इस पोस्टर के कारण अवश्य ही चौंकेंगे| जिन्हें इस ब्रांड का इतिहास मालूम है उनके लिए यह फ़िल्म द्वारा दिखाई गयी एक ऐसी गलती हो जायेगी जो फ़िल्म से जुड़ी टीम ने जानबूझ कर निर्मित की|

पोस्टर का रेज़ोल्यूशन अच्छा नहीं है लेकिन बहुत ध्यान से देखें तो स्त्री मॉडल के चेहरे के बाईं और बड़े बड़े अक्षरों में Neer के नीचे wholly pasteurised लिखा हुआ है और मॉडल के नीचे बड़े अक्षरों में Neer के नीचे छोटे अक्षरों में aerated waterThe very best लिखा हुआ है|

इन इबारतों से और स्त्री मॉडल के हाथों में थामी गयी बोतल से इतना तो स्पष्ट ही है कि यह पानी का ब्रांड है| अब ऊपर वाले बड़े अक्षरों में लिखे Neer के ऊपर लगभग 45 अंश के कोण में लिखी पंक्ति को पढने की कोशिश करने में संभव लोग पायेंगे कि यह – NOW IN INDIA लिखा हुआ है| और अब जिन्हें Neer पानी के ब्रांड का इतिहास मालूम है उन्हें यह ज्ञात ही है कि सन 1965 में इसे इटली के प्रसिद्द इटालियन मिनरल वाटर ब्रांड – बिसलेरी ने भारत में लॉन्च किया था|

ऊपर वाले Neer के ऊपर छोटे और तिरछे अक्षरों में छपे Bislery को भी अनुमानित रूप से पढ़ा जा सकता है और इस बड़े Neer के नीचे छपी पूरी इबारत इस प्रकार है –

wholly pasteurisedleaves nothing but the essential and clean, clean taste.”

भारत में मुंबई ठाणे के वागले एस्टेट में इटेलियन डॉक्टर Cesari Rossi, जो कि बिसलेरी समूह के नजदीकी थे, ने अपने भारतीय मित्र खुशरू सुंतुक, जो वकील, और टाटा समूह से संबंधित व्यवसायी व्यक्ति थे जिनकी सांस्कृतिक कार्यों में गहन रूचि थी, के साथ मिलकर भारत का पहला बिसलेरी वॉटर प्लांट स्थापित किया। तब कांच की बोतलों में दो किस्म का पानी मिलता था – ‘बबली’ (Sparkling/Soda) और दूसरा ‘स्टिल’ (सादा पानी)। जब भारत में पानी मुफ्त था तो 1 रूपये प्रति बोतल वाले पानी के सामने सफल होना कितना मुश्किल था यह समझा जा सकता है| लोगों ने इस ब्रांड का मज़ाक उड़ाया|

फाइव स्टार होटलों, बड़े रेस्तराओं, अमीर भारतीयों और विदेशी पर्यटकों को टार्गेट करने के बावजूद चार साल घाटे में रहने के बाद इसे पारले समूह के चौहान परिवार को बेच दिया गया|

खुशरू सुन्तुक द्वारा रोपे बीज ने उस वक्त तो फल नहीं दिए लेकिन आगे चलकर बोतलबंद भारतीय मिनरल वाटर उद्योग ने 7000 करोड़ रुपयों का कारोबार खड़ा कर लिया|

उपरोक्त इतिहास से इतना तो निश्चित ही है कि इम्तियाज़ अली की फ़िल्म में 1965 में जन्में मिनरल वाटर ब्रांड को 1947 के काल में जाकर चिपका दिया गया है|

अगर फ़िल्म की रिसर्च टीम रेल-नीर से भी भ्रमित हो जाती तो वह यह गलती न करती| उनमें से किसी ने 1965-69 के बीच किसी पत्रिका में छपे Bislery Neer के विज्ञापन को देख कर यह मान लिया कि यह विज्ञापन तो 1947 में भी रहा हो सकता है|

…[राकेश]


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