मूलतः अभिनय के लिए जाने जाते डैनी की गायन प्रतिभा को भी सराहना मिलती रही है| फिल्म- काला सोना, में आशा भोसले संग गाया उनका गीत “सुन सुन कसम से” खासा चर्चित रहा है, इसे डैनी ने पर्दे पर खुद ही प्रस्तुत भी किया| आशा भोसले के ही संग गया नेपाली गीत – आगे आगे तोपई को गोला, भी खूब सुना जाता रहा है|
उस तुलना में देव आनंद अभिनीत और आत्माराम निर्देशित “ये गुलिस्ताँ हमारा” में डैनी द्वारा गाये गीत की चर्चा बहुत कम होती है|
सचिन देव बर्मन जॉनी वॉकर के लिए पार्श्व गायन करने के लिए डैनी के सुरों का उपयोग करें तो श्रोताओं और दर्शकों के लिए गीत विशेष बन ही जाता है और अगर यह दोगना डैनी लता मंगेशकर के साथ गा रहे हों तो स्वयं डैनी के लिए इस गीत की अहमियत सहज ही समझी जा सकती है|
इस गीत के पृष्ठभूमि रोचक है| आत्माराम, गुरुदत्त के भाई, ने जब यह फ़िल्म देव आनंद के साथ शुरू की तो इसमें डैनी की भूमिका भी थी क्योंकि फ़िल्म चीन की सीमा पर स्थित एक गाँव की कहानी पर आधारित है सो डैनी को इसमें एक भूमिका में लिया जाना एक स्वाभाविक बात थी| डैनी न केवल फ़िल्म के लिए साइन किये गए बल्कि उन्होंने अपनी भूमिका के लिए लता मंगेशकर के साथ यह दोगाना रिकार्ड भी कर लिया था|
जॉनी वॉकर ने गुरुदत्त की सभी फिल्मों में भूमिका निभाई थीं, और वे गुरुदत्त के निजी मित्रो में सम्मिलित थे| उन्हें शायद देर से पता लगा होगा कि आत्माराम कोई फ़िल्म बना रहे हैं| पता लगने पर वे आत्माराम से मिले और स्वंय को प्रस्तुत किया कोई भी छोटी बड़ी भूमिका निभाने के लिए| डैनी जिस भूमिका को निभाने वाले थे, उसे जॉनी वॉकर को दे दिया गया और इस तरह से डैनी द्वारा लता मंगेशकर के साथ गया दोगाना जॉनी वॉकर और जयश्री टी पर फिल्माया गया|
इस गीत विशेष के साथ भी एक परिवर्तन जुड़ गया| इसकी शुरुआत की मूल पंक्तियाँ थीं,
मेरा नाम ‘आओ’
मेरे पास आओ,
मेरा नाम जाओ
नागालैंड की नागा सम्प्रदाय की एक जनजाति “आओ” है जिन्हें इस गीत की पहली पंक्ति अच्छी नहीं लगी इसलिए गीत की सबसे पहली पंक्ति (मेरा नाम ‘आओ’) को काट दिया गया और गीत सीधे – मेरे पास आओ, से शुरू हुआ
बर्मन दादा ने पर्वतीय क्षेत्रों में सुनी जाने वाले वाद्य यंत्रों की ध्वनियाँ उपयोग में लीं तो डैनी ने भी पर्वतीय अंदाज़ में ही शब्दों को गाया| बाद के सालों में डैनी के लिए किशोर कुमार ने “तू लाली है सवेरे वाली‘ जैसा मधुरतम गीत गाया है और डैनी की गायिकी की आवाज़ और किशोर कुमार की माध्यम स्वरों वाली गायिकी में बहुत हद तक समानता है| डैनी ने इसे ऐसे ही गया है जैसे किशोर कुमार अगर पर्वतीय अंदाज़ में गाते तो ऐसा ही प्रभाव आता| फ़िल्म- कसौटी (1974) में किशोर कुमार ने प्राण के लिए गीत- हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है, डैनी की गायिकी जैसे अंदाज़ में ही गाया है|
लता मंगेशकर ने जैसे “मुसकिल” शब्द को गीत में उच्चारित किया है उससे यह गीत तुरंत अपने मूल गृह में स्थापित हो जाता है|
यह गीत साधारण लगते हुये भी एडिक्टिव गीतों में से एक है, एक बार इसके मोहपाश में फंस गए तो कई बार इसे सुनते हैं लोग|
…[राकेश]
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