यारों के यार“, लेखिका कृष्णा सोबती की एक लंबी कहानी है जो दिल्ली के एक सरकारी दफ्तर के अंदरूनी माहौल को दर्शाती है। इस कहानी को कृष्णा सोबती का सरकारी दफ्तरनामा कहा जा सकता है| यह नौकरशाही, भ्रष्टाचार, पद-प्रतिष्ठा की होड़, रिश्वत, क्लर्क-अधिकारी के बनते बिगड़ते संबंधों और जातिवाद से भरे दफ्तरी जीवन की उठा-पाठक का वर्णन करती है। इस कहानी का सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तत्व इसकी भाषा है, जिसमें जम कर ऐसी गालियों, जिन्हें साहित्यकार मर्दाना गालियाँ कहते रहे हैं, का उपयोग किया गया है| 1965-66 के आसपास जब यह कहानी लिखी गयी तब एक लेखिका की कलम से गालियों के इतने खुले उपयोग के कारण ही इस कहानी को साहित्यिक चर्चा में खूब जगह मिल गयी होगी|

खुशवंत सिंह ऐसी कहानी अंगरेजी में लिखते तो उसका असर ज्यादा होता लेकिन हिंदी में गालियों के एक असामान्य उपयोग के अलावा यह कहानी ऐसी सशक्त नहीं लगती कि इसे एक बेहतरीन कहानी का दर्जा दिया जाए| लोग दफ्तरों में, दफ्तर से बाहर और आपस में गालियाँ देते हैं लेकिन कोई भी मातहत बड़ी आसानी से अपने वरिष्ठ अधिकारी को दफ्तर में गाली आज भी नहीं दे पायेगा| उसे झगडा कर नौकरी ही छोडनी हो तो बात अलग है क्योंकि वह एक अपवाद वाली स्थिति है| सरकारी नौकरी के क्षेत्र में एसीआर इतनी बड़ी बला होती है कि धुरंधरों के भी पसीने छूट जाते हैं| वरिष्ठ से पंगा लेने वाले बहुत कम होते हैं| कहानी की भाषा में इतना खुला और गालीदार प्रयोग खलता है| यह कहानी अतिशयोक्ति का सहारा लेते हुए दिल्ली के सरकारी दफ्तर के माहौल का यथार्थवादी चित्रण करने का दावा करती है| लेकिन यह दावा कमजोर ही लगता है|

कहानी मुख्य रूप से पुरुष-प्रधान दफ्तरी दुनिया पर केंद्रित है, इसलिए स्त्री-केंद्रित भावनात्मक गहराई इसमें नहीं है जो कृष्णा सोबती की कई अन्य कहानियों में उपस्थित रहती है| एक मुख्य चरित्र – बड़े बाबू के बेटे की आकस्मिक मृत्यु हो जाती है लेकिन उसके प्रभाव को बड़े बाबू पर और उनेक परिवार पर दिखाने के बदले कहानी बड़े बाबू के दफ्तरी जीवन में सक्रिय रहने पर ज्यादा जोर देती है| इतनी बड़ी दुखद घटना को संभालना आसान तो है नहीं लेकिन बड़े बाबू का चरित्र अपनी नौकरी की चिंता ज्यादा करता है| चरित्र वैसा ही व्यवहार करते हैं जैसा लेखक ने कहानी को अपने अंदाज़ में कहने के लिए उनके लिए निर्धारित किया है सो यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि दफतरी भ्रष्टाचार को मानवीय संवेदनाओं के सामने ज्यादा महत्त्व इस कहानी में दिया गया है और इतने बड़े दुःख को भी दूर हटा दिया गया है| ऐसा शायद वास्तविक जीवन में न हो पाए| अच्छे अच्छे लोग संतान की आकस्मिक मृत्यु होने के बाद टूट जाते हैं और उन्हें ऐसी चालबाजियों वाले जीवन में कोई रूचि नहीं बचती|

यारों के यार” पूरी तरह दफ्तरी/कार्यालयी दुनिया पर है| गाली-भरी और प्रयोगधर्मी भाषा के अलावा कहानी में जरुरत से ज्यादा चरित्र हैं और कुछ तो बहुत ही कम समय के लिए उपस्थित होते हैं| चरित्रों की यह भीड़ पाठक के लिए भ्रम उत्पन्न कर देती है| उसे सप्रयास याद रखना पड़ता है कि दफ्तर में कौन व्यक्ति किस पक्ष का है|

कहानी की लंबाई अनावश्यक लगती है क्योंकि मुख्य सामग्री इससे बहुत कम पृष्ठों में इसी प्रभाव के साथ कही जा सकती थी| दफ्तरी दिनचर्या के कुछ हिस्से दुहराए जाते लगते हैं।

क्लर्कों को चतुर दिखाने की बजाय बेबस और शातिर दिखाया गया है, और ऐसा माहौल रचा गया है जहाँ दफ्तर में हर व्यक्ति चालबाज ही है| मनुष्य के नाम विभिन्नता का कहानी के चरित्रों में पूर्णतया अभाव दिखाई देता है|

कहानी चर्चित रही है लेकिन ऐसा लगता है कि क्राफ्ट से ज्यादा गालीबाज भाषा के कारण यह चर्चा में रहती आई है| इससे बेहतर कई अन्य कहानियां कृष्णा सोबती ने लिखी हैं|

…[राकेश]


Discover more from Cine Manthan

Subscribe to get the latest posts sent to your email.