Ginny Weds Sunny (2020), 14 Phere (2021) के बाद बहुत अरसे तक विक्रांत मैसी डार्क विषयों वाली फिल्मों में ही दिखाई देते रहे हैं और जिनमें कई में उन्होंने ऋणात्मक भूमिकाएं भी कीं उस लिहाज से एक पूरी तरह रोमांटिक विषय पर बनी श्रंखला में उन्हें देखना और प्रभावशाली अभिनय करते देखना अच्छा लगता है| रोमांटिक भूमिका में वे परदे पर आकर्षक और विश्वसनीय लगते हैं| अपने चरित्र के सपनों, उलझनों , निष्ठा, और निश्चय को उन्होंने भली भांति दर्शाया है| श्रंखला में उनके चरित्र में बेतरतीबी नहीं है और यह उनके अभिनय से दृढ़ता से परदे पर स्थापित भी होता है|
यह श्रंखला दिव्य प्रकाश दूबे के इसी शीर्षक वाले उपन्यास पर आधारित है, चूंकि उपन्यास को पढ़ा नहीं है अतः ध्यान में केवल वही रखा गया है जो परदे पर दिखाया गया है और उपन्यास अगर पढ़ा भी होता तो भी श्रंखला को तो दिखाए गए के आधार पर ही परखा जा सकता है|
श्रंखला आठ साल के अन्तराल के दो समयों में विचरते दो प्रेम संबंधों के बीच झूलती है| पहली प्रेम कहानी में 24 वर्षीय सुधा (वेदिका पिन्टो) और लगभग 28 वर्षीय चंदर अपनी अपनी माताओं द्वारा परस्पर विवाह की संभावना तलाशने हेतु एक दूसरे से मिलते हैं और उनकी ट्यूनिंग मित्रता वाली हो जाती है क्योंकि दोनों ही विवाह न कर अपने अपने करियर पर फोकस करना चाहते हैं| चंदर के बारे में ज्ञात होता है कि बचपन के प्रेम के असफल होने के कारण उसके व्यक्तित्व पर असर पड़ा है और वह लगभग असामाजिक हो अपने काम में व्यस्त रहता है और परिवार से दूर दिल्ली से भोपाल आ गया है| सुधा भी अपनी माँ और रिश्तेदारों के विवाह के दबाव को कम करने के लिए रतलाम से भोपाल आकर लॉ की प्रेक्टिस एक बड़े वकील की जूनियर बन कर करने लगी है| जहाँ सुधा को बहुत बड़ी वकील बनना है अपनी खुद की लॉ फर्म खोलनी है मुंबई जैसे बड़े शहर में वहीं चंदर को कॉर्पोरेट जीवन में तरक्की तो चाहिए लेकिन उसकी सबसे प्रिय चाहत है पहाड़ों में एक कैफ़े खोलने की, जिसका नक्शा उसने कागज़ पर चित्रित कर रखा है|
विवाह में अनिच्छुक सुधा और चंदर फिर मिलते हैं और मिलते चले जाते हैं| सुधा जैसी जिंदादिल लड़की, चंदर के बोरियत भरे रूटीन वाले जीवन में एक बहार जैसी प्रतीत होती है और उसका सहज आकर्षण सुधा के प्रति पनप जाता है, बेतरतीब सुधा ने चंदर जैसा सलीकेदार लड़का पहले नहीं देखा है और इस बाते उसके दिल में चंदर के प्रति आकर्षण जन्म ले लेता है जिसका वह विरोध भी करती रहती है लेकिन अंततः इसे अल्पकालिक संबंध मान कर और ऐसे किसी संबंध को अपने करियर के सपने के सामने न आने देने के संकल्प के साथ वह चंदर संग प्रेम संबंध में अधिकारिक तौर पर सम्मिलित हो जाती है|
एक दिन सुधा का सपनीला करियर उसके प्रेम पर भारी पड़ता है हालांकि वह इस बात के लिए राजी है कि वह मुंबई में अपना करियर बनाए और चंदर मसूरी में अपना सपना पूरा करे और वे समय समय पर मिलते रहें और इस रिश्ते को बनाए रखें| चंदर के लिए लॉंग डिस्टेंस संबंध के कोई मायने नहीं हैं वह अपना सपना भूलकर सुधा के साथ मुंबई में रहने को तैयार है| सुधा को यह खटकता है कि उससे प्रेम के कारण चंदर अपने कैफ़े के सपने को तिलांजलि देने को तैयार है| उसके अन्दर शायद यह भय हो कि अगर चंदर इतना बड़ा त्याग उसके लिए कर सकता है तो कल को उसकी उससे अपेक्षाएं भी होंगी जो समय के साथ बढेंगी और वह उसकी किसी भी ऐसी अपेक्षा पर खरा नहीं उतर पायेगी जो उसके करियर के सपने को बाधित करे| विवाह,और मातृत्व दोनों ही उसके लिए बाधाएं हैं| – “सच्चा प्रेम हमारे लिए सही भी हो यह आवश्यक तो नहीं” जैसा सभी सामान्य लोगों को आपतिजनक लगने वाला संवाद बोलकर वह चंदर के जीवन से दूर चल देती है|
इस घटना के 8 साल बाद सीरीज मसूरी में पहुँचती है जहाँ चंदर एक नए चरित्र प्रीति (महिमा मकवाना) संग लिव इन में रहता है और मुसाफिर नामक कैफ़े का संचालन करता है| प्रीति के परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती, यूं वह एकल यात्री है जो एक यात्रा के दौरान मसूरी पहुंची और कोविड काल की शुरुआत में लगे लॉकडाउन के कारण चंदर के साथ रहने के लिए विवश हुयी और उनमें आपसी प्रीत संबंध पनपने के कारण यहीं ठहर गई|
एक बड़ी उम्र का जोड़ा भी है मार्क (आदिल हुसैन) और नीलिमा (सादिया सिद्दीकी) का, जो मसूरी में एक होमस्टे चलाते रहे हैं| चंदर और सुधा अपनी मसूरी यात्रा में उनके होम स्टे में ठहरे थे| आठ साल बाद की कहानी में नीलिमा की मृत्यु हो चुकी है| नीलिमा और मार्क ऋषिकेश में मिले थे जब मार्क अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद अमेरिका से भारत भ्रमण आए हुए थे| मार्क और नीलिमा भी लिव -इन में रहते रहे| कुल मिलकर श्रंखला विवाह नामक पद्याती में विश्वास करती दिखाई नहीं देती| चंदर और प्रीति सालों से साथ हैं और उनमें प्रेम भी दिखाई देता है लेकिन चंदर जाने किस इंतजार में अभी तक प्रीति से विवाह नहीं कर पाया, मार्क ही उसे बताते हैं कि प्रीति जैसा जीवनसाथी मिलन बड़ा कठिन काम है और उसे प्रीति से विवाह कर लेना चाहिए| मार्क सुधा से भी मिल चुके हैं और तब भी वे चंदर से यही कहते हैं कि प्रीति चंदर के लिए सटीक जीवनसाथी है|
चंदर सुधा संग प्रेम में था और अब प्रीति संग भी प्रेम में है| प्रीति सुधा के बारे में जानती है और तब भी चंदर के संग प्रेम में है और चंदर विवाह हेतु कदम आगे बढ़ाए तो वह तो तैयार है ही विवाह के बंधन में बंधने को|
यह सब ठीक है, सीजन एक में बिल्कुल अंत में ही यह सीरीज कुछ राज खोलती है| लेकिन इस प्रेम के त्रिकोण में एक प्रक्षिप्त भी जोड़ा गया है जो बेहद अटपटा है| ज्ञात नहीं यह उपन्यास में भी है या नहीं| एक महाशय हैं लेखक हैं राहिल (राजीव सिद्धार्थ) और वे भी प्रीति की तरह यात्री हैं, जहां के बारे में किताब लिखने हो वहाँ कुछ समय के लिए जाकर ठहर जाते हैं| इनके और इनकी हरकतों के कारण और उन पर प्रीति की प्रतिक्रियाओं के कारण प्रीति का चरित्र कमजोर और जटिल बन जाता है| मुसाफिर कैफ़े में आने वाले हरेक व्यक्ति को चंदर और प्रीति के प्रेम संबंध के बारे में पता या तो होता है या वहाँ बैठ कर ज्ञात हो जाता है लेकिन राहिल महाशय निरंतर इस कोशिश में नज़र आते हैं कि प्रीति चंदर से अलग पहले तो स्वतंत्र सोचे और फिर संभव हो तो उसके साथ संबंध में या जाए| वे लगातार प्रीति से खुला फ़्लर्ट करते रहते हैं और प्रीति उसे बड़े प्रेम से स्वीकार करती जाती है और यह बात दर्शकों को यह अनुमान लगाने के लिए विवश करती है कि प्रीति का चंदर के प्रति प्रेम न तो स्थाई है और न उसमें इस बात के लिए आत्मविश्वास है कि वह चंदर से ही गहरा प्रेम करती है| प्रेम से लबालब भरे हृदय में कहाँ एक और प्रेमी की जगह निकल आएगी? उसका केस तो चंदर जैसा भी नहीं है कि वह दो बार का चोट खाये घायल हृदय के साथ जी रहा है| राहिल किरदार ही फालतू नहीं लगता बल्कि उसमें राजीव सिद्धार्थ का अभिनय भी सीरीज की सबसे कमजोर कड़ी है| उनका चरित्र ही अटपटा है कि वे अगर अच्छे अभिनेता हैं भी तो इसमें कुछ कर नहीं सकते थे|
अगर राहिल का किरदार उपन्यास में नहीं था और सीरीज़ में किसी मकसद से जोड़ा गया तो वह मकसद सीरीज को कमजोर बनाता है और यह इतना अटपटा किस्सा है कि उपन्यास के लेखक दिव्य प्रकाश दूबे को इस प्रक्षिप्त पर आपत्ति जतानी चाहिए थी कि इससे मूल कथा का कबाड़ बन रहा है और एक महत्वपूर्ण चरित्र के संतुलन में कमी पनप रही है|
प्रेम पर सैधांतिक सामग्री जुटाने की इच्छा को एक तरफ रखकर हलके फुल्के अंदाज़ की सामग्री के रूप में स्वीकार कर देखें तो सीरीज़ रोचक लगती है, और इसमें सबसे बड़ा योगदान विक्रांत मैसी का ही है| वेदिका पिन्टो, महिमा मकवाना और आदिल हुसैन तीनों उसे स्तर पर सीरीज़ को रोचक बनाए रखने में अपना योगदान देते हैं|
प्रेम के क्षेत्र में गहराई का विश्लेषण करने बैठेंगे तो चरित्र गिरने लगेंगे| “सच्चा प्यार आवश्यक नहीं हमारे लिए अच्छा भी हो” कहने वाली सुधा कुछ सालों में ही करियर की व्यस्तताओं के बीच फिर से एक पार्टनर अपने जीवन में ले आती है| ऐसे सिद्धांत पर ठोस विश्वास करने वाले के लिए स्थाई पार्टनर की आवश्यकता होनी नहीं चाहिए| उसकी मानसिक निर्भरता मानवीय भावनाओं को लेकर किसी और पर होनी ही नहीं चाहिए| श्रंखलायें चूंकि पहले सीज़न के बनते बनते ही अगले सीज़न पर निगाह ठहराने लगती हैं सो वे बहुत सी बातों को उलझा कर रखती हैं जिससे दर्शक इसी एक सीज़न में ही सभी कुछ न देख लें| उस लिहाज से भी दर्शकों को मुसाफिर कैफे के कुछ ही भागों का दर्शन कराया गया है|
प्रेम कहानियों की भी एक निश्चित अवधि होती है जिसमें वे खूबसूरत लगती हैं अगर उन्हें खींचा जाता रहे तो उनमें कमजोरियां जुड़ने लगती हैं| सीरीज बनाने में यह कमी भरपूर दिखाई देती है| एक निश्चित अवधि की फ़िल्म बनाए जाने का लक्ष्य हो तो निर्देशक के सामने स्पष्ट रहता है कि इतनी अवधि में इस प्रेम कहानी को दर्शाना है अतः वह इस हेतु श्रेष्ठ दृश्यों का रचना करता है, सीरीज में उसके सामने इतनी छूट आ जाती है कि कहीं कैसा भी विस्तार जगह पाने लगता है और प्रेमकथा की लय बिगड़ने लग जाती है|
…[राकेश]
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