कवि धूमिल की अंतिम कविता – लोहे का स्वाद– एक तरह से करोड़ों शोषितों की चुप्पी को जुबान देती है। प्रियदर्शन की फिल्म कांजीवरम एक सामंजस्य स्थापित करती है उस कविता से।
शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो।क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।लोहे का स्वाद लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है।


हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है


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October 18, 2013 at 6:32 PM
बहुत ही मार्मिक कहानी है इस फिल्म की और इसे देखते हुए अथवा इस कहानी को पढ़ते हुए आँख नाम हुए बिना नहीं रहती। समाज की पैरोकारी करने वाले और मजलूमों और मजबूरों के हक में आवाज़ बुलंद करने वाले शायर साहिर लुधियानवी साहिब की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती हैं —
” ये शाह – राहें इसी वास्ते बनीं थीं क्या,
कि इन पर देश की जनता सिसक सिसक के मरे ?
ज़मीं ने क्या इसी कारण अनाज उगला था,
के नस्ल-ए-आदम-ओ-हव्वा बिलख बिलख के मरे ?
मिलें इसीलिए रेशम के ढेर बुनती हैं,
के दुख्तराने – वतन तार – तार को तरसें ?
चमन को इसलिए माली ने खूं से सींचा था,
के उसकी अपनी निगाहें बहार को तरसे ? “
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