कवि धूमिल की अंतिम कविता – लोहे का स्वाद– एक तरह से करोड़ों शोषितों की चुप्पी को जुबान देती है। प्रियदर्शन की फिल्म कांजीवरम एक सामंजस्य स्थापित करती है उस कविता से।

शब्द किस तरह
कविता बनते हैं
इसे देखो
अक्षरों के बीच गिरे हुए
आदमी को पढ़ो।

क्या तुमने सुना कि यह
लोहे की आवाज है या
मिट्टी में गिरे हुए खून
का रंग।

लोहे का स्वाद लुहार से नहीं
उस घोड़े से पूछो
जिसके मुँह में लगाम है।

हर जोर जुल्म की टक्कर में संघर्ष हमारा नारा है


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