नवंबर 1985 में तीन-चार दिन लगातार स्मिता पाटिल और राज बब्बर से मिलने के बाद उन पर एक संस्मरण लिखते समय हिंदी के प्रसिद्द साहित्यकार श्री कृष्ण बिहारी को कहाँ मालूम था कि ठीक एक साल बाद विलक्षण स्मिता समूचे भारत को स्तब्ध छोड़कर इस दुनिया से चली जायेंगी और उनका जाना भारतीय सिनेमा को गरीब कर जायेगा।
13 दिसम्बर 1986 को स्मिता पाटिल की असमय मृत्यु के बाद उनकी याद में इस लम्बी कविता का जन्म हुआ था जो उन जैसी महान अभिनेत्री और एक बहुत अच्छी इंसान को श्री कृष्ण बिहारी की तरफ से श्रद्धांजलि अर्पित करने की चेष्टा थी।
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