बासु चटर्जी निर्देशित फ़िल्म – ‘खट्टा मीठा’ को एक पारिवारिक हास्य फ़िल्म के रूप में ही देखा, समझा और याद किया जाता है| पारसी किरदारों पर बनी, अच्छे संगीत और स्वस्थ हास्य से भरपूर फ़िल्म|

महान अभिनेता- अशोक कुमार, जिन्हें प्यार और सम्मान से सब ‘दादा मुनी’ के नाम से संबोधित करते थे, के ऊपर बड़े बड़े ग्रंथ लिखे जा सकते हैं क्योंकि हिन्दी सिनेमा के विकास में उनका न केवल बहुत बड़ा योगदान है बल्कि उसके विकास की नींव के वे एक बेहद मजबूत हिस्सा रहे हैं|

डिस्कवरी और नेशनल ज्योग्राफिक जैसे चैनल जंगल में जानवरों के बीच अपने अपने अस्तित्व के लिए लड़ी लड़ाइयाँ खूब दिखाते हैं| कई बार दर्शक आश्चर्य से भर जाता है कि बिलकुल निरीह सा अहिंसक जानवर भी बेहद हिंसक जानवर से तब भिड़ जाता है जब हिंसक जानवर उसके बच्चे को निशाना बनाना चाहता है| ये ऐसा क्षण है जब एक गाए भी अपने बच्चे की रक्षा के लिए शेर, चीते, बाघ, और तेंदुए आदि हिंसक जानवरों से भिड़ जा सकती है|

अपने बच्चे की रक्षा के लिए इंसान भी अपनी जान की परवाह न करते हुये बड़े से बड़े तानाशाह, इलाके के सबसे बड़े बाहुबली, सबसे बड़े गुंडे की आँखों में आँखें डालकर उसे ललकार सकता है|

दायें, बाएँ, मध्य मार्गी राजनीति के नेताओं, हिंसा और अहिंसा के माध्यम से जगह जगह विरोध करते सेनानी और इन सबके साथ खड़ी आम जनता, इन सबकी संग्रहीत शक्ति से घबरा कर ही ब्रितानी  राज जैसी हिंसक साम्राज्यवादी महाशक्ति भारत से अपना बोरिया बिस्तर उठा चलती बनी|

बहुत कम ऐसा होता है किसी भी फ़िल्म में किसी अभिनेता का कार्य ऐसा हो कि पूर्णता को प्राप्त कर ले और उसमें रत्ती भर भी कमी न दिखाई दे| जब चरित्र के मनोविज्ञान और शारीरिक हावभाव को अभिनेता ऐसा ओढ़ ले कि अभिनेता नज़र ही आना बंद हो जाये और केवल चरित्र ही पर्दे पर दिखाई दे तब ही ऐसी घटना घट सकती है|

दादा मुनी (अशोक कुमार) को लोग टुकड़ों में जानते हैं, किसी ने उन्हें सत्तर के दशक की फिल्मों से देखना, पहचानना शुरू किया तो किसी ने साठ के दशक की फिल्मों से और उन्हें लगता है अशोक कुमार एक बेहतरीन चरित्र अभिनेता थे| कुछ लोग उन्हें पचास के दशक की फिल्मों से भी जानते हैं और वे देख पाते हैं कि बड़ी ठोस फिल्में उनके चरित्र के ईद गिर्द ही बुनी जाती रहीं| कुछ हैं जो चालीस के दशक की उनकी फिल्मों तक पहुँच ‘किस्मत’ सरीखी फ़िल्म देख समझ पाते हैं क्यों एक ही सिनेमाघर में बरसों चलने वाली ‘किस्मत’ से (जिसके रिकार्ड दशकों बाद, लंबे अरसे तक चलने वाला रिकार्ड पहले ‘शोले’ और बाद में ‘दिल वाले दुल्हनियां ले जायेंगे’, ने और कमाई के मामले में ‘देव आनंद’ की ‘जॉनी मेरा नाम’ ने बराबर किया) ‘अशोक कुमार’ हिन्दी सिनेमा के एक बड़े सितारे बन गए जिसे अपने कैंप में लेने के लिए उस वक्त के बड़े बड़े स्टुडियो लालायित रहते थे| जैसा सम्मान ‘अशोक कुमार’ को फ़िल्मकारों ने दिया ऐसा कम ही अभिनेताओं को मिला होगा|

सिगरेट के डब्बे को सिगरेट से ठोकना, अपने धुम्रपान के पाइप को अपने ओठों के कोरों से दबाना या चश्मे की कमानी को मुंह में दबाना, कितनी फिल्मों में कितने चरित्रों में कितनी अदाएं दिखा उन्होंने चरित्र भूमिकाओं में भी दर्शकों को अपना मुरीद बनाया|  

फ़िल्म – ‘खट्टा मीठा’ की बात करें तो जिसे निम्न मध्य वर्गीय कहना भी खींचतान करके हो पाएगा, ऐसे वर्ग के चार बच्चों के विधुर पिता के चरित्र को ‘अशोक कुमार’ ने निभाया है| ज़्यादातर तो उस समय तक ‘अशोक कुमार’ अपनी उम्र के मुताबिक वरिष्ठ नागरिक वाली भूमिकाएँ ही निभाते लग गए थे| ऐसी ही भूमिका यहाँ भी वे निभाते हैं| अपने शुभचिंतक सहकर्मी मित्र के दबाव देने से वे तीन बच्चों की विधवा माँ (पर्ल पदमसी) से विवाह कर लेते हैं| पदमसी का बड़ा बेटा (राकेश रोशन) अपनी सहपाठी (बिंदिया गोस्वामी) के संग प्रेम में पड़ जाता है और यहीं से समस्या शुरू हो जाती है क्योंकि लड़की एक बेहद अमीर पिता (प्रदीप कुमार) की इकलौती बेटी है और अमीर पिता का घर छोडकर गरीब प्रेमी से विवाह करने के कारण उसका अमीर पिता बदले में अशोक कुमार की नौकरी ले लेता है, उनसे उनका घर छीन लेता है और राकेश रोशन को गुंडों से पिटवा देता है|

अपने पिता की ये हरकतें देख, इस घबराहट में कि उसका पिता इन गरीब लोगों को और न सताये, लड़की वापिस अपने घर चली जाती है| उसका पति भी इस कदम से सहमति रखता है| लेकिन इन दुःखी प्रेमियों जो नव विवाहित भी हैं, की दुर्दशा देख अशोक कुमार बेहद दुखी, कुंठित और क्रोधित हो जाते हैं और इसी मनोदशा में वे अपने सौतेले बेटे की पत्नी के पिता (प्रदीप कुमार), जो उनकी फैक्ट्री के मालिक के मित्र भी हैं, के दफ्तर पहुँच जाते हैं| पहले से मुलाक़ात की अनुमति तो उनके पास है नहीं, सो वे बाहर रिस्पेप्शन पर बैठी युवती से सेठ जी से मिलने जाने देने का आग्रह करते हैं|

कक्ष में अन्दर घुसते ही उनका सामना अहंकारी धनी सेठ (प्रदीप कुमार) से होता है जो बिना उनकी ओर देखे चेतावनी देता है,” मेरे पास वक्त नहीं है, जो भी कहना है दो मिनट में कह डालिए|”  

ये दो मिनट दुनिया को बताते हैं कि अशोक कुमार किस स्तर के अभिनेता थे! घमंडी अमीर के सामने उन दो मिनटों में बोलते अशोक कुमार को देख, सुनकर दर्शक के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, उसके शरीर में सिहरन दौड़ने लगती है| उत्तेजना से दर्शक सीधे बैठ जाता है|

क्रोध की अधिकता, और इस बात के एहसास कि मेज के दूसरी ओर सिंहासन नुमा कुर्सी पर बैठे इस अमीर आदमी के सामने वे कुछ भी नहीं हैं, से भरे कुंठित और काँपते हुये अशोक कुमार जब संवाद बोलते हैं तो यह कह पाना मुश्किल हो जाता है कि क्या एक अभिनेता अभिनय कर रहा है या वास्तविक जीवन में उन लम्हों को जी रहा है और कैमरे से उसका प्रसारण सबको हो रहा है?

अशोक कुमार का चरित्र कोई जवान खून से भरा व्यक्ति नहीं है कि किसी भ्रम का शिकार होकर ऐसी हरकत करने चला जाये| वह एक परिपक्व और अपनी मजबूरियों को भली भांति समझने और स्वीकारने वाला बेहद सरल व्यक्ति है| लेकिन वह इस दशा में है जहां वह अपनी भावनाओं को और नियंत्रित कर पाने में असमर्थ है| वह इस बात को और सहने में असमर्थ है कि कोई उसके बेटे और उसकी पत्नी को हानि पहुंचाए| अशोक कुमार अहिंसक पक्षी या जानवर की तरह उस व्यक्ति में परिवर्तित हो चुके हैं जो अपने बच्चे की रक्षा हेतु किसी सीमा को पार कर सकता है| वह कमजोर है परंतु इस वास्तविकता को पीछे छोड़ कर वह दुस्साहस से भर गया है|

कथा सम्राट ‘प्रेमचंद’ ने कभी लिखा था –

भय की चरम सीमा ही दुस्साहस है|

जानवरों से लेकर इन्सानों में इस कथन की सच्चाई हमें देखने को मिलती है| और अशोक कुमार इसे सिनेमा के पर्दे पर चिरतार्थ करके इस दृश्य विशेष में दिखाते हैं|

कुंठा, दुस्साहस, क्रोध, लाचारी, बेबसी, निरीहता और अंदुरनी रुदन से भरे भावों को अपने चेहरे और शारीरिक भावों से जब वे अपने संवाद बोलते हैं तो उन्हें देखकर अच्छे अभिनय की पहचान रखने वाले दर्शक की यही इच्छा हो सकती है कि वह खड़े होकर ताली बजाये और इस अभिनेता पर साधुवाद और फूलों की वर्षा कर दे|

अभिनय की पुस्तक का एक उच्च स्तरीय पाठ है उनका अभिनय इस दृश्य में| अभिनेता अपने अभिनय में गहराई लाने के लिए, नए अभिनेता अभिनय सीखने के लिए और निर्देशक अपने अभिनेताओं से बेहतर अभिनय करवाने की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए इस दृश्य में अशोक कुमार के करतब को बार-बार देख सकते हैं|

अभिनय के क्षेत्र में संयोग से प्रवेश कर गए अशोक कुमार, जिन्होंने अभिनय की सिलसिलेवार कोई ट्रेनिंग नहीं ली और जो सीखा फिल्मों में काम करते हुए खुद ही सीखा, की अभिनय जीवनी बेहद रोचक और प्रेरणात्मक है| यह दुर्भाग्य की बात है कि एन एस डी, ऍफ़ टी आई आई जैसे संस्थानों जहां अभिनय का प्रशिक्षण दिया जाता है विदेशी पुस्तकों और फिल्मों के माध्यम से पढ़ाई करवाई जाती है और कक्षाओं और कार्यशालाओं में भारतीय अभिनेताओं के महान प्रदर्शनों पर कभी कभार ही चर्चा होती होगी| जबकि भारतीय अभिनेताओं के उदाहरण से नए अभिनेता ज्यादा गहराई से अभिनय को आत्मसात कर पायेंगे क्योंकि अंततः तो उन्हें भारतीय फिल्मों में ही काम करना होता है|

इस मामले में भारत आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है|  

 बहरहाल अगर कोई अभिनेता अशोक कुमार के  फ़िल्म – खट्टा मीठा, के इन दो मिनटों के अभिनय प्रदर्शन को दुहरा भर के दिखा दे तो दुनिया उसे क्षण भर में महान अभिनेता का तमगा आसानी से दे दे और किसी भी किस्म के चरित्र को निभाने की उसकी प्रतिभा को स्वीकार कर ले|

यह दृश्य फ़िल्म के लगभग क्लाइमेक्स में आता है और लगभग अंत से पांच मिनट पहले के सारे दृश्य अशोक कुमार की अभिनय क्षमता से भरे हुए दृश्य हैं|

पहले पहल जब अशोक कुमार पाते हैं कि राकेश रोशन की पत्नी बिंदिया गोस्वामी वहां नहीं है और वे राकेश रोशन से पूछताछ करते हैं तो उनकी उलझन, और बेटे की बात सुनकर अन्दर उमड़ती कुंठा| इन सब भावों से भरकर अशोक कुमार का प्रदीप कुमार के दफ्तर में पहुंचना जहां उन्हें पूरा एहसास है कि वे कि बेहद अमीर और शक्तिशाली सेठ के समक्ष वे एक बेहद कमजोर इंसान हैं| रिसेप्शनिस्ट द्वारा अन्दर जाने के लिए कहने पर अशोक कुमार का अपनी कमीज का छाती का सबसे ऊपर का बटन बंद करना, अन्दर घुसने पर प्रदीप कुमार को सलाम कहना, और उनके चेहरे के भाव ये सब बारीक प्रदर्शन दर्शाते हैं कि वे कितनी गहराई से अपने चरित्र के मनोविज्ञान को जी रहे थे| पांच मिनट की फ़िल्म में सारे शॉट्स अलग-अलग लिए गए होंगे लेकिन अशोक कुमार अपने चरित्र के मनोभावों और मनोविज्ञान को जिस निरंतरता के साथ प्रस्तुत करते हैं, वह काबिलेतारीफ है|

अशोक कुमार लगभग 68 साल के थे इस फ़िल्म को करते हुये| उस उम्र के व्यक्ति अगर वास्तव में क्रोध और अन्य मिश्रित भावों की चरम सीमा को झेल जाएँ तो बड़ी बात होगी| बिना अन्य अभिनेताओं का नाम लिए यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि इस उम्र में हिन्दी सिनेमा के अन्य बड़े अभिनेताओं को ऐसा अभिनय प्रदर्शन करते नहीं देखा गया| मोतीलाल, बलराज साहनी, दिलीप कुमार, संजीव कुमार, ए के हंगल, विनोद खन्ना, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, कमल हसन, पंकज कपूर, इरफ़ान, मनोज बाजपेई, के के मेनन, और नवाजुद्दीन सिद्दीकी सरीखे अभिनेताओं के स्तर के अभिनेता के ही बस की बात है, उस बड़ी उम्र में इस दृश्य में ऐसा कारनामा कर दिखाना|

इसका आनंद इसे देखे बिना नहीं| बेहतरीन अभिनय के जिज्ञासु दर्शक जब खट्टा मीठा को पहली बार या पुनः देखें तो इस दृश्य में अशोक कुमार के शानदार अभिनय का आनंद अवश्य लें|

…[राकेश]


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