बाबाजी

तुम ब्रह्मचारी
तुम्हारी सोच के अनुसार
औरत नरक का द्वार।

लेकिन
मैं तो ब्रह्मचारी नहीं
दिखने में भी
ढ़ोंगी- पुजारी नहीं
मेरे लिये तो
हर औरत खूबसूरत है
बशर्ते यह कि
वह औरत हो।

तुमने जिसे नकारा
धिक्कारा
और अस्पर्श्य विचारा है
उसके आगे मैंने तो
समूचा जीवन हारा है।

मेरी दृष्टि से देखो कभी
तो जानोगे
नरक का वह द्वार
कितना प्यारा है।

सिर से पाँवों तक
औरत में क्या नहीं
कभी देखो तो सही
दूर से उसके लहराते कुंतल
सुराहीदार गर्दन
गालों में गड्ढ़े
ओठों पर हलचल
कंधों से नीचे
कमर के कटाव
और कमर से नीचे
नितम्बों के भराव
हटती नहीं है दृष्टि
अगर फंस जाये
दैहिक आकर्षण में।

बाबाजी
कुछ तो सोचो
क्या रखा है तुम्हारी सोच,
और ऐसे ही जिये जाते,
किये जाते आत्मतर्पण में?
कभी ध्यान से देखो
औरत के वक्ष
और सोचो कि
ईश्वर ने उन्हे केवल
बच्चे के हाथों का खिलौना
या फिर उसके लिये
दूध का भरा दोना
ही बनाया है
या फिर पुरुषों की नज़रों को
चकाचौंध, हतप्रभ या फिर
आबद्ध स्थिर करते हुये
अद्वतीय सौन्दर्य दिखाया है।

बाबाजी
प्रकृति को कभी
कपड़ों का बोझ ढ़ोते देखा है?
नदी को अपनी अनावृत्त
बासन्ती देह धोते देखा है?
सांगोपांग स्नान करती नदी को
नहाते हुये देखो।

बाबाजी
महसूसो पुरुष होने की वासना
जिओ एक जीवन पूरा
कहते हैं कि
औरत के बिना
की गयी पूजा
मनाया गया उत्सव
होता है आधा-अधूरा।

हर औरत माँ   नहीं होती
बहन नहीं होती
मित्र नहीं होती
बीवी नहीं होती
पर
हर औरत
औरत अवश्य होती है।

उसके लिये भी
हर शख्स पिता नहीं होता
भाई नहीं होता
वह भी सोचती है
बहुत कुछ खोजती है
आदमी में।

कैसी विडम्बना है कि
उसे आज तक
अपना पुरुष
अपने ढ़ंग से मिला नहीं
मगर ताज्जुब है कि
उसके ओठो
पर गिला नहीं।

बाबाजी
एक बात और
मैं अधम और कामी
मुझ पर हावी
कमजोरियाँ और इंद्रियगत गुलामी
इसलिये मेरी ही दृष्टि को
मत अपनाओ
औरत के बारे में जो संतों ने कहा है –
बूड़ा वंश कबीर का…
नारी की झाईं परत…
औगुन आठ सदा उर रहहीं…
भूल जाओ
कुछ व्यापक और
मौलिक दृष्टिकोण बनाओ।

देखो उसे सोचो उसे
भाषा और भूमि से परे
वह मात्र खेती ही नहीं
बेटी भी है।
उसकी शुचिता और
रक्षा की जिम्मेदारी
भावी समाज के निर्माण में
उसकी रचनात्मक हिस्सेदारी
हम पर नहीं तो किस पर है?

{ ©  कृष्ण बिहारी}


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