———————–
लम्हों में ज़िन्दगी – 4
———————–
एम.ए. हिंदी करतें समय मुझे गुना कॉलेज के प्रो कांति कुमार जैन का मेसेज मिला की दों दिन बाद मुझे हिंदी विषय का शोध निबंध (dissertation) – “गिरिजा कुमार माथुर का काव्य शिल्प” जमा करना है.
यह बेहद सुखद संयोग रहा की उसी शाम माथुर साहब अपने अगले अशोकनगर प्रवास पर मुझे हमारे घर के चैम्बर में बैठे दिखे| मैंने उन्हें वह शोध निबंध दिया. उसका शीर्षक देख कर उन्हें सुखद आश्चर्य हुआ. उन्होंने कहा कि मैं इसे रात को पढूंगा. अगले दिन जब मैं शोध निबंध लेने गया तो उन्होंने उस पर विमर्श कर संतुष्टि ज़ाहिर करतें हुए उसे दिया.
घर आकर मैंने जब पहला पन्ना देखा तो सुखद अनुभूतियों से भर उठा. उन्होंने अपने रेखा चित्र के नीचे दिनांक सहित हस्ताक्षर दिये थे. उनकी यह संस्तुति मेरे लिये अविस्मरणीय है।
———————–
लम्हों में ज़िन्दगी – 5
———————–
यह भी मेरे जीवन का अविस्मरणीय लम्हा रहा कि उन्होंने मेरे विवाह के समय हमें आशीर्वाद दिया. अगले दिन उन्होने अपने सद्य गीत संग्रह “छाया मत छूना मन” भेंट किया.
शीर्षक पढ़ कर मैंने कहा – “चाचाजी, यह आपने क्या किया? आपकी बहू का नाम भी छाया है. अगर उसने मेरा मन नहीं छुआ तो क्या होगा?”
सुन कर वह देर तक हँसते रहे, फिर बोले –
“अरे गोपाल, यह प्रतीकात्मक है. तुम्हारा जीवन तो बहू (छाया) के साथ सुखद रूप में व्यतीत होगा“
प्रस्तुति एवं © डॉ. गोपाल किशोर सक्सेना
Discover more from Cine Manthan
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Leave a comment