प्रख्यात लेखक, नाट्य एवं फिल्म निर्देशक, व अवसरानुकूल अभिनेता श्री रंजीत कपूर की यह पहली प्रकाशित कहानी है जो अप्रैल 1969 में हिंदी की प्रसिद्द साहित्यिक पत्रिका सारिका में छपी थी| लेखक कमलेश्वर ने 1967 से तकरीबन 11 साल तक सारिका के संपादन का दायित्व संभाला और उसे हिन्दी की अग्रणी साहित्यिक पत्रिकाओं में से एक बनाया| कभी सारिका में छपना लेखकों के लिए एक अच्छे सपने जैसा खुशनुमा एहसास हुआ करता होगा|

नाट्यकर्मी पिता और शायरा माँ की सबसे बड़ी संतान रंजीत कपूर में कला के बीज तो अस्तित्व से ही मिले होंगे| 21 साल की उम्र में पहली कहानी का “सारिका” में छपना प्रसन्नता के साथ उन्हें दुविधा में भी डाल गया होगा कि पिता के नाट्यकर्म से अलग लेखन की राह पर चलें या नाटकों में ही जीवन लगा दिया जाए?

उनके बाद के जीवन में लेखन और नाटक, दोनों ने बहुत बड़ी भूमिका निभाई|

उनकी लिखी पहली कहानी “नींद” एक सिद्धहस्त लेखन का उदाहरण लगती है|

नींद को आधार बनाकर जिस तरह उन्होंने गरीबी, निराश्रय, लाचारी और समृद्ध दुनिया की कठोरता को उभारा है, वह प्रशंसनीय है| मंटो, चेखव और गोर्की के कथासंसार उनसे बहुत अलग नहीं रहते अगर वे कहानियों की दुनिया को आगे बढाते रहते|

उन्होंने अप्रैल 1969 में हिंदी की प्रसिद्द साहित्यिक पत्रिका सारिका में छपवाई थी| आगे चलकर जो रचनाकार देश का बेहद लोकप्रिय रंगकर्मी और फ़िल्मी लेखन में एक सम्मानित सितारा बनने जा रहा था|उनके लेखन की यह शुरुआती बानगी है| इस कथा का एक ऐतिहासिक महत्त्व है|

© रंजीत कपूर

First Published in Sarika, April 1969


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