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Cine Manthan

Cinema, Theatre, Music & Literature

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Cine Manthan

“Cinema is the most beautiful fraud in the world.” (Jean-Luc Godard)

ये कौन चित्रकार है : बूँद जो बन गई मोती (1967)

प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किताबों से पढ़कर बच्चे नहीं समझ सकते, लाख अध्यापक अच्छा हो लेकिन अगर बच्चों ने सुबह की बेला में सूर्योदय की हल्की से गहरी होती लालिमा से नारंगी होते जाते आकाश को अपनी आँखों से नहीं... Continue Reading →

Panchayat : Season 3 के बहाने चंद बातें

ओ टी टी पर प्रदर्शित श्रंखलाओं में पंचायत की अलग ही महिमा है| इसके अलग स्वभाव और इसमें दिखाए संसार ने दर्शकों को बेहद मजबूती से अपना प्रशंसक बनाया है| नामी गिरामी अभिनेताओं से सजी श्रंखलाओं ने वैसा दर्शक वर्ग... Continue Reading →

पड़ोसन (1968) : किशोर कुमार की हास्य शाला

इंसान के लिए हँसना तो बहुत जरुरी है| यह अच्छे स्वास्थ्य, मानसिक एवं शारीरिक, का द्योतक भी है और हंसने से व्यक्ति का मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य सुधरता भी है| जैसे पौ फट रही हो जंगल में यूँ कोई मुस्कुराए... Continue Reading →

आयी ऋतु सावन की : (Alaap 1977)

हृषिकेश मुखर्जी एक महान फ़िल्म निर्देशक होने के साथ-साथ अच्छे संगीत के भी पारखी थे और यह उनकी फिल्मों के उच्च स्तरीय संगीत से स्पष्ट हो जाता है| हृषिदा की फिल्मों में संगीत इतना बहुपक्षीय और बहुरंगी रहा है कि इस बात... Continue Reading →

मिले दो बदन : Blackmail 1973

विजय आनंद ने एक निर्देशक के तौर पर अद्भुत गीतों को सिनेमा के परदे पर जन्माया है| विजय आनंद ने शुरू की नौ फ़िल्मों में से एक तीसरी मंजिल को छोड़कर शेष 8 फ़िल्में देव आनंद को नायक बनाकर ही बनाई थीं| तीसरी मंजिल भी निर्माता नासिर हुसैन और निर्देशक विजय... Continue Reading →

Ki & Ka (2016) : दांपत्य जीवन में पति बड़ा या पत्नी बड़ी

हाउस वाइफ बनाम हाउस हसबैंड पर बनी यह फ़िल्म बदलते दौर से कदमताल करती एक समसामयिक फ़िल्म है| अब स्त्री घरेलू ही नहीं रही है बल्कि हर वह काम घर से बाहर कर रही है जिसे पुरुष करते आ रहे... Continue Reading →

मुझे जां न कहो : (अनुभव 1972)

मेरी जां, मुझे जां न कहो मेरी जाँ बरसात की एक रात का गीत है| बरसात के मौसम में अलग अलग सुबह, दिन, शाम और रात की बरसात, बरसात से सम्बंधित किसी न किसी फ़िल्मी गीत की याद दिलाती ही है|... Continue Reading →

Kunwara Baap(1974):हिंदुस्तान के कुंवारे पिता के सुख दुःख

मुझे बारिश में चलना सदैव अच्छा लगता है क्योंकि ऐसे में कोई मुझे रोता हुआ नहीं पा सकता - दुनिया के सबसे महान सिनेमाई हास्य कलाकार - चार्ली चैपलिन ने एक बेहद साहित्यिक महत्त्व वाली रचनात्मक बात कही| अभी हाल ही में भारत... Continue Reading →

Satyam Shivam Sundaram(1978): सौन्दर्यशास्त्र पर टीका

अष्टावक्र का शरीर 8 जगह से झुका हुआ था इसलिए बचपन से ही उन्हें अष्टावक्र नाम से संबोधित किया जाता था| जब अष्टावक्र केवल 12 वर्ष के थे, तब वे राजर्षि राजा जनक के दरबार में चल रहे शास्त्रार्थ से अपने पिता को बुलाने गये| जनक के दरबार... Continue Reading →

Woh Bhi Din The (2004) : स्कूली जीवन

स्कूल के दिन भी क्या दिन होते हैं और व्यक्ति को जीवन भर उनकी स्मृतियाँ अपनी ओर खींचती रहती हैं| हिंदी फ़िल्म उद्योग में जमशेदपुर वासियों की ओर से बनाई गई यह फ़िल्म कम से कम दस साल पुरानी है लेकिन प्रदर्शित... Continue Reading →

Shakti(1982): दुःखजनित सन्नाटे से भरे वे 3 मिनट

दर्द हो दुख हो तो दवा कीजे फट पड़े आसमाँ तो क्या कीजे एक सिनेमा वैसा होता है जिसके लिए कहा जाता है Clash of the Titans. बड़े बड़े धुरंधर अभिनेता एक साथ अपने अभिनय के जौहर दिखाकर सिनेमा के परदे... Continue Reading →

Dushman 1972 : अपराध, दंड और प्रायश्चित

ताजिराते हिन्द की दफा 304 के लिए एक अनोखी सजा सुनाकर दुश्मन फ़िल्म में जज महोदय (रहमान) गैर- इरादतन अपराध कर जाने वाले व्यक्ति को सुधरने का अवसर देते हैं| किसी सामान्य व्यक्ति से गैर-इरादतन कोई अपराध हो जाए, इसमें... Continue Reading →

जब्बर सिंह (मेरा गाँव मेरा देश 1971)

हिंदी सिनेमा के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा अभिनेता नहीं है जो अपनी अभिनय पारी की शुरुआत से ही नायक और खलनायक की भूमिकाएं एक साथ निभाता रहा हो और दोनों में दर्शकों का चहेता बन गया हो| पहले नायक... Continue Reading →

वफ़ा जो न की तो (मुकद्दर का सिकंदर 1978)

सिनेमा के परदे पर अमिताभ बच्चन और रेखा की जोड़ी का अर्थ ही परदे पर बिजली का करेंट दौड़ना रहा है| एक समय था जब अमिताभ बच्चन अपने चरित्रों में कॉमेडी की भरपूर डोज़ दर्शकों को दिया करते थे और उस दौर की फिल्मों में अगर रेखा उनकी... Continue Reading →

मंजिलें अपनी जगह हैं (शराबी 1984)

किशोर कुमार ने एक शानदार आवाज के धनी अभिनेता अमिताभ बच्चन के लिए गाने गाना फ़िल्म संजोग (1971) में गाये गीत - रूप ये तेरा किसने बनाया, से आरम्भ कर दिया था| लेकिन इस जोड़ी को पहली प्रसिद्धि मिली बॉम्बे टू गोवा के ऊर्जा भरे गीत - देखा न... Continue Reading →

गांधी हत्या और ओशो

मैं महात्मा गांधी के विचारों से बिलकुल सहमत नहीं हूं और मैंने सदा उनकी आलोचना की है। जब उन्हें गोली मारी गई तो मैं सत्रह साल का था, और मेरे पिता ने मुझे रोते हुए देख लिया। उन्हें बड़ा अचरज हुआ। उन्होंने... Continue Reading →

बीड़ी जलाई ले, जिगर से पिया (Omkara 2006)

अच्छा फ़िल्मी गीत लिखना क्रिकेट की भाषा में ऐसा है कि ऐसा बल्लेबाज हो जो हर तरह की गेंद पर टीम की आवश्यकता के अनुसार रन बना सके| फ़िल्मी गीत महज कविता नहीं होती, और न वह कविता की तरह... Continue Reading →

Prem Parbat (1973): मिथक या सत्य

फिल्में जो समय के साथ उपलब्ध नहीं रह पातीं, उनके साथ लोगों की कल्पनाएँ जुड़ती चली जाती हैं और जैसे लोग एक ही घटना को अपनी ओर से कुछ लीपापोती के साथ प्रस्तुत करके उसका प्रारूप ही बदल देते हैं... Continue Reading →

स्मिता पाटिल को अचानक लगते थप्पड़ (भूमिका)

कई साल पहले जब फ़ारुक शेख टीवी शो - जीना इसी का नाम है, को प्रस्तुत करते थे तब श्याम बेनेगल वाली क़िस्त में सेट पर आये अमरीश पुरी ने श्याम बेनेगल की फ़िल्म - भूमिका, के बारे में कहा... Continue Reading →

फ़िल्मी गीतों के लेखन का स्तर

किसी को फिल्मों में गीतकार बनना हो तो वह शैलेन्द्र के ऊपर दिए गीत - हम तुझसे मोहब्बत करके सनम, जैसे गीत सुन कर प्रेरणा ले पायेगा, अपना शब्दकोश, भाव-कोश, और पद्य-संरचना की गुणवत्ता बढ़ा पायेगा या ऐसा वह अमिताभ... Continue Reading →

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