किसी दार्शनिक ने कहा है -- 'यह मत देखो कि ज़िन्दगी में कितने लम्हे हैं… यह देखो कि लम्हों में कितनी ज़िन्दगी है | पचास बरस पहले मुझे माथुर साहब से मिलने का सौभाग्य निरंतर मिलता रहा. और उन से... Continue Reading →
पिछली सदी में नब्बे के दशक के अंत में जब भारत और पाकिस्तान अपने अपने परमाणु अभियानों क्रमश: “शक्ति” और “गौरी” की आँच से तप रहे थे तो ग़ालिब के दो सदी बाद मनाये जाने वाले जयंती समारोह “अंदाज-ए.बयां” की मार्फत मशहूर... Continue Reading →
जो आम में है वो लब ए शीरीं में नहीं रसरेशों में हैं जो शेख की दाढ़ी से मुक़द्दसआते हैं नज़र आम, तो जाते हैं बदन कसलंगड़े भी चले जाते हैं, खाने को बनारस होटों में हसीनों के जो, अमरस... Continue Reading →
तुममें कहीं "कुछ" है कि तुम्हें उगता सूरज, मेमने, गिलहरियाँ, कभी-कभी का मौसम, जंगली फूल-पत्तियां , टहनियां - भली लगती हैं... (रघुवीर सहाय) इस "कुछ" को परिभाषित करना दुष्कर कार्य है| हरेक के लिए है| हमेशा रहा है| इंटरनेट के अस्तित्व में... Continue Reading →
युगों युगों से महान हिमालय पर्वत श्रंखला के साये में रहने वाले लोग जानते हैं कि उनके आदि पुरुष, देवों में श्रेष्ठतम स्थान पाने वाले शंकर महादेव कितने भोले थे, उन्हे तो भोले शंकर के नाम से भी जाना जाता है। विकट विद्वान महाशय... Continue Reading →
“दुःख तोड़ता भी है, पर जब नहीं तोड़ता या तोड़ पाता, तब व्यक्ति को मुक्त करता है” (अज्ञेय के विलक्षण उपन्यास “नदी के द्वीप” की दो में से एक नायिका का कथन) दुःख एक नितांत निजी मसला है मनुष्य के... Continue Reading →
मजरुह ने शब्दों का विन्यास इस तरह से सजाया है कि गाने और विराम में एक ज़रा सी चूक लय बिगाड़ सकती थी लेकिन लता जी ने अन्तरों की लम्बी पंक्तियों को इस खूबसूरती से गाया है, एकदम उचित जगह... Continue Reading →
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