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#MirzaGhalib

दिल्ली और अन्य कवितायेँ : मुहम्मद अल्वी 

बेहतर लिखने वाले किसी शहर पर भी चंद पंक्तियों में ऐसा लिख सकते हैं कि पढ़ने वाला शब्दों के जादू में खो जाए| शायर मुहम्मद अल्वी साहब की रचनायें भी ऐसी ही आकर्षक हैं कि उन्हें सिर्फ एक बार पढ़ने वाला भी ... Continue Reading →

Yeh Woh Manzil To Nahin (1987) : अपराध बोध से भयभीत जीवन का पश्चाताप

                  ...[राकेश] पुनश्च : हाल में ऐसी ख़बरें थीं कि सुधीर मिश्रा ने कहीं कहा है कि वे इस फ़िल्म - ये वो मंजिल तो नहीं, को दुबारा बनायेंगे| ऐसा करने से बेहतर हो कि वे इस फ़िल्म को ओटीटी आदि... Continue Reading →

जॉन एलिया : सिनेमा के परदे पर कब?

[ सालहा साल और एक लम्हाकोई भी तो ना इनमे बल आया खुद ही एक दर पर मैंने दस्तक दीखुद ही लड़का सा मैं निकल आया उर्दू शायरी के गुलशन में हज़ारों फूलों ने अहसास की अमिट खुशबू बिखेरी है... Continue Reading →

Mirza Ghalib (1988-89): पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है… (अध्याय 5)

“दुःख तोड़ता भी है, पर जब नहीं तोड़ता या तोड़ पाता, तब व्यक्ति को मुक्त करता है” (अज्ञेय के विलक्षण उपन्यास “नदी के द्वीप” की दो में से एक नायिका का कथन) दुःख एक नितांत निजी मसला है मनुष्य के... Continue Reading →

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