वरिष्ठ कथाकार राजेन्द्र राव जी ने बेहतरीन प्रेम कहानियाँ लिखी हैं और साहित्यिक पत्रिका – निकट (अंक 45) में उनकी लिखी एक प्रेम कहानी – एक खूबसूरत मोड़ , छपी है|
कहानी स्त्री मन की परतों और पुरुष मन की नासमझ भरी उलझनों को खंगालती है और जताने का प्रयास करती है कि परस्पर प्रेम में भी स्त्री और पुरुष मन एक ही तरीके से प्रवेश नहीं करते| दोनों के एक दूसरे पर अधिकार समझने और जताने के तरीके भी अलग हो सकते हैं| प्रेम का पदार्पण दोनों के जीवन को अलग अलग ढंग से प्रभावित कर सकता है| एक ही प्रेम के दायरे से दोनों के प्राप्य भी अलग हो सकते हैं|
पुरुष कुछ पाकर और ज्यादा पाने की यात्रा करता रह सकता है और स्त्री कुछ पाकर वहीं स्थिर हो ज्यादा गहराई की यात्रा कर सकने में सक्षम हो सकती है| प्रेम में स्त्री और पुरुष के लिए देह का अस्तित्व अलग प्रकार से हो सकना संभव है यह कहानी इस ओर इशारा करती है और कहती है कि यह आवश्यक नहीं कि सदा सामंजस्य बैठ ही जाए, अलबत्ता ऐसा भी होता है कि दोनों के दैहिक सुर मिलकर एक ही सुर बन जाएँ| इसलिए भारतीय परंपरा में और विशेषकर संस्कृत की संस्कृति में सहवास और संभोग जैसे शब्द अस्तित्व में आये जो निश्चित ही मनुष्य के काम संबंध तक सीमित शब्द नहीं हैं| दोनों ही शब्द जीवन की किसी भी अवस्था का मिल कर आनंद लेने के लिए जन्में शब्द हैं जहाँ दो व्यक्तियों के मन इतने सामंजस्य में आ जाएँ कि उनके आनंद भी समान प्रकृति और मात्रा के हो जाएँ|
कहानी दो युवा प्रेमियों के बीच घटी कुछ घटनाओं और दोनों के मनोविज्ञान के माध्यम से प्रेम की कुछ परतों का विश्लेषण करती है और प्रेम के एक संभावित रूप का किस्सा कहती है|
कहानी – एक खूबसूरत मोड़, का नायक – समय, नायिका – तिथि, से स्पष्ट सन्देश चाहता है कि वह उससे प्रेम करती है| तिथि उसके साथ समय व्यतीत करती है, समय से दैहिक नजदीकी उसे विचलित नहीं करती, लेकिन समय के लिए इतना पर्याप्त नहीं| उसके लिए प्रेम में निश्चिंतता का अर्थ है कि वे इस थोड़े से दैहिक संपर्क से आगे बढ़ें और उनके बीच की दूरियां शीघ्र समाप्त हों| उसे बेहद खलता है कि तिथि उसके बिलकुल समीप बैठकर घंटों मौन रह सकती है| कहीं किसी प्राकृतिक सौन्दर्य में खोयी रह जा सकती है|
समय को शब्दों से सहारा चाहिए, भावों के स्पष्ट प्रकटीकरण का संबल चाहिए| वह जल्दी में है और इस रिश्ते को तुरंत परिभाषित करना चाहता है, उसे ब्लैक एंड व्हाइट में समझना है कि उनके बीच का संबंध कैसा है? उसकी बुद्धि या समझ यह सूक्ष्मता देख पाने में असमर्थ है कि जो स्त्री उसकी उपस्थिति में इतनी निश्चिंत हो जाती है कि मौन बैठ समय व्यतीत कर सकती है वह कितने बड़े ठहराव को प्राप्त कर चुकी है और यह सब इसलिए हुआ है कि उसके जीवन में प्रेम ने प्रवेश कर लिया है|
लेकिन चूंकि समय उस स्थिति में पहुँच गया है जहाँ – मैं जो बोलूं हाँ तो हाँ, मैं जो बोलूं ना तो न, अतः उसकी समझ में तिथि का व्यवहार अबूझ पहेली बन कर रह गया है|
एक बार ऐसी चर्चा में तिथि उसे इशारा भी करती है कि वह दिल और मन के बीच के अंतर को नहीं समझ पा रहा है| लेकिन सब कुछ सीधे शब्दों में समझने पर आतुर समय अपनी ओर से एक अंतिम पासा फेंकता है| उसे लगता है अगर वह तिथि पर भावनाओं का आघात करेगा तो विचलित होकर वह कुछ न कुछ स्पष्ट कहेगी ही|
वो अफसाना जिसे अंजाम तक ले जाना न हो मुमकिन
उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ देना अच्छा
साहिर के शब्दों का सहारा लेकर वह तिथि को चोट पहुँचाना चाहता है लेकिन परिणाम अनपेक्षित रूप से सामने आता है|
आगे की घटनाएं उसके सामने स्वयं ही स्पष्ट कर देती हैं कि शारीरिक चोट और मन की चोट का असर भी एक जैसा ही हो सकता है| दोनों ही इंसान को पत्थर जैसा कठोर या बर्फ जैसा ठंडा कर सकता है|
कहानी स्त्री और पुरुष मन के अंतर को बयान करती है और दोनों की अलग-अलग प्रकृति और गति को दर्शाना चाहती है| कहानी पुरुष को संकेतों को समझने की कला विकसित करने का सुझाव देती है| उसे संबंधों में नाजुकता का सम्मान करने की सलाह देती है| और यह लक्ष्य भी देती है कि जीवन में थोड़ा बारीक देखना सीख लो|
लेखक राजेन्द्र राव अपनी इस कहानी में कवि विनोद श्रीवास्तव के एक प्रसिद्द गीत की एक पंक्ति – एक खामोशी हमारे बीच है, तुम कहो तो तोड़ दूं पल में, का बड़ा खूबसूरत उपयोग कहानी में एकदम सटीक जगह पर करते हैं|
लेखक या कवि अपनी रचना के माध्यम से किसी विषय के विभिन्न पहलुओं को विश्लेषित करता है, बहुत सी प्रेम कहानियां लिख चुके राजेन्द्र राव जी, इस कहानी के माध्यम से पुनः प्रेम के अथाह समुद्र में गोता लगाकर कुछ नए पहलू सामने लाये हैं|
…[राकेश]
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