महेश मांजरेकर की फिल्म City of Gold अमीरी गरीबी के बीच संघर्ष की राजनीति को दिखाती है।
उदारीकरण के बाद से हिन्दी सिनेमा ने गरीब और अमीर के बीच के अन्तर को दर्शाती हुयी फिल्में बनाना बंद कर दिया था और गरीब मेन स्ट्रीम हिन्दी सिनेमा की कहानियों से धीरे-धीरे गायब ही हो गया। गरीब, किसान और मजदूरों को ऐसे दुर्भाग्यशाली चरित्र मान लिया गया जिनका सिनेमा से स्थान समान्तर सिनेमा के लगातार गायब होते अस्तित्व के साथ ही गायब होता चला गया। यह फिल्म गरीब मजदूरों और उनके संघर्षपूर्ण जीवन को सामने लाने का प्रयास करती है।
फिल्म की कहानी के केन्द्र में 80 के दशक के शुरुआत में बम्बई की टैक्स्टाइल मिल्स में हुयी मजदूरों की हड़ताल है और यह दिखाया गया है कि इस और ऐसी हड़ताल का मजदूरों की ज़िन्दगी पर क्या असर पड़ता है और अमीर मिल मालिकों और राजनेताओं का भ्रष्ट गठबंधन कैसे हजारों गरीब मजदूरों और उनके परिवारों की ज़िन्दगियों से खेलता है और कैसे एक शहर का चरित्र पूरी तरह बदल कर रह जाता है।
बम्बई की वह हड़ताल एक बड़ी घटना थी और इसने बम्बई और भारत के आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य को काफी हद तक प्रभावित किया।
अगर 60 और 70 के दशकों के रेल मजदूरों के आंदोलन की अगुवाई ने जार्ज फर्नांडिस को भारतीय राजनीति में एक प्रमुख नेता बना दिया तो बम्बई में 70 और 80 के दशकों में मजदूर खास तौर पर टैक्सटाइल मिल्स के मजदूर आंदोलन की अगुवाई ने डा. दता सामंत को बम्बई में मजदूरों का एक प्रमुख नेता बना दिया और वे महाराष्ट्र की राजनीति में एक बड़ा नाम उभर कर आये। उनकी आग उगलती राजनीति का आलम ऐसा था कि यूँ तो 70 के दशक में वे कांग्रेस के सद्स्य थे पर इमेरर्जैंसी के समय उन्हे भी जेल भेज दिया गया था। ये मशहूर था कि उन्होने मजदूर हितों को राजनीति और इसमें प्राकृतिक रुप से उभरने वाली महत्वाकांक्षा से ऊपर रखा। शायद यही वजह रही होगी कि वे अमीर मिल मालिकों और अन्य राजनेताओं की आँखों में खटकते रहे और अंत में उनकी हत्या कर दी गयी।
फिल्म में डा सामंत से प्रेरित होकर एक ऐसे ही तेज तर्रार मजदूर नेता का चरित्र गढ़ा गया है और उनके मिल मालिक खेतान और उसके दामाद के साथ वाले दृष्य और उनके मजदूरों को सम्बोधित करने वाले दृष्य परदे पर आग जैसी तपिश लेकर आते हैं। इस चरित्र को निभाने वाले अभिनेता ने अपनी पैनी, सामने वाले को चीर कर रख देने वाली दृष्टि और तीखी और अंगारे बरसाती आवाज से छोटे से रोल में जान डाल दी है।
बम्बई (और भारत में हर जगह) मिल मालिकों को सरकार से 99 सालों की लीज पर जमीन मिली थीं जिन पर उन्होने अपनी फैक्ट्रियाँ स्थापित कीं पर बाद में मिल मालिकों और राजनेताओं और सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्ट गठबंधन ने इन मिलों की जगहों को रियल एस्टेट सम्पत्तियों में बदल दिया और जिन फैक्टरियों से हजारों परिवारों के लाखों सदस्यों का जीवन चलता था उन्हे बंद कर दिया गया और उन स्थानों को बेचकर वहां शापिंग मॉल्स और बहुमंजिला इमारतें खड़ी कर दी गयीं।
मजदूर मेहनत करना जानता है और वह एक क्षेत्र में मेहनत करने की क्षमता विकसित कर लेता है। वह आर्थिक क्षेत्र को उस ढ़ंग से प्रभावित नहीं करता जैसे कि अमीर मिल मालिक। वह मेहनत तो कितनी ही कर सकता है पर जीवन यापन के लिये मिलों के चलने पर निर्भर रहता है। वह सिर्फ इतना कमा पाता है जिससे किसी तरह उसका और परिवार का पेट भर पाये और बच्चे किसी तरह शिक्षा पा जायें। घर में एक सद्स्य की बीमारी ही मजदूरों की कमर तोड़ देती है। भारत जैसे देश में अमीर और गरीब के बीच में बहुत बड़ा अंतर है।
अमीर के पास इतना पैसा इकट्ठा हो जाता है कि उसकी फैक्ट्री में हड़ताल का उसकी ऎश्वर्य से भरपूर जीवन शैली में कोई अंतर नहीं आता पर मजदूर के घरों का चूल्हा भी जलना बंद हो जाता है। भूख के कारण मजदूर को विवश होना पड़ता है अमीर के सामने झुकने को। गरीब का भी परिवार होता है और उसे भी अपने बच्चों की भूख परेशान करती है।
फिल्म में गरम मिजाज का एक मजदूर नेता मिल मालिक से कहता भी है:-
तुम्हारे पास बस मजदूरों को देने को पैसा नहीं है पर तुम्हारे बँगले नये बन रहे हैं, नयी नयी कारें तुम्हारे घर के सामने खड़ी हैं।
अमीरी गरीबी का अस्तित्व भी एक तुलनात्मक स्तर पर होता है। समाज में थोड़े से ज्यादा पैसे रखने वाला मजदूर को दो पैसे ज्यादा देने में आनाकानी करता है परन्तु किसी बड़ी कम्पनी के उत्पाद खरीदने को वह वास्तविक कीमत से कई गुना ज्यादा कीमत देने में कोई आनाकानी नहीं करता।
गरीब लड़े तो कैसे लड़े अमीर और उसकी धन-दौलत की पॉवर के सामने?
एकता के साथ की गयी हड़ताल ही उन्हे एकमात्र अहिंसक रास्ता दिखायी देता है। ऐसा नहीं है कि हड़तालें राजनीति से प्रेरित होकर नहीं होतीं या किन्ही नेताओं की स्वार्थ पूर्ति के लिये मजदूरों को भड़का कर हड़तालें नहीं करवायी जातीं या करवायी नहीं गयी हैं। भारत में बहुत सारे अर्द्ध सरकारी उपक्रमों को बहुत बड़ी हानि स्वार्थ से प्रेरित और राजनीति के गंदे मंसूबों को पूरा करने के लिये पहुँचायी गयी है और उनमें से बहुत सारे उपक्रम अंत में या तो बंद कर दिये गये या भ्रष्ट तंत्र ने उन्हे औने पौने दामों में बेच दिया।
फिल्म के कथानक में यह एक बहुत बड़ी कमी है कि यह प्रेरणा तो बम्बई की सच्ची घटनाओं से लेती है पर यह समस्याओं के मूल में गहरायी से जाने की कोशिश नहीं करती और यह हिम्मत भी नहीं कर पाती कि उन राजनीतिक दलों को भी इस कथानक का हिस्सा बना पाती जिन्होने उस दौर से सबसे ज्यादा मुनाफा कमाया तथा एक तरह से बम्बई के रियल एस्टेट व्यापार पर हमेशा के लिये कब्जा कर लिया।
फिल्म कुछ बिखरी हुयी लगती है कभी तो यह एक परिवार की कहानी लगती है और कभी बम्बई के उस दौर पर एक सामाजिक अध्ययन। परिवार के एक सद्स्य के गुण्डागर्दी में पड़ जाने को महेश मांजरेकर अपनी बहुचर्चित फिल्म वास्तव में विस्तृत रुप से दिखा चुके हैं और यहाँ भी परिवार के सबसे छोटे बेटे नरु की कहानी वह एक तरह से वास्तव में दिखा चुके हैं और यहाँ वह भाग पुनरावृति ही लगता है और इस भाग से वास्तव कहीं ज्यादा अच्छी फिल्म थी।
अपनी कुछ कमियों के बावजूद यह महेश मांजरेकर की उल्लेखनीय फिल्म है और कह सकते हैं कि वास्तव, अस्तित्व और किसी हद तक विरुद्ध के बाद उन्होने एक अच्छी फिल्म बनायी है। फिल्म और भी अच्छी हो सकती थी यदि एडिटिंग और ज्यादा चुस्त होती और फालतू के दृष्य हटा दिये जाते जैसे कि अंत में फिल्म बेहद ढ़ीली पड़ जाती है। बल्कि जहाँ फिल्म का सूत्रधार पात्र, लेखक बाबा, अपनी प्रेमिका से कहता है कि मुझे तो ये चाल एक कब्रिस्तान लगती है और जैसे हम कहते हैं कि डायनासोर्स हुआ करते थे कभी हम कहेंगे मजदूर हुआ करते थे, वहीं फिल्म खत्म हो जानी चाहिये थी।
उसके चाल वाले घर के सामने दुकान चलाने वाले युवक ने उसकी बहन की ज़िन्दगी एक तरह से बर्बाद कर दी थी और वह हँस कर अपनी प्रेमिका को उसे दिखाता है और दुकानदार अभी भी किसी अन्य युवती को अपने प्रेम जाल में फंसाने की चेष्टा कर रहा है। फिल्म में ऐसी कई अनियमितताएं हैं और यही सब इस फिल्म को एक बहुत अच्छी फिल्म बनने से रोकते हैं।
अभिनय के लिहाज से फिल्म में कई अभिनेताओं ने एकदम सॉलिड अभिनय किया है और सीमा बिस्वास, सतीश कौशिक और सचिन खेंडेकर जैसे मंजे हुये अभिनताओं ने अपने अपने चरित्रों की खाल में घुसकर तसल्लीबख्श अभिनय किया है और दर्शाया है कि जब जब मौका मिलता है वे कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सचिन खेंडेकर के अभिनय की खास तौर पर तारीफ करनी पड़ेगी। वे छोटे से छोटे चरित्र में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ देने में माहिर हो गये हैं और गाहे बेगाहे ही वे किसी फिल्म में साधारण स्तर का अभिनय करते हैं और निस्सन्देह वहाँ निर्देशक उनकी अभिनय क्षमता से पूरी तरह परिचित नहीं होता या इस बात से कम वास्ता रखता है कि अच्छा अभिनय क्या होता है।
समीर धर्माधिकारी, मिल मालिक के दामाद और कश्मीरा शाह, चाल में रहने वाली एक ऐसी महिला जो संतान प्राप्ति के लिये अपने ही मुंहबोले भानजे से सम्बंध स्थापित करती है, अच्छा काम कर गये हैं। टीवी सीरियल बा बहु और बेबी में एक हंसोड़ किरदार के रुप में दिखने वाले सिद्धार्थ जाधव स्पीडब्रेकर के रोल में अच्छी संभावनायें दिखाते हैं।
बहुत सारे अभिनेता पहली बार परदे पर (कम से कम हिन्दी फिल्मों में) दिखायी दिये हैं पर उन्होने अपने अपने चरित्रों को जीवित कर दिया है। और वे एक नयापन सामने लाये हैं।
महेश मांजरेकर बहुत अरसे से कोई अच्छी फिल्म नहीं बना पा रहे थे उस लिहाज से यह एक अच्छा प्रयास लगा था और लगता था कि वे अपना फॉर्म पा गये हैं और अब बेहतरीन फिल्म बनायेंगें पर इसके बाद से वे हिंदी फिल्म नहीं निर्देशित कर पाए हैं और हिंदी फिल्मों में अभिनय में ज्यादा व्यस्तता दिखा रहे हैं| अगर यह सोचा जाये कि यह एक ऐसा विषय था जहाँ वे होम फ्रंट पर खेल रहे थे और यह विषय बरसों से उनके अंदर कुलबुला रहा होगा और वे एक बहुत ही अच्छी फिल्म बना सकते थे, तो ये मानना पड़ेगा कि वे थोड़ा चूक गये हैं।
…[राकेश]
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