swami-001नरेन्द्र (विक्रम) और मामा जी (उत्पल दत्त) जीवन में मनुष्य की स्वतंत्रता और जीवन दर्शन पर बातें कर रहे हैं। एक विषय पर मामाजी अपनी पुत्री सरीखी भानजी सौदामिनी (शबाना आजमी), जिसे सब मिनी कह कर सम्बोधित करते हैं, को पुकारते हैं और उसके आने पर नरेन्द्र से कहते हैं कि मिनी तुम्हारी बात का जवाब देगी।

नरेन्द्र कहते हैं,” हमारे अंतर्विरोध में जीने की मजबूरी, क्या हम स्वतंत्र रुप से जी सकते हैं, मैं कहता हूँ जी सकते हैं लेकिन मामा जी का कहना है…”।

मिनी कहती हैं,” मान लीजिये आपकी एक बहन है जो दूसरी जाति के एक मामूली आदमी से शादी करना चाहती है”।
उत्सुकता से बात सुन रहे नरेंद्र की आँखों में आँखें डालकर मिनी कुछ मुस्कुराकर आगे कहती हैं,”आप इस शादी का विरोध जरुर करेंगे”।

मिनी की मुस्कान को न पहचानते हुये, प्रगतिशील होने का सूबूत देने के लिये नरेंद्र तपाक से कहते हैं,”ऑफकोर्स नॉट, मैं अपनी बहन का साथ दूँगा, अगर घरवाले विरोध करेंगे, घरवालों से लड़ूँगा, वो जहाँ प्यार करेगी वहीं उसकी शादी करुँगा”।

मामाजी हँसकर जैसे नरेंद्र के तर्क का साथ दे रहे हों। मिनी भी अपनी मुस्कान को और ज्यादा बढ़ाकर नरेंद्र की तारीफ में कहती हैं,”बहुत अच्छे”।

गर्वित नरेन्द्र को हर्षित मुद्रा में ही घेरती हुयी मिनी कहती हैं,” मान लीजिये आपकी शादी हो चुकी है लेकिन आपकी पत्नी किसी दूसरे से प्रेम करती है, तो क्या आप उसे प्रेम करने की आजादी देंगे?”

इस दूसरे प्रश्न से नरेंद्र अवाक रह जाते हैं और हैरान होकर पूछते हैं,”क्या?”

हँसती हुयी मिनी कहती हैं,” आप इतना सकपका क्यों गये, क्या शादी के बाद औरत का प्रेम करने का अधिकार खत्म हो जाता है, या यह सौभाग्य सिर्फ पुरुषों का ही है”।

नरेंद्र मिनी की बातों के जाल में फँस चुके हैं और अपनी प्रगतिशील छवि बनाये रखने के लिये वे थोड़ा हिचकिचाते हुये कह जाते हैं,” अगर पुरुष कर सकता है तो शादी के बाद औरत को प्रेम करने का पूरा अधिकार है”।

अपनी बात खत्म करते करते नरेंद्र पुनः हल्का गर्व महसूस करने लगते हैं कि वे कितने खुले विचारों वाले व्यक्ति हैं। वे मुस्कुराकर मिनी की तरफ देखते हैं इस आशा के साथ कि वे पुनः बहस में वापस आ चुके हैं।

परंतु मिनी उनकी आशाओं पर ठंडा पानी डालते हुये गम्भीर आवाज में कहती हैं,” नहीं, शादी के बाद न पुरुष को किसी दूसरे से प्रेम करने का अधिकार है और न नारी को। क्योंकि शादी एक बंधन है और जिससे हमारी स्वतंत्रता पर एक अंकुश आ जाता है, और इसी अंकुश को मानने से समाज का कल्याण है। इसीलिये आपका कहना कि इंसान हर हालत में स्वतंत्र रह सकता है ठीक नहीं है। किसी ने कहा है, जिंदगी के जो बंधन हैं, जो उलझने हैं वो हमें अच्छा बनाने के लिये हैं, बुरा नहीं…”। मिनी शर्माती हुयी मुस्कुराकर नरेंद्र की ओर देखती हुयी कहती है.” और कुछ बंधन कुछ बेड़ियाँ इतनी मधुर होती हैं…”।

तो यह है स्वामी फिल्म की नायिका सौदामिनी, जो स्नातक होने के कगार पर है। मिनी बचपन में ही अपने पिता को खो चुकी थी और तभी से ही वह अपनी माता (सुधा शिवपुरी) के साथ अपने मामा के घर पर रहती आयी है। अविवाहित मामा ने मिनी को ही अपनी पुत्री की तरह पाला है।

नरेंद्र उस इलाके के जमींदार के पुत्र हैं और उनका घर मिनी के मामा के घर के सामने ही है। नरेंद्र कलकत्ता में पढ़ते हैं और वहाँ से घर आते समय मिनी और मामा जी के लिये किताबें लाते रहते हैं।

बासु चटर्जी द्वारा निर्देशित फिल्म, स्वामी, शरत चंद्र चटर्जी के उपन्यास पर आधारित है। युवावस्था में रचे अपने प्रथम लघु उपन्यास देवदास, के समय से ही उनके उपन्यास की नायिका का अपने पड़ोस में रहने वाले धनी युवक से प्रेम हो जाना उनके कई उपन्यासो का अहम भाग रहा है। उनके कई उपन्यासों पर आधारित फिल्मों ने भारतीय सिनेमा को धनी बनाया है।

शरत बाबू का साहित्य भावना प्रधान है और अक्सर तर्क और भावना की मुठभेड़ उनकी रचनाओं में देखने को मिल जाती है।

मिनी, नरेंद्र और मामा जी के मध्य उपरोक्त्त बहस, स्वामी फिल्म के लिये एक आधार का कार्य करती है, जैसा कि बाद में देखने को मिलता है कि मिनी, नरेंद्र और मिनी के पति घनश्याम (गिरीश कर्नाड), तीनों को इस बहस में वर्णित स्थितियों से गुजरना पड़ता है।

मामा जी आधुनिक और प्रगतिशील विचारों के मालिक हैं और वे चाहते हैं कि मिनी एक आत्मनिर्भर, ज्ञानवान और आधुनिक विचारों वाली महिला के रुप में विकसित हो और मिनी को भी स्त्री का यही प्रगतिशील और विकसित रुप भाता है परंतु मिनी की माँ एक पुरातनपंथी किस्म की महिला हैं और वे उन्हे अपने भाई का मिनी को इस तरह बढ़ावा देना एक आँख नहीं भाता। वे जल्द से जल्द मिनी को शादी के बंधन में बाँढ देने के लिये तत्पर रहती हैं। उनके तीन ही काम है – घरेलू कार्य, पूजा पाठ में लगे रहना या फिर मिनी की शादी की चंता और इस दिशा में अपनी ननद से चिट्ठी पत्री करना। मिनी की माँ का चरित्र इकहरा है, एकरंगी है और ऐसे चरित्र को परदे पर देखना रोचकता नहीं ला पाता, सुधा शिवपुरी ने अपने चरित्र को निभाया भी है बेहद औसत अंदाज में।

मिनी और नरेंद्र के मध्य हुयी बहस में शामिल विवाह और समाज में स्त्री-पुरुष के अंतर को लेकर व्याप्त धारणायें आज के दौर में भी प्रचलन में हैं। शरत बाबू के समय से लेकर आज तक ऐसा नहीं हो पाया है कि स्त्री और पुरुषों को भारतीय समाज में बराबरी का दर्जा मिल गया हो। पुरुष जिन कामों को करके सीना चौड़ा करके अपने पौरुष का बखान करता घूम सकता है वही कार्य भारतीय समाज में स्त्री को बड़ी आसानी से चरित्रहीन घोषित करवा देते हैं।

फिल्म में कुछ स्पष्ट दिखायी देने वाली कमजोरियाँ शुरु से ही सिर उठाने लगती हैं। मामा जी अपनी अनुभवी आँखों से भाँप लेते हैं कि मिनी और नरेंद्र के मध्य परस्पर लगाव पनप रहा है और जल्द ही यह प्रेम का रुप ले लेगा, वे इसके विरोध में भी नहीं हैं। नरेन्द्र हर लिहज से मिनी के लिये एक उपयुक्त्त वर है।

परंतु चौबीसों घँटे मिनी की शादी की चिन्ता में घर का माहौल तनाव से भरने वाली मिनी की माँ को नरेंद्र में मिनी के लिये योग्य वर की झलक नहीं दिखायी देती, बल्कि वे सख्त नापंसद करती हैं मिनी का नरेंद्र के पास जाकर बैठना और उनसे हँस कर, खुलकर बातें करना।

मिनी की माँ को मिनी से कुछ साल बड़े विधुर घनश्याम से उसकी शादी करने में कोई उलझन नहीं दिखायी देती परंतु नरेंद्र से विवाह की बात भी वे नहीं सोचना चाहतीं। नरेंद्र एक धनी घर से ताल्लुक रखते हैं और हो सकता है कि नरेंद्र के घरवाले उन्हे मिनी से विवाह करने देने के लिये अनुमति न दें परंतु नरेंद्र तो ऐसी सब बाधाओं से पार पाने के लिये राजी हैं।

बहरहाल परिस्थितियाँ ऐसे हालात बना देती हैं कि दिल के मरीज मामा जी अपनी अंतिम घड़ियों में मिनी को ज्ञान दे जाते हैं,” मिनी, नरेंद्र प्रेम तो कर सकता है पर उसे निभा, घनश्याम ही पायेगा”।

नरेंद्र की अनुपस्थिति में, मिनी की मर्जी के खिलाफ उसकी शादी घनश्याम से हो जाती है।

फिल्म यह भ्रम भी उत्पन्न करती है कि मिनी का मायका मधुपुर में है या उसकी ससुराल, क्योंकि इस संबंध में दो विरोधाभासी बातें फिल्म में आती हैं।

बासु चटर्जी की फिल्म, स्वामी, फिल्म में उठाये गये मुद्दों पर बहुत बड़ी बहस को जन्म नहीं दे पाती, हालाँकि एक फिल्म के तौर पर यह बहुत अच्छी फिल्म लगती है और कुछ कमजोरियों के बावजूद एक अच्छी फिल्म देखे जाने का भरपूर संतोष दे जाती है। स्वामी यह भी दर्शाती है कि कथानक में कुछ कमजोरियों के बावजूद, अगर फिल्म निर्मांण के अन्य तत्वों को ढ़ंग से सँवारा जाये तो एक अच्छी फिल्म बन कर सामने आ सकती है। अच्छा अभिनय, प्रभावी संवाद, तकनीकी क्षेत्रों में प्रभावशाली प्रदर्शन. अच्छा संगीत और अच्छा निर्देशन, स्वामी को एक अच्छी फिल्म बनाते हैं और तीस सालों से ज्यादा समय बीतने के बावजूद स्वामी दर्शकों को बाँधे रखने में सफल रहती है।

फिल्म का आधार, फिल्म का विषय होता है और स्वामी का विषय भारतीय समाज से गहराई से जुड़ा हुआ है। महिलाओं के लिये तो मिनी के विवाह के पश्चात ससुराल में पँहुचने के बाद की घटनायें बहुत सार्थक दिखायी देती हैं। ससुराल में पहले ही दिन, मिनी की सास (शशिकला), जो कि घनश्याम की सौतेली माँ हैं, सबको सुनाकर कहती हैं,” घनश्याम को तो किसी भी तरह का दिखावा पसंद नहीं है अतः सारी रस्में साधारण तरीके से निबटायी जा रही हैं और वैसे भी बहु अपने साथ कुछ खास लेकर भी नहीं आयी है जिसे लोगों को दिखाया जा सके”।

मिनी की रजामंदी नहीं थी इस विवाह को करने में और वे घनश्याम के सामने इस बात को अपने व्यवहार से स्पष्ट भी कर देती हैं, परंतु वे घनश्याम को एक अलग ही तरीके का इंसान पाती हैं। घनश्याम में किसी तरह की कोई जल्दबाजी नहीं है। वे अपना किसी तरह् का कोई भी अधिकार मिनी के ऊपर लादना नहीं चाहते। मिनी उनके बिस्तर पर नहीं सोना चाहती तो वे बड़ी सादगी से दूसरा बिस्तर लगवाने की बात कहते हैं।

धीरे-धीरे मिनी ससुराल के वातावरण को समझने लगती है। घनश्याम से उन्हे कोई लगाव नहीं है परंतु वे देखती हैं कि घनश्याम के साथ बहुत ही सौतेला किस्म का व्यवहार किया जाता है और जहाँ घनश्याम के सौतेले भाई निखिल (धीरज कुमार) और उसकी पत्नी शोभा (रितु कमल), और सौतेली बहन चारुलता (प्रीति गांगुली) की सेवा के लिये सारा घर और सारे सेवक एक पैर पर खड़े रहते हैं वहीं घनश्याम को पूरी तरह नजरअंदाज किया जाता है।

जब घर वाले ही घनश्याम की उपेक्षा करते हैं तो घरेलू नौकर भी इस समीकरण को बखूबी समझ लेते हैं कि घर में घनश्याम की सौतेली माँ और उनकी संतान की जी हुजूरी करने में ही भलाई है। वे लोग भी घनश्याम की उपेक्षा करते हैं और घनश्याम को काम से देर रात घर वापस आने पर हाथ-मुँह धोने के लिये बार बार माँगने पर भी कोई पानी देने के लिये नहीं आता। नौकरानी भी ऊँची आवाज में रसोई से ही उत्तर दे देती है कि वह व्यस्त है और नहीं आ सकती पानी देने के लिये।

कभी कभी ऋणात्मक बातें परिवर्तित कर देती हैं किसी व्यक्ति के विचारों को। घनश्याम की खूबियों से ज्यादा, घर में उनकी उपेक्षा, मिनी को उनके बारे में सोचने के लिये प्रेरित या विवश करती है।

मिनी पढ़ी लिखी और समझदार युवती हैं। अपने मायके में वे अपने मामा के प्रोत्साहन की वजह से स्वतंत्र रुप से सोचने और अपने आत्म सम्मान की रक्षा करने में समर्थ युवती के रुप में विकसित हो चुकी हैं। विपरित परिस्थितियों में आत्मसम्मान की तीव्रता कुछ ज्यादा ही हो जाती है।

सौतेले देवर निखिल की पत्नी, शोभा, जब मिनी को नयी, और कम बोलने के कारण, कुछ मूर्ख समझ कर पट्टी पढ़ाती हुयी, मिनी और घनश्याम का हल्का सा मखौल उड़ाते हुये, कहती हैं,” जेठ जी तो साधु आदमी हैं, न हो तुम ही उनके पास जाकर लेट जाना” तो मिनी अपने व्यक्तिगत मामलों में शोभा के हस्तक्षेप और व्यंग्यमयी टिप्पणी से आहत और नाराज होकर उठकर चली जाती हैं।

स्वामी संयुक्त्त परिवार में उत्पन्न हो जाने वाली कठिनाइयों को बड़े अच्छे ढ़ंग से दिखाती है। भारत में तोते की तरह लोग रटते रहते हैं कि भारत को गर्व है संयुक्त्त परिवार की परम्परा पर। परंतु ज्यादातर मामलों में यह एक झूठा गर्व ही सिद्ध होता है। सिद्धांत चाहे संयुक्त्त परिवार का हो या एकल परिवार का, उसकी स्वस्थ कामयाबी का दारोमदार अंत में व्यक्ति पर ही रहता है। अपने आप में सारे सिद्धांत गुण और दोष दोनों से भरे हुये होते हैं, यह जीवित व्यक्तियों के विवेक और व्यवहार पर निर्भर करता है कि वे कैसे इन सिद्धांतों को सफल बनाते हैं।

ऐसा बिल्कुल नहीं है कि केवल नाम के लिये संयुक्त्त परिवार की रट लगाने से पारिवारिक जीवन सुखमयी हैं बल्कि देखा यही गया है कि बड़े संयुक्त्त परिवारों में यदि सदस्यों के प्रति भेदभाव या पक्षपात किया जाता है तो कुछ सदस्यों को बहुत बड़े मानसिक तनावों से गुअजरना पड़ता है और उनका जीवन नर्क समान हो जाता है जबकि पक्षपात का लाभ उठाने वाले सदस्य, उसी चारदीवारी के अंदर स्वर्ग सरीखा जीवन जीते हैं। ऐसे पक्षपात बहुत बड़े घरेलू झगड़ों की बुनियाद रखते हैं और बहुत बड़े बड़े अपराध परिवारों में ही हो जाते हैं।

घनश्याम की धैर्यशील और भली प्रकृति ही उनके परिवार में कलह को रोकती है। उनके द्वारा स्वंय के सुखों का त्याग ही है जो घर को एक रखे हुये है यदि वे अपने लिये भी सुविधाओं की माँग करने लगें तो उनकी सौतेली माँ को यह एक आँख न भायेगा।

घनश्याम की मेहनत से चलाये जा रहे आढ़त के व्यापार से घर का खर्च चलता है जबकि नगर निगम में कार्य कर रहे निखिल का वेतन उनके लिये सुख सुविधाओं को जुटाने पर खर्च होता है। घनश्याम की मेहनत और त्याग की बदौलत उनके पिता के दूसरे विवाह से बने परिवार के तीन सदस्य ऎश करते हैं, जबकि उन्हे खुद को खाना भी बासी और बचा खुचा खाना पड़ता है।

घनश्याम की सौतेली माँ हर लिहाज से छोटे दिल की महिला हैं। नौकर द्वारा यह बताने पर कि घनश्याम बाबू ने आज कुट्टी अपने एक मजदूर को दिलवा दी वह नौकर को डाँटती हैं और कहती हैं,” कल जाकर कुट्टी वापस ले आना”।

स्वामी फिल्म में रोचक ड्रामा प्रेवेश करता है मिनी के ससुराल पँहुचने के बाद और इसमें फिल्म के संवादों और सास (शशिकला) और बहु (शबाना आजमी) के मध्य घट रहे घटनाक्रमों का बहुत बड़ा योगदान है। हिन्दी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार मन्नू भंडारी ने फिल्म के संवाद लिखे हैं और एक नारी होने के नाते उन्होने ससुराल में सास-बहु, ननद-भाभी और जेठानी-देवरानी के रिश्तों के मध्य हो सकने वाली बातों और नोक-झोंक को परदे पर जीवंत बनाने में बहुत अच्छा योगदान दिया है। बासु चटर्जी, मन्नू भंडारी की रचनाओं पर भी फिल्म बना चुके हैं।

ससुराल में शुरुआत के किसी दिन शोभा, मिनी को अपने कमरे में ले जाती हैं। घनश्याम के सादगी भरे किसी भी तरह की सामान्य सुविधा से भी वंचित कमरे से उलट निखिल का कमरा हर तरह की आधुनिक सुविधा से सम्पन्न है और शोभा गर्व से कमरे में मौजूद विलासिता के साजो समान का प्रदर्शन मिनी के सामने करती हैं।

बातों बातों में शोभा मिनी को बताती है कि शादी के तीन साल बाद भी उनके कोई संतान नहीं है इसलिये माँ ने उसकी बाँह पर तावीज बँधवा रखा है। शोभा मिनी को सलाह देती है,” दीदी तुम भी तावीज बँधवा लो, जेठ जी तुम्हारे बस में रहेंगे”।

इस बार मिनी मौका न चूकते हुये उत्तर में पूछती हैं,” क्यों तुमने देवर जी को क्या तावीज के बलबूते अपने बस में कर रखा है”।

शोभा अनपढ़ है पर परिवार में अपनी मजबूत स्थिति का लाभ उठाती है। मिनी की सास वैसे तो मिनी को कहती हैं कि चूँकि मिनी बड़ी बहु है अतः अब उसे ही घर की जिम्मेदारी सम्भालनी पड़ेगी जिससे कि वे पूजा पाठ में कुछ समय बिता सकें। परंतु वास्तविकता में वे घर पर से अपने अधिकार में जरा सी भी ढ़ील देने को तैयार नहीं हैं।

शोभा ऊपर से नीचे तक गहनों से सजी रहती है पर सास मिनी से कहती हैं,” बहु, शोभा ने अपने सब गहने मुझे सँभाल कर रखने के लिये दे दिये हैं। तुम तो कुछ खास लायी नहीं हो, और घनश्याम को इन बातों में दिल्चस्पी है नहीं, फिर भी जो कुछ भी लायी हो, मुझे दे दो जिससे मैं उन्हे सुरक्षित रख दूँ”।

अब तक मिनी घर की आबोहवा पहचान चुकी हैं और आत्मविश्वास से भरे स्वर में कहती हैं,”आप तो मुझसे पूरे घर की जिम्मेदारियाँ सम्भवाना चाहती थीं, अपने घर से तो कुछ सीख कर आयी नहीं पर कम से कम थोड़े से गहने तो सम्भाल ही सकती हूँ”।

मिनी के ऐसे उत्तर और बाद में वहाँ से चले जाने से अवाक खड़ी सास को छेड़ते हुये शोभा कहती हैं,”माँ बूढा तोता राम-राम नहीं जपेगा”।

एक अन्य अवसर पर मिनी पाती है कि घनश्याम को सुबह जल्दी ही व्यापार के सिलसिले में बाहर जाना पड़ता है और उन्हे नाश्ते में कुछ भी नहीं दिया जाता और कहा जाता है कि उन्होने रात को नहीं बताया कि सुबह जल्दी जाना है, अब इतनी जल्दी क्या बन सकता है। सास की बातों से नाराज मिनी भी दिन भर खाना नहीं खाती और सास के बुलाने पर रसोई में जाती है तो शोभा छेड़ते हुये सास को बताती है कि चूँकि जेठ जी सुबह बिना खाये चले गये इसलिये दीदी भी नहीं खा रही।

सास हल्के गुस्से से कहती हैं कि यह नयी परम्परा क्यों डाली जा रही है?

भूखी मिनी भेदती आँखों से अपनी सास को देखती हुयी पूछती हैं,” क्यों आप क्या अपने पति से पहले ही खा लिया करती थीं”।

सास को समझ में आ जाता है कि मिनी के ऊपर उनका रंग नहीं चढ़ेगा और वे घनश्याम से मिनी की शिकायत करती हैं।

घनश्याम के कमरे में बिजली से चलने वाला पँखा तक नहीं है जबकि शोभा एक हजार रुपयों का हार निखिल से बनवाती हैं। घनश्याम, मिनी की सुविधा का ख्याल करते हुये अपनी माँ से कहते हैं,” माँ सोच रहा हूँ कमरे में एक पँखा लगवा लूँ”।

घनश्याम की माँ को पसंद तो नहीं आता और वे पूछती हैं,” क्यों क्या बहु ने ऐसा कहा”।

घनश्याम कहते हैं,” नहीं मुझे तो आदत है पर मिनी को तकलीफ होती होगी”।

घनश्याम सीधे हैं पर वे सब बातें समझते हैं। वे अगर किसी भी किस्म के पक्षपात का विरोध नहीं करते तो केवल अपने बड़प्पन और परिवार को एक रखने की भावना के कारण।

घनश्याम और मिनी की बात न के बराबर होती है पर वे मिनी को समझते खूब हैं। एक बार वे मिनी के लिये उसके मनपंसद रंग की साड़ी ले आते हैं। निखिल, शोभा और चारु द्वारा कितनी भी मंहगी चीज खरीदने पर कोई एतराज न करती माँ को घनश्याम का अपनी पत्नी को साड़ी जैसी साधारण भेंट दिया जाना पसंद नहीं आता और वे इसके विरोध में कह ही देती हैं।

फिल्म तो कम से कम ऐसी समझ देती ही है कि घनश्याम का सौतेली माँ के सामने जरुरत से ज्यादा समर्पण और उनकी हर गलत बात को नजर अंदाज करने से माहौल में कोई सुधार नहीं आता वरन स्थितियाँ बिगड़ती ही हैं। जब भी वे स्पष्टया गलत दिखायी देने वाली बात का विरोध कर देते हैं तो शुरुआती विक्षोभ के बाद स्थितियाँ सामान्य होने लगती हैं। इस साड़ी वाले मामले में भी घनश्याम अपनी माँ को जता देते हैं कि उन्होने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसे लेकर मुद्दा बनाया जाये।

ऐसा भी देखा जाता है कि जब बात मानवीय सिद्धांतों की आती है तो घनश्याम उसूलों पर अडिग खड़े नजर आते हैं। उनकी माँ को निखिल और चारु के मामले में धन का मुँह देखना पसंद नहीं है और चारु को नापंसद करने वाले एक लड़के के परिवार द्वारा ऐसी माँग रखने पर कि अगर घनश्याम लाखों का दहेज दे दे तो वे चारु से अपने लड़के की शादी कर सकते हैं, वे घनश्याम पर दबाव डालती हैं कि कैसे भी करके जितना दहेज वे माँगते हैं घनश्याम को दे देना चाहिये।

घनश्याम इस बात के खिलाफ हैं कि जो लोग चारु को पसंद नहीं करते उन लोगों के यहाँ कैसे वे अपनी छोटी बहन की शादी कर दें। माँ के लाख हल्ला मचाने और उन्हे कोसने के बावजूद वे निश्चित स्वर में कह देते हैं,” जब तक मैं इस घर में हूँ किसी लड़की का व्यापार नहीं होगा”।

सौतेली माँ, गुस्से और कुंठा में घनश्याम पर सौतेला बेटे होने का आरोप लगाती हैं जिसका विरोध खुद निखिल भी करता है।

दरअसल बचपन से ही इन सब बातों की जड़ सौतेली माँ की सोच और पक्षपातपूर्ण व्यवहार ही रहा होगा। निखिल और चारु को व्यक्तिगत रुप से घनश्याम से कोई मनमुटाव नहीं दिखायी देता और घनश्याम तो उन्हे अपने छोटे भाई बहन मानते ही हैं। घर में भेदभाव की परम्परा का राज चलाने वाली शख्श निखिल और चारु की माँ ही हैं। यदि वे अच्छे दिल की महिला होतीं तो घनश्याम की सादगी, समर्पण और कड़ी मेहनत करने की प्रवृति के कारण घर में बहुत अच्छा माहौल रहता।

निखिल और चारु को तो सहुलियतें मिल रही हैं और बचपन से मिल रही हैं तो उन्हे बहुत सी बातें दिखायी भी नहीं देंगीं। सेवक उनके लिये हर घड़ी तत्पर रहते हैं तो उन्हे कैसे पता चलेगा कि घनश्याम के पास ऐसी सुविधा नहीं है। निखिल तो नौकरी से आने के बाद अपने संगीत के शौक को पूरा करने में रम जाते हैं।

घनश्याम की सौतेली माँ को मिनी से समस्यायें होने लगती हैं परंतु जब नरेंद्र, निखिल का पुराना दोस्त होने के नाते वहाँ मेहमान बनकर आ जाता है और सबको पता चलता है कि उसका घर वह मिनी के मामा के घर के सामने ही है और मिनी उसे बहुत समय से जानती है तो मिनी की सास को रत्ती भर भी संकोच नहीं होता मिनी के ऊपर इस बात का दबाव डालने का कि मिनी को नरेंद्र से बात करनी चाहिये और उसे राजी करना चाहिये चारु से शादी करने के लिये।

फिल्म में ड्रामा अगली अवस्था में पँहुचता है जब चारु और उसकी माँ को पता चलता है कि मिनी और नरेंद्र, मिनी के विवाह से पूर्व एक दूसरे से प्रेम करते थे और इसलिये मिनी की रुचि नहीं थी चारु की बात नरेंद्र से चलाने में क्योंकि अभी भी उन दोनों में सम्बंध है।

ऐसे आरोपों से अपमानित मिनी भी अपनी सास को उत्तर में कड़े शब्द बोल देती है। पहले से कई मामलों में मिनी द्वारा कहे सत्य वचनों से आहत सास के लिये इस बार अति हो जाती है और वे कोप भवन में बैठी घनश्याम के आने का इंतजार करती हैं और उनके आते ही आक्रमण कर देती हैं मिनी के चरित्र के ऊपर, जिन्हे सुनकर मिनी फिर से अपनी सास को कठोर शब्दों में चेतावनी देती है।

संयुक्त्त परिवार में हर सदस्य द्वारा मर्यादापूर्ण व्यवहार न किये जाने की अवस्था में ही दिक्कतें आनी शुरु होती हैं। इस फिल्म में भी मिनी ने कुछ शुरु नहीं किया है, गलत व्यवहार सास द्वारा शुरु किया जाता है और रक्षा में मिनी अपने आत्म सम्मान की खातिर उत्तर देती है।

अब तक घनश्याम अपनी माँ की शिकायतों पर मिनी को कुछ नहीं कहते थे और अपने अच्छे व्यवहार से मामले को शांत करने की कोशिश करते थे पर आज उनके सामने ही उनकी माँ और पत्नी में कहा सुनी होती है और वे मिनी से माँ से माफी मांगने को कहते हैं। क्रोधित मिनी को यह और भी बड़ा अपमान लगता है।

घनश्याम मिनी से आग्रह करते हैं कि माँ से माफी माँगना उनका कर्त्तव्य है पर वे इस बात के लिये राजी नहीं होती। वे घर से जाने के लिये तैयार हैं परंतु अपने सास से माफी माँगने के लिये।
घनश्याम भी गुस्से में कह देते हैं कि यदि मिनी घर जाना चाहती है तो वे इंतजाम कर देंगे परंतु मिनी को माँ से माफी माँगकर ही यहाँ से जाना होगा।

सौतेली माँ को तो कोई फर्क पड़ना नहीं है कि घनश्याम विधुर के रुप में या तलाकशुदा के रुप में अकेले जीवन काटे सो वे आग में घी डालने आ जाती हैं घनश्याम को भड़काने और मिनी पर आरोप लगाने कि घर भेजने से पहले मिनी से सारे गहने ले लेने चाहियें।

मिनी के क्रोध की अग्नि के लिये यह आखिरी आहुती होती है और उसका गुस्सा भभक कर जल उठता है और वह सारे गहने आदि वहीं फेंककर नरेंद्र के साथ घर से निकल जाती है।

गुस्से में विवाह पूर्व के प्रेमी के संग ससुराल से चली आने वाली मिनी को रेलवे स्टेशन पर अपनी स्थितियों का अहसास होने लगता है कि अब वह एक शादीशुदा स्त्री है। घनश्याम के गुण और घर में दूसरों के सामने उनकी कमजोर स्थितियाँ उसके सामने आने लगती हैं।

क्या मिनी विवाह के बंधन को तोड़कर अपने प्रेमी के संग जा पायेगी और वह और नरेंद्र विवाह कर पायेंगे जैसा कि मिनी और नरेंद्रम घनश्याम से मिनी के विवाह से पूर्व चाहते थे?
या मिनी विवाह की परम्परा का निर्वाह करेगी और अपने पति के घर लौट जायेगी।

swami2-001कहते हैं कि शरत बाबू ने अपने उपन्यास में एक तरह का अंत लिखा और बासु दा ने दूसरे तरह का अंत अपनी फिल्म में दिखाया है।

अंत जो भी हो फिल्म विवाह से बनने वाले पति-पत्नी के रिश्ते को बड़े प्रभावी ढ़ंग से दिखाती है और दर्शकों, स्त्री या पुरुष, को इस रिश्ते के बारे में सोचने के लिये प्रेरित करती है। फिल्म ससुराल में उन स्थितियों को भी दिखाती है जिन्हे टालकर विवाह होकर आयी एक नयी महिला सदस्य को घर का एक अहम हिस्सा बनाया जा सकता है।

शबाना आजमी ने मिनी के चरित्र को बहुत अच्छे ढ़ंग से जीवंत कर दिया है। गिरीश कर्नाड का व्यक्तित्व घनश्याम के चरित्र के लिये बहुत उपयुक्त्त था और उनके अभिनय की शैली भी इस चरित्र के लिये बहुत प्रभावी सिद्ध हुयी और इस चरित्र में उनका अभिनय हिन्दी फिल्मों में उनके द्वारा किये गये कार्यों में श्रेष्ठ स्थान रखता है।

शशिकला तो माहिर थीं ही ऐसी भूमिका निभाने में, चाहे उन्हे बहु बना लो या सास। उनके अभिनय में वांछित गहराई है।

छोटी भूमिकाओं में उत्पल दत्त, धीरज कुमार, विक्रम, रितु कमल एवम प्रीती गांगुली ने अच्छा अभिनय प्रदर्शन कर दिखाया है।

राजेश रोशन का संगीत फिल्म का उल्लेखनीय भाग है।

हेमा मालिनी की माँ जया चक्रवर्ती ने इस फिल्म को निर्मित किया था और धर्मेंद्र और हेमा मालिनी एक युगल गीत को गाने के लिये फिल्म में नजर आते हैं। हैरानी की बात है कि सौदामिनी जैसा अच्छा चरित्र हेमा मालिनी ने अपने होम प्रोडक्शन में खुद क्यों नहीं निभाया?

सत्तर के दशक में बासु दा बहुत तेज रफ्तार से फिल्में बनाते थे और उनकी उस दौरान बनायी गयी फिल्मों की गुणवत्ता सराहनीय है। सत्तर के दशक की उनकी फिल्में बार बार देखी जाती हैं और तब भी न तो वे बासी लगती हैं और न ही ऊब पैदा करती हैं।

…[राकेश]

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