road1प्रेम को जानने के लिये प्रेम को अपने जीवन में महसूस करना जरुरी है और केवल पढ़ कर या सुनकर इसके बारे में ढ़ंग से नहीं जाना जा सकता। प्रेम को जीकर ही जाना जा सकता है।

ज्यादातर मानवीय भावनायें ऐसी ही हैं कि जब तक उनसे खुद साक्षात्कार न कर लिया जाये तब तक उनसे सही ढ़ंग से परिचय नहीं हो पाता।

जब तक खुद पर न बीते बहुत सारे दुख दर्द ऐसे हैं जो मानव को समझ में नहीं आते और उससे पहले सब चीजें सैधान्तिक ही रहती हैं। जन्मांध को समझा पाना बेहद मुश्किल है कि प्रकाश है क्या? बिना अपनी आँखों से देखे शायद वह प्रकाश को जान भी नहीं पाता बस दूसरों से उसके बारे में सुन कर एक अवधारणा जरुर बना लेता है।

स्वयं-अर्जित अनुभव की मानव के जीवन में बहुत बड़ी महत्ता है।

अपने ही जीवन को समझा नहीं जा सकता, अलबत्ता उसे जीकर देखा जरुर जा सकता है। अपने जीवन को कैसे जियें यह जरुर तय किया जा सकता है। किन्ही दूसरों के जीवन के बारे में हम उनकी आत्मकथाओं के द्वारा जान सकते हैं उनके जीवन में घटी घटनायें हम पर असर डाल सकती हैं पर तब भी यह सब दूर का अनुभव है। हमारा अपना जीवन दूसरों से अलग ही होता है। हमारे गुण, अवगुण, योग्यताऐं और सीमिततायें हमारे जीवन को एक विशिष्ट पथ पर चलाती हैं और शायद यही विशेषता हर मनुष्य के जीवन को रोचक बनाती है। लोग चाहते जरुर हैं कि उनके जीवन में भी ऐसा हो जाये जैसा कि फ़लां फ़लां व्यक्ति के जीवन में घटित हुआ पर ऐसा हो भी जाये तो भी सिर्फ घटना के घटने में कुछ समानता हो सकती है इसका असर अलग ही होगा।

अनुभव एकदम वैयक्तिक मामला है। ऐसे जैसे कि प्रेम तो बहुत सारे लोग करते है और करते रहेंगें पर हर नये प्रेमी प्रेम को नये रुप में ही जानते हैं क्योंकि उन्होने हजार किताबें पढ़ रखी होंगी प्रेम के बारे में पर प्रेम फलित पहली बार हो रहा है उनके जीवन में। यदि यह वही प्रेम है जिसके बारे में वे काफी लम्वे अरसे से पढ़ सुन रहे थे तो फिर वह बासी हो जायेगा और तब प्रेमियों को वह ऊर्जा, वह शक्ति नहीं मिलेगी जो उन्हे प्रेम हो जाने के बाद मिलती है। वे प्रेम को बिलकुल व्यक्तिगत रुप में जानने लगते हैं अब। उनके चेहरे पर एक अलग चमक आती है जो कि पहले हजारों किताबें पढ़ कर और लाखों किस्से कहानियाँ सुनकर भी नहीं आयी थी।

ऐसे ही जीवन जीना भी है। जीवन कोई लक्ष्य नहीं है बल्कि यह तो एक यात्रा है। अगर यह एक लक्ष्य होता तो बाप ही जीवन जी लेता और आगे की पीढ़ियाँ फिर उसी के बताये नक्शे कदम पर चलती रहतीं पर हम जानते हैं कि ऐसा नहीं होता और हर नये मनुष्य को जीवन शुरु से ही शुरु करना पड़ता है। ये बात और है कि एकत्रित हुया अनुभव उसे सहायता करता है दुनियावी मामलों में समझदारी विकसित करने के लिये। पर ऐसा तो नहीं हो सकता कि बाप आध्यात्मिक ऊँचाइयाँ प्राप्त कर ले और वे पुत्र को विरासत में मिल जायें। बाप का समाधि लगाना बेटे के काम नहीं आ सकता। समाधि का रस जानने के लिये तो उसे खुद ही अध्यात्म के सागर में गोते लगाने पड़ेंगे और अपने आप को तलाशना पड़ेगा।

बाप द्वारा अर्जित की गयी शैक्षिक उपाधियाँ बेटे के काम नहीं आयेंगीं अगर वह खुद को साक्षर और पढ़ा लिखा नहीं बनाता और शिक्षा को खुद ही अर्जित नहीं करता। हाँ दौलत जरुर ऐसी चीज है जो बाप बेटे के नाम कर सकता है।

स्व: अनुभव की लालसा की अन्दुरनी तपिश ही शायद नयी पीढ़ी को कई मर्तबा बाप दादा की बनायी-बसायी परम्पराओं से दूर जाने का अहंकार भी देती है और हर परम्परागत चीज उन्हे दकियानुसी लगती है और वे कुछ नया ही करना चाहते हैं। फिर कुछ अरसा बीत जाने के बाद जब वे ज़िन्दगी के काफी सारे रुप देख लेते हैं तब उन्हे वापिस अपनी परम्पराओं को अपनाने में कोई बड़ा विरोध नहीं दिखायी देता। अब वह जीवन की यात्रा के दौरान कुछ दूर खुद ही चल चुके हैं और कुछ पड़ावों पर ठहर चुके हैं उन्हे समझ चुके हैं। ज़िन्दगी अब भी समझ में न आने वाला रहस्य है परन्तु बहुत सी बातों से उन्हे कोई क्लेश नहीं रह जाता और वे बहुत सारे न सही पर कुछ मामलों में निर्बाध रुप से ऐसे चलते जाने को तैयार हो जाते हैं जैसे की जीवन उन्हे ले जा रहा है और जीवन के कुछ भागों से अन्तर्द्वन्द, एक अन्तर्युद्ध की तीव्रता यदि समाप्त नहीं होती तो कम जरुर हो जाती है।

जीवन में कोई एक माडल नहीं काम आता। हरेक का जीवन अलग है। एक के जीवन का अमृत दूसरे के लिये जहर बन सकता है।

जीवन में एतराज जताना कि ये क्यों हो रहा है या ऐसा क्यों हो रहा है प्रकृति के साथ एक द्वन्द लेकर आता है। ऐसा पूछते ही सैंकड़ों तरह के मानसिक तनाव जीवन पर धावा बोल देते हैं। यदि बारिश होने की पूरी आशंका होने के बावजूद घर से बाहर जाते समय छाता या रेनकोट नहीं लिया है और बारिश हो भी जाती है तो सारे रास्ते बारिश से मानसिक युद्ध लड़ना कि वह क्यों बरस रही है, मूर्खता ही कहलायेगी। अब तो भीग कर यात्रा पूरी करने या कहीं आश्रय लेकर रुकने में ही समझदारी है। कुछ लोग जिनके शरीर साथ देते हों वे बारिश का लुत्फ भी ले सकते हैं।

Road Movie का विष्णु (अभय देओल) एक ऐसा युवक है जिसे अपने पिता का केश तेल बनाने और बेचने का काम बिल्कुल पसंद नहीं है और वह इस सबसे दूर जने के लिये एक यात्रा पर निकल पड़ता है जहाँ उसे मंजिल का नाम तो पता है पर वहाँ पहुँचने के रास्ते से वह अन्जान है।

जीवन की यात्रा में और जीवन में यात्रा में बहुत सारे सहयात्री मिलते हैं जिनमे कुछ से मनुष्य का नाता जुड़ जाता है और मोह सम्बंधों में बाँध देता है। उनसे मिलन में सुख की प्राप्ति होती है और उनसे बिछुड़ने में जीवन में दुख का प्रवेश होता है।

कभी सम्बन्धों की उत्पत्ति तो क्षणिक मात्र स्व: हित की भावना से होती है पर कई मर्तबा वे जीवन में स्थायी रुप से बस जाते हैं।

विष्णु को रास्ते में ढ़ाबे पर एक लड़का मिलता है जो उसे अपने ट्र्क में साथ ले जाने के लिये आग्रह करता है। विष्णु की योजना में ऐसा कुछ शामिल नहीं है सो वह मना कर देता है पर जब लड़का ये कहता है कि उसे ढ़ाबे पर काम नहीं करना तो विष्णु उसे ट्र्क में लिफ्ट दे देता है। शायद कहीं न कहीं उसे खुद का अपने पिता के कारोबार से मोह भंग याद आ जाता है।

आगे चलकर उसे दो और सहयात्री मिलते हैं हैं जिनमे एक पुरुष और एक नारी शामिल हैं और कुछ जगह जगह कुछ अन्य लोग मिलते हैं।

इस यात्रा में क्या क्या होता है और ये घटनाक्रम कैसे इन चार यात्रियों और खास तौर पर विष्णु के जीवन और उसकी जीवन के प्रति समझ को प्रभावित करते है, यही सब इस फिल्म में दिखाया गया है।

road2

देव बेनेगल की इस प्रयोगात्मक फिल्म को देखने के दौरान यह आवश्यक है कि देखते समय इसे समझने की चेष्टा न की जाये क्योंकि ऐसा कोई भी प्रयास फिल्म देखने के आनन्द को न केवल कम कर देगा वरन हो सकता है कि आनन्द को एक सिरे से खत्म ही कर दे और दर्शक फिल्म के साथ एक द्वन्द में उलझ जाये। यह फिल्म हर हफ़्ते रिलीज होने वाली अन्य फिल्मों जैसी नहीं है। फिल्म एकदम से सीधी नहीं है और जो दिखाया जा रहा है उसका जीवन से एक एब्स्ट्रैक्ट सा रिश्ता है। फिल्म को स्वीकार करके उसके बहाव के साथ बह कर इसका आनन्द लिया जा सकता है। फिल्म का जीवन से वही रिश्ता है जो काव्य का होता है। जरुरी नहीं कि एक कविता सीधे सीधे पाठक पर असर करे वह उसे जीवन के किसी भी कोने में ले जाकर अपना जीवन से रिश्ता समझा सकती है। इस फिल्म को देखने में दिमाग का इस्तेमाल करना गलत है क्योंकि देखने के दौरान कथानक में समझने के लिये कुछ नहीं है बल्कि घटनाक्रम दर्शक को जीवन के बारे में कुछ अहसासों से रुबरु करा सकते हैं।

फिल्म में एक दृष्य है जहाँ सब लोग चार्ली चैप्लिन की फिल्म का आनन्द ले रहे हैं और क्या बच्चे और क्या बुढ़े सब उन्मुक्त रुप से ठहाके लगा रहे हैं। जैसे वे चैप्लिन की फिल्म में खोये हुये हैं और आनन्द ले रहे हैं वैसे ही इस फिल्म को देखा जा सकता है। इस प्रयोगात्मक फिल्म का भरपूर आनन्द लेने के लिये दर्शक को बेहतरीन सिनेमेटोग्राफी की सहायता से रचे गये दृष्यों में डूबना पड़ेगा और उसे कथानक के सतही स्तर से नीचे की सतह तक जाना पड़ेगा।

अभय देओल, तनिष्ठा चैटर्जी, सतीश कौशिक, यशपाल शर्मा, वीरेन्द्र सक्सेना, मोहम्मद फ़जल आदि सभी अभिनेताओं ने अच्छे अभिनय का उदाहरण पेश किया है।

Michel Amathieu की सिनेमेटोग्राफी कला फिल्म को बेहद दर्शनीय बनाती है|

…[राकेश]

Advertisements