जीवन का खेल बड़ी तेजी से चलता है,
जीवन के खिलौने एक के बाद एक पीछे गिरते जाते हैं,
और भुला दिए जाते हैं|
जीवन को जीने या जीवन को सुख सुविधा से भरपूर तरीके से जीने के साधन जुटाने या सफलता या ऐसी किसी आकांक्षा से भरे स्वप्रेरित स्वप्न का पीछा करते करते इंसान इतना व्यस्त हो जाता है कि मौत का विचार तो छोड़ ही दें, जीवन को सही तरीके से जीने का विचार भी उसके चित्त को छू नहीं पाता और वह मशीनी अंदाज़ में अंधी व्यस्तता से भरे दिन और रात व्यतीत किये चला जाता है और ये दिन रात हफ़्तों, महीनों और सालों और फिर दशकों में परिवर्तित हो जाते हैं और एक दिन सहसा उसे यह अहसास होता है कि धरा से चलने की बेला तो आ गयी! कुछ को तो इस अहसास को महसूस करने के क्षण की फुर्सत भी नहीं मिलती और क़ज़ा उन्हें ले चलती है|
भारत में कितनी खूबसूरत और उन्नत सभ्यता रही होगी जब मनीषियों ने आम जन के लिए जीवन में आश्रम व्यवस्था की स्थापना की, जिसके अनुसार अपनी आयु के पहले चौथाई भाग में मनुष्य को ब्रहमचारी का जीवन जीने का विधान था, उसके बाद अगले चौथाई हिस्से में गृहस्थाश्रम में आयु व्यतीत करने का प्रावधान था जिसके अंतर्गत व्यक्ति को पारिवारिक दायित्व निभाते हुए अपने अन्य सभी सांसारिक दायित्वों या अन्य यथोचित आकर्षणों को जीने का अवसर प्राप्त था| आयु का अगला हिस्सा वानप्रस्थाश्रम के अंतर्गत आता था जिसमें व्यक्ति अपनी सांसारिक पूंजी और अनुभव धीरे –धीरे अपनी अगली पीढ़ी को सौंप कर अपने को समाज और सांसारिक कर्मों से दूर करता जाता था जिससे आयु के अन्तिम भाग संन्यासाश्रम में वह समाज से दूर वन के एकांत में मोक्ष के लिए प्रयास कर सके| यह एक आदर्श स्थिति थी और सैधांतिक रूप से आज भी है और इसे पूर्णतः स्वस्थ व्यवस्था कहना सर्वथा उचित होगा| सामान्य सामाजिक मानव के लिए एक सुचारू जीवन जीने के लिए इससे बेहतर व्यवस्था नहीं हो सकती जहां उसकी भावनाओं पर उसका आयु के अनुरूप पूर्ण नियंत्रण रहे और जीवन में वह अपने कदम सधे रूप में शनैः शनैः अध्यात्मिक उन्नति की ओर बढ़ाए|
पर वर्तमान युग के भारत के नागरिकों की कहानी अलग है| लगभग हर व्यक्ति एक असंतुष्ट जीवन जीता है तो स्वाभाविक सी बात है कि जब मौत उसके भौतिक अस्तित्व पर दस्तक देती है तो उस वक्त भी ववाह एक असंतुष्ट मानव की भांति ही मौत के साथ जाने को विवश होता है| किसी के व्यक्तिगत सपने अधूरे रहते हैं तो किसी के पारिवारिक दायित्व| जीवन की आपाधापी में भागते दौड़ते क्षणिक अवकाश भी अधिसंख्यक के पास नहीं है कि वे ठहर कर देख सकें कि जीवन किधर जा रहा है और जिधर जा रहा है उधर कैसे जा रहा है और जीवन जीने का यह तरीका क्या उन्हें अंदुरनी संतोष और आनंद दे पा रहा है जहां वे द्वेष के चक्र से अछूते रह पाते हों|
जब तक शरीर साथ देता है तब तक लोगों को अपने जीवन की इस आपाधापी से कोई दिक्कत भी नहीं होती और वीडियो गेम्स के पात्रों की तरह वे एक जैसी बंधी बंधाई परिपाटी वाली व्यस्त दिनचर्या का पालन करे चले जाते हैं और बहुत से तो इसमें प्रसन्नता महसूस करने का दिखावा भी करते हैं कि उनकी व्यस्तता ही दर्शाती है कि वे कितना अच्छा जीवन जी रहे हैं|
पर जब शरीर में कुछ ऐसी व्याधि आ जाए कि इस व्यस्त दिनचर्या का पालन करने में कठिनाई होने लगे तो सहसा सब कुछ बदलने लग जाता है और अगर ऐसा कुछ हो जाए कि जहां पता चले कि अब जीवन कुछ ही समय का मेहमान है तो एक क्षण में ही सब कुछ बदल जाता है और उन्हें महसूस होने लगता है कि भांति भांति की व्यस्तता पाल लेने के कारण वास्तव में जीवन तो उन्होंने जिया ही नहीं| जीवन के कई साल तो उन्होंने बस ऐसे ही खर्च दिए जिससे उनके हिस्से मूल्यवान जैसा तो कुछ हाथ ही नहीं लगा, जो भी कमाया वह उनके किसी काम का नहीं| उनकी सारी दौलत भी उन्हें न शारीरिक और न मानसिक स्वास्थ्य लाकर दे सकती है|
अस्वस्थता ही यह भी व्यक्ति के सामने जाहिर करती है कि एक ही समय में एक जैसी सामाजिक परिस्थितियों में भी अलग अलग व्यक्ति अपने अपने स्वास्थ्य के आधार पर ही जीवन को, वस्तुओं को एवं अन्य व्यक्तियों को और उनके कर्मों को देखते और स्वीकारते हैं|
इस फ़िल्म का नायक कृष्णकांत झुनझुनवाला (दर्शन ज़रीवाला) भी एक ऐसा ही धनी उधोगपति है जिसे उम्र के पके पड़ाव पर जाकर पता चलता है कि अब उसके पास बामुश्किल दो महीने बचे हैं और वह रात के अँधेरे में अपने बेटों के नाम पत्र लिखकर चुपचाप घर छोड़ कर मुंबई से वाराणसी जाने वाली ट्रेन में बैठ जाता है|
कहते हैं काशी में प्राण त्यागने पर मोक्ष प्राप्त होता है और इसी मान्यता की वजह से लगभग मरणासन्न नायक काशी पहुँच जाता है| शरीर से ऐसा दुर्बल व्यक्ति और जिसे आने वाली मृत्यु की सूचना चंद ही दिनों पहले मिली हो, वह भावनात्मक रूप से घायल होगा और चाहेगा कि कोई उसके अंदुरनी घावों पर मरहम लगाए, कोई सहानुभूति दिखाए पर काशी में स्टेशन पर से ही उसके साथ अलग किस्म का अनुभव जन्म लेने लगता है| ३० मिनट की यह फ़िल्म काशी को एक चरित्र के रूप में बेहद मजबूती के साथ उभारती है और दर्शक में गन्दगी से लबरेज इस प्राचीन स्थल के प्रति आकर्षण जन्माती है| स्टेशन पर ही नायक को अपनी रिक्शा में लपक लेने वाला रफ़ीक दो टूक कहता है कि नायक के पास मुश्किल से महीने दो महीने का समय है और उनकी मृत्यु के उपरान्त वह सब व्यवस्था कर देगा| ऐसी स्पष्टवादिता से नायक के नये नये घायल हुए चित्त को और चोट पहुंचना स्वाभाविक है और यह स्पष्टवादिता दर्शक को भी चोट पहुँचाती है संभवतः उसे जगाने के लिए कि मृत्यु एक अटल सत्य है जिसके पंजे देर सवेर उसे अपनी गिरफ्त में लेने ही वाले हैं|
काशी में ही नायक को मृत्यु को नजदीक से देखने का अवसर मिलता है और भिन्न व्यक्ति मृत्यु को किस रूप में देखते हैं इसका भी साक्षात अनुभव नायक को होता रहता है| काशी में ही अबोध ब्राह्मण बच्चे के मुँह से नायक को आत्मा की नश्वरता के सैधांतिक प्रवचन की तोतारटंत सुनने को मिलती है| अपनी आने वाली मृत्यु को स्वीकार करके वह जो दिन काशी में व्यतीत करने लगता है उसका एक एक पल गहरे अनुभवों से भरपूर होता है और ऐसे सुधारवादी, ज्ञानवर्धक और अनुभवजन्य माहौल में दो महीने कब व्यतीत होकर एक साल में बदल जाते हैं उसे पता ही नहीं चलता| शरीर से भी वह बहुत हद तक तन्दुरस्त हो जाता है|
पर जैसा कि मानवीय स्वभाव होता है तिनके का सहारा पाकर वह जीवन में तो लौट आया पर ज़रा सा मौक़ा पाते ही उसका अपने परिवार और अपने उधोग के प्रति मोह जागने लगता है|
रफ़ीक उसे चेताता है कि वह मरने के लिए काशी आया था और जब काशी ने उसे जीवन जीने का तरीके सिखा दिया तो वह फिर से उसी दुनिया में लौट जाना चाहता है जिसने उसे मृत्यु के कगार पर भेज दिया था| मोहग्रस्त नायक को लगता है कि वह मुंबई जायेगा और परिवार की मुश्किलें निबटा कर वापिस काशी आ जायेगा| यह मोह ही उसका पतन है| वह रुग्ण शरीर के कारण अपना उधोग आदि अपने बेटों को सौंप कर शांति से मरने के लिए काशी आ गया था और अगर उसे अपने बेटों और अपने उधोगों की परेशानियों की सूचना पढ़ने को न मिलती तो वह आनंद से काशी में प्रवास करता रहता परन्तु अब शरीर के ठीक हो जाने पर उसके अंदर अहं का जागरण होता है और उसका मोहग्रस्त दिमाग सोचता है कि वह जल्दी ही सब कुछ ठीक कर देगा|
माया मरी न मन मरा मर मर गये शरीर
आशा तृष्णा न मरी कह गये दास कबीर
दर्शक भी नायक के भावों के साथ तैरता रहता है और अपनी स्थितियों अनुसार उसके मनोभावों और कर्म के पक्ष या विपक्ष में विचरता है| नायक जब स्वस्थ होकर उमंगों से भरकर काशी से मुंबई के लिए प्रस्थान करता है तो दर्शक भी आशा से भर जाता है कि अब उसे फ़िल्म में कुछ और रोचक घटनाएं देखने को मिलेंगी| परन्तु जीवन में जो एक बात निश्चित है वह है परिवर्तन और अचानक् आया परिवर्तन दर्शकों को स्तब्धता में बांधकर जीवन की क्षणभंगुरता पर विचारने के लिए छोड़ देता है|
फ़िल्म को एक सूत्र में बयान करना हो तो जनाब हैरत इलाहाबादी का शेर इस काम को बखूबी कर सकता है …
आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं
सामान सौ बरस का है पल की खबर नहीं
फ़िल्म में भले ही दर्शन ज़रीवाला का चरित्र मुख्य भूमिका में हो पर फ़िल्म के प्राण बसते हैं काशी के रिक्शा चालक रफ़ीक के किरदार में| अभिनेता विवेक सिंह ने इस रोचक भूमिका में कायदे से रंग भरे हैं|
फ़िल्म अभिनेत्री आरती छाबडिया दवारा निर्देशित यह प्रभावी लघु फ़िल्म जीवन और मौत के दर्शन को फ़िल्म रोचक अंदाज में प्रस्तुत करते हुए एक उल्लेखनीय फ़िल्म बन जाती है| सिनेमा के विभिन्न किस्म के अध्येताओं में से बहुसंख्यक भारत में अभी तक बनी लघु फिल्मों की श्रेणी में उच्च कोटि की चंद फिल्मों में इस फ़िल्म को सहर्ष शामिल कर लेंगें|
लेखन, निर्देशन, अभिनय, आर्ट डिजायन, सिनेमेटोग्राफी, और संगीत आदि फ़िल्म निर्माण के हरेक क्षेत्र में उम्दा प्रदर्शन की बदौलत यह एक बेहतरीन फ़िल्म बन जाती है|
…[राकेश]
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