कहानी सुनाना तो एक कला है ही और कहानी को इस तरीके से सुनाना कि सुनने वाले साँस रोक कर सुनने के लिए बाध्य हो जाएँ तो ऐसी कथा वाचन कला बेहतरीन कला का नमूना बन जाती है| कहानी की सामग्री और वाचन प्रक्रिया में उसका प्रस्तुतीकरण दो बातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं और अगर कथा वाचन किसी फ़िल्म का हिस्सा है तब तो न सिर्फ सुनाई जाने वाली कथा बल्कि इस कथा वाचन प्रस्तुतीकरण में शामिल किरदारों का अभिनय भी दर्शकों को प्रभावित करता है|

दशकों पहले हिन्दी फ़िल्म “प्यार किये जा” में महमूद और ओम प्रकाश की जोड़ी ने कथा वाचन के प्रस्तुतीकरण में इतना जबर्दस्त काम किया था कि इस फ़िल्म का वह भाग परदे पर कथावाचन के प्रस्तुत्तीकरण के लिए एक मानक के रूप में स्थापित हो चुका है| महमूद जहां अपनी कथित हॉरर फ़िल्म के दृश्यों का बखान बेहद जीवंत रूप में करते हैं वहीं ओम प्रकाश, महमूद के कथावाचन से उत्पन्न असर को अपने हावभावों से बेहद प्रभावशाली बना देते हैं| जहां महमूद भयावह दृश्य का बखान करके हास्य प्रस्तुत करते हैं वहीं ओम प्रकाश भयभीत होकर हास्य की डोज़ को कई गुना बढ़ा देते हैं|

 

किसी को अपने रास्ते से हटाने के लिए विवश करने के कई तरीके हो सकते हैं, जिनमें प्रत्यक्ष रूप से धमकी देकर उसे डराने का तरीका भी है और जिस रास्ते पर दुनिया के बहुत से अच्छे अभिनेता बहुत सी फिल्मों में चल कर अपनी बेहतरीन प्रतिभा का कायल सिनेमा के दर्शकों को बनाते रहे हैं| यह बात मायने नहीं रखती कि उन्होंने यह काम नायक के रूप में किया या खलनायक के रूप में किया| किसी को अप्रत्यक्ष रूप से अपने प्रभाव की बातें सुनाकर सांचे में ढालना भी योग्यता माँगता है|

साधारण दिखाई देने वाले इंसान भी अपने अंदर बहुत से भेद छिपाए हो सकते हैं, उनके भी बहुत से गुण ऐसे हो सकते हैं जो उनके साधारण बाहरी रूप रंग और व्यक्तित्व के कारण उजागर रूप में लोगों के सामने नहीं आ पाते पर अपने अनुकूल परिस्थितियों में उनके यही दबे छिपे गुण कमाल दिखा सकते हैं और कमाल दिखा भी जाते हैं|

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली के उपरोक्त्त कथन को बिरला ही कोई अपने जीवन के दृष्टिकोण में अमल में लाता होगा| किसी की मानवों पर अध्ययन करने में रूचि हो, कोई जासूस बनने के काम में आनंद पाता हो और इस नाते उसे हर किसी को गहराई से देखने की आदत पड़ जाए या कोई या कोई अपने लेखन या शोध हेतु इंसानों को गौर से देखने लग जाता अहो तो बात अलग है वरना साधारण मनुष्य दूसरे मनुष्यों को बस फौरी तौर पर ही देख कर रह जाता है, यह अलग बात है कि उसी ऊपरी औसत देखने की प्रक्रिया के बावजूद वह अपने दृढ़ विचार दूसरे व्यक्तियों के बारे में बना लेता है|

चटनी” एक ऐसे महिला किरदार को केन्द्र में रखती है जिस पर उसके सामाजिक दायरे में रहने वाले लोग ज्यादा तवज्जो नहीं देते, और जिसे उसके पति की आर्थिक और सामाजिक स्थिति के कारण जाना और पहचाना जाता है| उसका बाहरी रंग-रूप भी साधारण है| हर लिहाज से वह ऐसी दिखाई देती है जिस पर कोई आसानी से ध्यान नहीं देगा|

ऐसी महिला यदि किसी पार्टी में अपने पति और अपने से काफी कम उम्र की युवती को आपस में फ्लर्ट करते देखे जिससे उसे पूरा आभास हो जाए कि उसके पति और उस युवती के मध्य विवाहेत्तर संबंध पनप चुका है तो वह क्या करे? या तो वह वहीं पार्टी में चिल्लाहट मचा कर अपने पति की प्रेमिका की छीछालेदर कर दे और अपने पति की भी बेइज्जती करके उसे रास्ते पर ले आए या वह चुप रह जाए, जैसा कि उस जैसी साधारण व्यक्तित्व वाली पति पर हर तरह से निर्भर महिला से हरेक अपेक्षा भी रखेगा या उसके पास ऐसी कोई वैकल्पिक योजना हो जिस पर अमल करके वह न केवल अपने पति को रास्ते पर ले आए वरन उसकी प्रेमिका को भी ऐसा सबक सिखा दे कि वह स्वयं ही उसके पति से दूरी बना ले|

चटनी” की नायिका – वनिता, इसी वैकल्पिक मार्ग को अपनाती है और यह वैकल्पिक मार्ग एक रोचक यात्रा पर दर्शक को ले जाता है| नायिका बड़े प्यार से अपने पति- विरी, की छवि उसकी प्रेमिका- रसिका, के सामने खंडित करती जाती है और प्यार रूपी संबंध को खतरनाक बताते हुए शीशे में रसिका को ऐसे उतारती है कि वह बामुश्किल चैन की साँस ले पाती है| और अपना मकसद पूरा करने के लिए वनिता केवल अपने जीवन की कुछ घटनाओं का जिक्र इस प्रभावी तरीके से रसिका के समक्ष करती है कि रसिका भय के समंदर में डूबने लगती है|  वनिता अपने किस्से सुनाकर न केवल रसिका को सांचे में ढालती है बल्कि बल्कि पुरुष अहंकार में डूबे , अपने सामने अक्सर रंगबाजी दिखाने वाले अपने नौकर-  मुन्ना की सिट्टी पिट्टी गुम कर देती है|

वनिता  इतनी तीव्र बुद्धि से काम लेती है कि रसिका को शुरुआत में ही बैकफुट में पहुँचते हुए सबसे पहले उसके इयर रिंग्स छूकर पूछती है,”तुम्हारे ईयर रिंग्स तो बहुत सुंदर हैं कहाँ से लिए?”

वनिता  ने पार्टी में अपने पति को रसिका के कान के झुमके छूते हुए देखा था| उसे पता है कि उसके पति ने इसे ये झुमके तोहफे में दिए हैं और रसिका अवश्य ही झूठ बोलेगी| पर उसके झूठ बोलने की अपेक्षा रखते हुए भी वह बातचीत के शुरू में यह सवाल पूछ कर रसिका के आत्मविश्वास को शुरू में ही हिला देती है और उसके बाद अपनी बातों के चक्रव्यूह में उसे फंसाती चली जाती है| वह इतना महीन पीस कर बातों की चटनी प्रस्तुत करती है कि उसके सम्मुख बैठी  रसिका समझ ही नहीं पाती कि जो चटनी उसने खाई है उसे उगले या निगले|

चटनी” फ़िल्म सच और कल्पना या मिथ्या के बीच के अन्तर को इतना धूमिल रखती है कि दर्शक को अंत तक पता नहीं चलता कि नायिका ने क्या अपने जीवन के सच्चे किस्से अपने पति की प्रेमिका और अपने नौकर को सुनाये या कि वे उसके गढे हुए किस्से थे? या कितना सच था और कितना गढा गया था? फ़िल्म यह बात स्पष्ट न करते हुए एक रहस्य का आवरण बुन देती है|

सच और कल्पना के अखाड़े में चहल कदमी करती फ़िल्म में अगर यह सुनियोजित नहीं था तो एक गलती फ़िल्म से हो जाती है जब  किस्से सुनाते सुनाते वनिता अपने देवर की बात बताती है और नहाकर निकलती वनिता वासना भरी दृष्टि से स्नान करने जाते अपने देवर को देखती है| अपने जीवन का किस्सा सुनाते हुए वह अपनी वासनात्मक जरुरत का जिक्र तो अपने पति की प्रेमिका के सामने नहीं ही करेगी| और इससे आगे बढ़कर इस बात को और स्पष्ट तरीके से फ़िल्म दिखाती है जब वह युवती को बताती है कि उसका देवर उनके नौकर की अनुपस्थिति में उसके कमरे में उसकी पत्नी के साथ इश्क फरमाने घुस जाता है और उन्हें कल्पित करके वह अपने कक्ष में बिस्तर पर कामपीड़ित समय गुजारती है| ऐसा वह सोच तो सकती है पर उस युवती को तो बताएगी नहीं| इन दो पड़ावों पर आकर फ़िल्म यह संकेत तो देती है कि नायिका अपने जीवन की घटनाओं से सम्बंधित जो किस्से युवती को सुना रही है उनमें सच्चाई है या हो सकती है परन्तु ये सच्चाइयां युवती को सुनाते समय किस्सों में बयान तो नहीं होंगीं|

बहरहाल, फ़िल्म एक बेहतरीन थ्रिलर का आनंद देती है| और अगर टिस्का चोपड़ा का नाम न पढ़ा जाए तो उनके दवारा निभाई गयी केन्द्रीय भूमिका के गजब के मेकअप के कारण उन्हें पहचाना जाना बहुत कम दर्शकों के बस की बात होगी| वे फ़िल्म की प्रोड्यूसर भी हैं| उन्होंने बेहतरीन अभिनय का नमूना प्रस्तुत किया है|

आदिल हुसैन अपनी संक्षिप्त से भूमिका में रंग जमा जाते हैं| रसिका दुग्गल, देवश रंजन, सुमीत गुलाटी  और आकाश भारद्वाज सभी अभिनेताओं ने अपनी भूमिका में प्रभावशाली अभिनय करके फ़िल्म को उच्च स्तरीय बनाया है|

ज्योति कपूर दास दवारा निर्देशित यह फ़िल्म “चटनी” पुरजोर तरीके से यह घोषणा करती है कि सिने प्रेमियों के लिए जबर्दस्त फ़िल्म देखने के लिए आजकल लघु फिल्मों के संसार में विचरण करना लाभ का सौदा है|

…[राकेश]

 

 

 

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