पंडित नेहरु की आत्मकथा (मेरी कहानी/ MY Story) में छपे वर्णन से स्पष्ट है कि हालांकि पंडित नेहरु ने अपनी आत्मकथा 1934-35 में लिखी और 1936 में छपवाई, जब तक कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद दोनों की प्रसिद्धि आकाश छू रही थी, और सारा देश कई साल से उनकी शहादत से विचलित था लेकिन पंडित नेहरु ने चंद्रशेखर आज़ाद के बारे में याद करके भी ऐसे लिखा है जैसे वे इलाहाबाद के किसी उठाईगीरे के बारे में लिख रहे हों, ऊँचे सिंहासन पर बैठकर, जहाँ से हर इंसान उन्हें छोटा ही नज़र आता हो|

पंडित नेहरु इलाहाबद में सार्वजनिक जीवन में भी थे, नगर निगम के चुनावों में सक्रिय रहते थे| 1931-1936 के बीच के पांच सालों में उन्हें इस सच्चाई का पता नहीं चला कि चंद्रशेखर आज़ाद ने पुलिस से मुठभेड़ में गोलियां समाप्त होने के बाद अंतिम गोली स्वंय अपनी कनपटी पर चला दी थी, और उसी से उनकी मृत्यु हुयी| नेहरु जी को विवरण पता नहीं लगे कि चंद्रशेखर आजाद की मृत्यु किस तरह से हुयी?

रास्ते अलग होने का यह अर्थ तो है नहीं कि पंडित नेहरु भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद से ज्यादा बड़े देशभक्त थे, भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद दोनों ही जीवन का 25वां साल नहीं देख पाए, भगत सिंह तो 24वां साल भी नहीं देख पाए, और 24-25 की उम्र में पंडित नेहरु को अंग्रेजों से लड़ने की कितनी अक्ल रही होगी यह जानना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है| पंडित नेहरु ने स्वयं ही अपनी आत्मकथा में अपने बचपन और युवावस्था के बारे में लिखा है कि 1912 (आयु – 23 साल) में लन्दन से बैरिस्टरी पास कर भारत लौटने के बाद नेहरु एक निरुद्देश्य और विलैस्ता से बी हरा जेवण जी रहे थे| उस उम्र तक भगत सिंह ने अपना सारा साहित्य रच दिया था और तमाम क्रांतिकारी गतिविधियां करने के बाद जेल में भी अंगरेजी हुकूमत से सही की स्थापना के संघर्ष में रत थे| नेहरु खानदान का परिचय गांधी जी से न होता तो मोतीलाल नेहरु और जवाहरलाल नेहरु अंग्रेजों के मुकदमें लड़ते रहने वाले बेहद अमीर वकील ही होते|

जिस तरह से पंडित नेहरु ने अपनीआत्मकथा में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और अन्य क्रांतिकारियों के बारे में लापरवाह अंदाज़ में लिखा है, उसे लिखते हुए अगर वे एक बार उन सबकी आयु के संबंध में यह भी सोच लेते कि वे (पंडित नेहरु) उन शहीदों की आयु में क्या कर रहे थे तो उनकी कलम काँप जाती और शायद उनमें थोड़ी संवेदना भर जाती|


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