फ़िल्म – चेहरे, का विषय रोचक है और चार मुख्य चरित्रों में वरिष्ठ अभिनेताओं को देखना सुखद है और ज्यादा से ज्यादा ऐसे विषयों पर फ़िल्में बनें तो फिल्मों के स्तर में विविधता और ज्यादा गुणवत्ता आने की संभावना बढ़ जाती है|

स्विस लेखक Friedrich Dürrenmatt के लिखे नाटक Die Panne  (A Dangerous Game) से प्रेरित होकर  विजय तेंदुलकर ने मराठी नाटक  Shantata! Court Chalu Aahe (खामोश! अदालत ज़ारी है) लिखा और रंजीत कपूर ने मूल जर्मन नाटक से प्रेरित हो अपना नाटक Wrong Turn लिखा और निर्देशित किया| मूल नाटक की कथावस्तु देखते हुए विजय तेंदुलकर और रंजीत कपूर के नाटकों के शीर्षक सर्वथा उचित प्रतीत होते हैं| रूमी ज़ाफरी की फ़िल्म रंजीत कपूर के नाटक पर आधारित है तो उसी नाम से इसे बनाया भी जा सकता था| फ़िल्म के शुरू में अमिताभ बच्चन द्वारा गाई गई कविता, जिसमें  बार-बार चेहरे शब्द का उपयोग किया गया है, भी फ़िल्म के शीर्षक को तर्कसंगत नहीं बना पाती|

अमिताभ बच्चन के फ़िल्म में प्रवेश करने तक फ़िल्म संतुलित रहती है और अब तक प्रकट हुए सभी चरित्रों को न्यायसंगत उपस्थिति प्राप्त होती है लेकिन अमिताभ बच्चन के प्रवेश के बाद से बाकी सभी चरित्र सहायक भूमिकाओं में आ जाते हैं और फ़िल्म का संतुलन बिगड़ जाता है| ऐसे प्लॉट् में कोई एक नायक नहीं हो सकता और सभी के संतुलित योगदान से ही गुणवत्ता बनी रह सकती है लेकिन निर्देशक द्वारा अमिताभ बच्चन के स्टारडम को सबसे ज्यादा महत्त्व देने के कारण चेहरे की गुणवत्ता प्रभावित होती है| अमिताभ ने फ़िल्म के अपने चरित्र के स्कोप से बाहर निकल कर अभिनय किया है और इस कारण, उन्होंने अच्छा अभिनय किया या औसत किया, इस बात के मायने नहीं रह जाते| उन्होंने एक सितारे की तरह एकल प्रदर्शन वाला अभिनय किया है| निर्देशक द्वारा उन्हें आवश्यकता से अधिक स्थान देने की वजह से फ़िल्म में असंतुलन जन्मा है| उनके द्वारा दिया लंबा भाषण, जिसमें निर्भया काण्ड को भी उन्होंने घसीट लिया, फ़िल्म में पैबंद जैसा लगता है| उनका प्रदर्शन ऐसा ही है मानों क्रिकेट में एक बल्लेबाज टीम के हितों को दरकिनार कर खुद के लिए खेलने लग जाए और हर गेंद को खेलने की कोशिश करे जिससे विपरीत छोर पर खड़े बल्लेबाज को मौक़ा ही न मिले गेंद खेलने का|

अमिताभ बच्चन के चरित्र को पब्लिक प्रोसीक्यूटर का कार्य दिया गया है और उन्हें अत्यंत तीव्र बुद्धि का मालिक बार बार बताया गया है, जिनकी निगाह बेहद पैनी है और वे बड़े गहरे में देख और घटनाओं को विश्लेषित कर सकते हैं| वे बिना किसी पृष्ठभूमि के और बिना किसी संदेह के इमरान हाशमी के चरित्र को मुक़दमे में खींच लेते हैं|उनकी पारखी और गहरी दृष्टि की दाद उनके बाकी साथी देते हैं जिनमें उनके मित्र अवकाश प्राप्त जज भी सम्मिलित हैं|

लेकिन दर्शकों को उनकी पारखी नज़र में खोट नज़र आ जाता है जब इमरान हाशमी का चरित्र उन सबको कथा सुनाता है कि कैसे उसके बॉस की पत्नी ने उसे फॉर्म हाऊस पर बुलाया था और वहां उसने उसे एक कमरे में अकेले बंधा हुआ पाया| उसने आगे सुनाया कि बाद में गोल्फ के मैदान में वह अपने बॉस से मिलने गया और अपना और अपने बॉस की पत्नी का वीडियो उसे दिखाया| अमिताभ बच्चन के पैनी दृष्टि वाले चरित्र ने इमरान हाशमी के चरित्र से प्रश्न क्यों नहीं पूछा कि उसके बॉस ने अपनी पत्नी से पूछा क्यों नहीं कि फॉर्म हाऊस से उसे किसने आज़ाद किया? वह उसे लेकर गोल्फ के मैदान में क्यों आयेगा अगर वह उसकी जान लेना चाहता था और उसे निश्चित पता है कि किसी ने उसे आज़ाद किया था?  यह एक स्वाभाविक सा प्रश्न है जो एक वकील के दिमाग में आना ही चाहिए|

फ़िल्म का प्लॉट् ऐसा है कि एक बेहद रोचक फ़िल्म बनाई जा सकती थी अगर कलाकारों का चयन सही हो और सभी को एक तर्कसंगत और न्यायसंगत समय प्रदान किया जाए| या तो ऐसे कथानक पर फ़िल्म कथित सितारों को लेकर बने क्योंकि तब निर्देशक के सम्मुख सभी को उचित समय देने की मजबूरी रहेगी| इसी फ़िल्म को रूमी ज़ाफरी अमिताभ बच्चन के समकालीन सितारों, शत्रुघ्न सिन्हा, धर्मेन्द्र और जीतेंद्र के साथ बना लेते तो संतुलन बना रहता या फिर अमिताभ के स्थान पर नसीरुद्दीन शाह या विक्टर बैनर्जी को लेकर अभिनेताओं में संतुलन बना कर रखते और इमरान हाशमी के स्थान पर भी अभिनय के जाने पहचाने वाले अभिनेता को लेते और रिया चक्रवर्ती के स्थान पर किसी ऐसी अभिनेत्री को लेते जिसे अभिनय करना आता हो| रिया चक्रवर्ती मौन दृश्यों में तो ठीक हैं पर संवाद बोलना, हंसना, रोना आदि क्रियाओं को प्रदर्शित करते तो वे एकदम निम्न कोटि की गुणवत्ता वाली अभिनेत्री प्रतीत होती हैं|

धृतमान चटर्जी, रघुबीर यादव और अन्नू कपूर तीनों ही बहुत ज्यादा प्रतिभा वाले अभिनेता हैं, पर इनका सही उपयोग फ़िल्म में नहीं हो पाया क्योंकि सारा स्पेस अमिताभ बच्चन को दे दिया गया| इतने कम स्पेस मिलने के बावजूद भी रघुबीर यादव की खामोशी बहुत कुछ बयान कर देती है| एक पूर्व जल्लाद के रूप में अपराधी को मौत की सज़ा सुनाये जाने के लिए तत्परता को वे जिस बारीकी से प्रदर्शित करते हैं वह काबिलेतारीफ है| धृतमान चटर्जी भी जिस तरह से उच्च स्तर का अभिनय फ़िल्म के शुरू में कर रहे थे उससे रोचकता बनी हुयी थी लेकिन अमिताभ के प्रवेश के बाद उनके जैसे पर ही क़तर दिए गए|

अन्नू कपूर भी जिस चपल चरित्र को निभा रहे थे जब वे सड़क पर इमरान हाशमी के चरित्र से मिलते हैं और उसे लगभग विवश कर देते हैं अपने साथ आने के बाद वह चपलता घर में अमिताभ के प्रवेश करने के बाद हास्य रचने के प्रयास में ही बदल जाती है| जिस तरीके से अमिताभ घर में प्रवेश करने के बाद अन्नू कपूर से मिलते हैं हाथ मिलाकर उससे प्रतीत नहीं होता कि वे फ़िल्म में गहन मित्र हैं| एक ठंडापन उस दृश्य में है| अमिताभ ने लगभग एकल अभिनय किया है जबकि रघुबीर यादव, धृतमान चटर्जी और अन्नू कपूर में आपस में गहरी दोस्ती की एक बॉन्डिंग स्पष्ट नज़र आती है| अमिताभ यहाँ चूक गए| इस चरित्र को दिलीप कुमार निभाते तो वे मित्रता की इस बॉन्डिंग को परदे पर गहराई से उतार देते|

इमरान हाशमी के पक्ष में यह जाता है कि वरिष्ठ अभिनेताओं के साथ वाले दृश्यों में वे अच्छा काम कर गए लेकिन उनके दिल्ली वाले दृश्य प्रभावशाली नहीं थे|

अमिताभ के नाटकीय अभिनय, रिया चक्रवर्ती के बोगस अभिनय और बहुत ज्यादा ऐश्वर्यपूर्ण सेट ने फ़िल्म की गुणवत्ता को प्रभावित किया है, जिस घर को चुना गया है वह साफ़ दर्शाता है कि फ़िल्म जैसे विदेशी रूपरंग की है|

फ़िल्म की एक बड़ी कमी है कि फ़िल्म के अंत में चारों वरिष्ठ चरित्र अपराधी ज्यादा प्रतीत होते हैं बजाय क़ानून के रखवाले जागरूक नागरिकों के| उनके तौर तरीके कानूनी नहीं हैं| शुरुआत में ही पेड़ गिराकर रास्ता रोकना, भटके यात्री को घर में ले जाना, आदि सारे कृत्य क़ानून के दायरे से बाहर की बातें हैं| उनके गैर-कानूनी कृत्यों का न्याय कौन करेगा?

इन सब कमियों से मुक्ति पाई जाती तो इस प्लॉट पर एक बेहद अच्छी और बरसों तक याद रखी जाने वाली फ़िल्म बन सकती थी|