कई साल पहले हम कुछ साथी एक पब्लिक लाइब्रेरी में जाकर किताबें देखने लगे तो देखा वहां उपस्थित हिंदी साहित्य में गद्य की अधिकतर किताबें पढ़ ली हैं और काव्य व निबंधों की किताबें ही बची हैं| अलमारी को एक बार और देखने पर एक ऐसी किताब सामने आयी जो पढ़ी नहीं थी| इस उपन्यास का शीर्षक था – पत्नि और प्रेमिका!

शीर्षक से ऐसा लग रहा था मानो गुलशन नंदा और उनकी तरह के जो हिंदी लेखक रहे हैं वैसे किसी लेखक की किताब होगी| अन्दर के पृष्ठ पलटे तो एक पृष्ठ पर निगाह ठहर गयी जहाँ एक पुरुष द्वारा स्त्री को लिखे पत्र की सामग्री छपी हुयी थी| उस पत्र की भाषा इतनी साहित्यिक थी और विम्ब इतने आकर्षक कि उसके बाद के दो और पृष्ठ पढ़कर किताब इश्यू करवा ली|

हम लोग बाहर निकल ही रहे थे कि एक जाने माने पर्यावरणविद लाइब्रेरी प्रवेश करते हुए दरवाजे पर ही मिल गए| कई बार वे शहर में दिखाई दे जाते थे| श्वेत वस्त्रधारी, श्वेत लम्बी दाढ़ी और सिर पर श्वेत कपडा बांधे हुए वे श्वेताम्बर दिखाई देते थे|

उन्होंने पूछा,” और बच्चों, क्या लेकर जा रहे हो”|

हाथ में किताब देखकर उन्होंने उसे अपने हाथ में ले लिया और शीर्षक पढ़कर बोले,”अरे ऐसी किताब पढोगे? प्रेमचंद की किताब ले जाओ, दिनकर की किताब ले जाओ|”

कई अन्य बड़े साहित्यकारों के नाम उन्होंने खड़े खड़े गिना दिए|

उपन्यास का शीर्षक वाकई भ्रमित करने वाला था और जो भी कवर पेज देखता उसे यह एक लुगदी साहित्य का नमूना ही लगता|

उन्हें उपन्यास खोलकर पत्र वाला पृष्ठ दिखा दिया| उन्होंने पढ़ा तो वे भी प्रभावित हुए, कहने लगे,”भाषा से तो रोचक लग रही है किताब| पढ़कर बताना कैसी है| “

किताब वापिस देकर वे अन्दर चले गए और हम लोग लाइब्रेरी से लौट आये|

लगभग 500 पृष्ठों का हार्ड बाउंड मोटा सा उपन्यास था वह और दुपहर में अवकाश के समय हम लोग उसे पेड़ की छाया में बैठ कर पढ़ते| और कई बैठकों में हमने उसे 7 दिन में पढ़ लिया|

उपन्यास लाइब्रेरी को लौटा दिया| उपन्यास और उसकी सामग्री दिमाग में बैठ गयी| चूंकि उपन्यास लाइब्रेरी में मिल गया था सो यह आभास नहीं हुआ कि यह उपन्यास शायद कहीं और न भी मिले|

कुछ साल बाद किताब की याद आने पर नेट पर उसके बारे में खोजा तो परिणाम शून्य आया| बहुत गहन खोज से पता लगा कि शायद वह चेन्नई की एक लाइब्रेरी में उपलब्ध है| उस लाइब्रेरी को ईमेल लिखा तो सालों में भी कोई जवाब नहीं आया|

बहुत ही स्पेसिफिक खोजने पर मालूम हुआ कि उस उपन्यास के लेखक ने तीन और उपन्यास लिखे थे| (संख्या ज्यादा भी हो सकती है)

लेखक थे महेंद्र रज्जन, शायद वे इलाहाबाद के रहने वाले थे, क्योंकि उनका पहला उपन्यास – पत्नि और प्रेमिका, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था| शायद कृति केंद्र प्रकाशन से वह उपन्यास छपा था| यह 1966-1976 के बीच कभी प्रकाशित हुआ होगा|

अब खोजने पर नेट न तो लेखक का नाम, न उनकी किताबें , कुछ भी सामने नहीं ला पता| क्योंकि पुराने दस्तावेज वेबसाइट्स बंद होने के बाद सर्च इंजिन्स की पहुँच से बाहर हो जाते हैं|

लेखक महेंद्र रज्जन के नाम से सर्च करने पर कुछ साल पहले जो किताबें सामने आती थीं, उनके विवरण नीचे दिए हैं|

पत्नि और प्रेमिका (कृति केंद्र प्रकाशन)

तुम मेरे कौन हो (सीमा प्रकाशन)

एक बस्ती एक दुनिया (सीमा प्रकाशन)

ताकि सनद रहे (शारदा प्रकाशन)

अब गूगल पर सर्च करने से उनका नाम या उनकी किताबों के नाम, कुछ भी सामने नहीं आता|

शायद महेंद्र रज्जन प्रसिद्धि नहीं पा पाए और हिंदी साहित्य में आलोचना की राह पर चलने वालों ने उन पर और उनकी किसी किताब पर कोई ध्यान ही नहीं दिया|

कोई रचनाकार अगर चार उपन्यास (और भी किताबें उन्होंने लिखी होंगी) लिख चुका था और उसका और उसकी किताबों का कोई चिह्न इंटरनेट पर न मिले तो यह विचित्र बात है|

ब्लॉग आदि की महत्ता इसलिए बढ़ जाती है कि कोई न कोई कहीं न कहीं किसी किताब की चर्चा कर ही देता है और नेट पर एक फुटप्रिंट छोड़ देता है|

आशा तो यही है कि शायद किसी अन्य ने भी महेंद्र रज्जन की किताबें पढी हों और उसे याद भी हों|

…[राकेश]


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