“I do not want my house to be walled in on all sides and my windows to be stuffed. I want the cultures of all the lands to be blown about my house as freely as possible. But I refuse to be blown off my feet by any.” Mahatma Gandhi


सेठ सोनाचंद धरमचंद बड़े फख्र से अपनी पोशाक का जिक्र करता है और कहता है सर से पाँव तक वह खादी के वस्त्र धारण किये हुए है और वह पूर्णतः स्वदेशी की बात छेडता है| दूसरी और राज जनता को अपनी लगभग फटेहाल वेशभूषा का परिचय गीत के मुखड़े के रूप में ही देता है|

मेरा जूता है जापानी,
ये पतलून इंगलिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी,
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

निकल पड़े हैं खुली सड़क पर
अपना सीना ताने
मंज़िल कहाँ,
कहाँ रुकना है
ऊपर वाला जाने
बढ़ते जायें हम सैलानी,
जैसे एक दरिया तूफ़ानी
सर पे लाल टोपी रूसी,
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

ऊपर नीचे नीचे ऊपर
लहर चले जीवन की
नादाँ हैं जो बैठ किनारे
पूछें राह वतन की
चलना जीवन की कहानी,
रुकना मौत की निशानी
सर पे लाल टोपी रूसी,
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

होंगे राजे राजकुँवर
हम बिगड़े दिल शहज़ादे
हम सिंहासन पर जा बैठे
जब जब करें इरादे
सूरत है जानी पहचानी,
दुनिया वालों को हैरानी
सर पे लाल टोपी रूसी,
फिर भी दिल है हिंदुस्तानी

© …[राकेश]

 

 


Discover more from Cine Manthan

Subscribe to get the latest posts sent to your email.