Khela1सपनों के पीछे दीवानगी की हद तक भागना जरुरी नहीं कि अच्छे कर्म ही कराये और कई बार “पैशन” ऐसे काम करने के लिये विवश कर देता है जो अगर अनैतिक न भी लगें पर कम से कम किसी देश के कानून को तो तोड़ते ही हैं। लेखक और कलाकार हमेशा कानून के दायरे में रह कर ही काम नहीं करते वरन अपनी कलात्मक और रचनात्मक संतुष्टि के लिये वे ऐसे काम भी कर जाते हैं जिन्हे वे खुद अपने द्वारा गढ़े गये चरित्रों में गलत चरित्र को ही देंगे क्योंकि वे जानते हैं कि यह काम गलत है। पर वे ऐसा करते हैं। कई बार ऐसे काम भी हो जाते हैं जिन्हे सामाजिक विञान के क्षेत्र में शोध कार्य ही कहा जा सकता है।

खेला की कहानी के विस्तार और सीमाओं को देखें तो पायेंगे कि एक रोचक ताना बाना इस परिवेश में बुना जा सकता था।

एक निर्देशक जो बुद्ध साहित्य से प्रेरित एक बाल चरित्र नोलक पर फिल्म बनाना चाहता है। उसे कोई भी बाल कलाकार पसंद नहीं आता और जो बालक उसे पसंद आता है उसके माता पिता उसे फिल्म में काम करने देने के लिये अनुमति देने को तैयार नहीं हैं। बालक चाहता है कि वह फिल्म में काम करे परन्तु वह अपने माता पिता के सामने विवश है। नाबालिग बालक वयस्क निर्देशक को मना लेता है कि बिना अपने माता पिता को बताये वह उसके साथ शूटिंग के लिये चल सकता है और वह एक चिट्ठी अपने घर पर छोड़ देगा जिससे कि उसके माता पिता को पता चल जाये कि वह अपनी मर्जी से निर्देशक के साथ जा रहा है।

बालक छ हफ्तों के लिये निर्देशक के साथ चला जाता है और बाद में पता चलने पर उसके माता पिता पुलिस में इस मामले की शिकायत दर्ज करा देते हैं। निर्देशक और उसकी टीम पुलिस के साथ आँख मिचौनी खेलते हुये अलग अलग स्थानों पर शूटिंग करते रहते हैं। यह तो हुआ फिल्म का थ्रिलर भाग जो कि बेहद कमजोर है और ऐसा प्रतीत होता है कि ऋतुपर्णो घोष ने कोई खास ध्यान दिया नहीं फिल्म के इस भाग पर जिससे कि यह भाग प्रभावी और विश्वसनीय बनता। उन्होने शायद मान लिया था कि वे इस बार फिल्म बनाने के लिये अक अलग विषय ले रहे हैं और फिल्म को अपनी पुरानी फिल्मों से अलग ट्रीट्मेंट दे रहे हैं तो दर्शक सब कुछ स्वीकार करेंगे और उन्हे ऐसा ही करना भी चाहिये! पर जो ऋतुपणों घोष की फिल्मों के खास दर्शक होंगे वे इस फिल्म में भी हर क्षेत्र में क्वालिटी ढूँढेंगें और फिल्म के कई क्षेत्र उन्हे निराश कर सकते हैं। जैसे कि अभिनय के मामले में आश्चर्य होता है बालक अभिरुप के परदे पर माता पिता और दादा का अभिनय करने वाले अभिनेताओं का प्रदर्शन देखकर और इनसे इतना बेकार काम लेने के लिये ऋतुपर्णो घोष ही सबसे ज्यादा जिम्मेदार ठहराये जा सकते हैं। अभिरुप के घर में पहुँच कर फिल्म इतनी नकली इतनी अवास्तविक हो जाती है कि जब जब अभिरुप के घर वाले दिखाये जाते हैं ऐसा संदेह उत्पन्न होने लगता है कि क्या वास्तव में ऋतुपर्णो ऐसा ही काम चाहते थे? या क्या वे इस भाग का प्रदर्शन ऐसे ही करना चाहते थे?

फिल्म में जो जान है वह निर्देशक राजा भौमिक (प्रसन्नजीत), उसकी पत्नी शीला (मनीषा कोईराला), उसकी फिल्म के सेट पर मौजूद ड्रेस डिजायनर अंजलि (राइमा सेन) और बालक अभिरुप (आकाश नील) के चरित्रों के कारण और उनके आपस में संबंधों में आते उतार चढ़ावों के कारण आती है। हालाँकि यहाँ भी कमजोरियाँ हैं पर तब भी वहाँ देखने लायक सामग्री है। अन्य आकर्षण है आउटडोर शूटिंग के दौरान दिखाये जाने वाले खूबसूरत स्थल। कैमरे ने अपना काम बखूबी किया है इस प्राकृतिक सौन्दर्य को दर्शक तक एक लुभावने अंदाज में पहुँचा कर।

निर्देशक शादी के छ्ह साल बाद भी बच्चा नहीं चाहता क्योंकि उसके अनुसार वह तैयार नहीं है बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिये जबकि उसकी पत्नी की जिन्दगी बिना बच्चे के घर पर बैठे बैठे बोरियत से भर गयी है। राजा के पास उसके लिये समय नहीं है और जब वह घर पर भी होता है तब भी उसके पास समय नहीं है और इच्छा भी नहीं है कि वह कुछ पल अपनी पत्नी के साथ बिता सके। इन दोनों के रिश्ते के द्वारा निर्देशक एक अच्छा माहौल उत्पन्न करते हैं और यह हिस्सा एक कलाकार और उसकी पत्नी के बीच उत्पन्न होने वाली परेशानियों को ठीक ढ़ंग से प्रस्तुत करता है। पति अगर कुछ महसूस भी करता है तो अपनी पत्नी से कहता नहीं है। वह समझता है कि शादी हो गयी है और अब अपनी तरफ से कुछ जरुरत नहीं है पति पत्नी के रिश्ते में गरमाहट बनाये रखने के लिये।

राजा एक लेखक और निर्देशक है पर उसके चरित्र में विरोधाभास हैं। वह एक कलाकार के तौर पर अपने को एक बेहद संवेदनशील और उच्च कोटि का कलाकार मानता है और समझता है और दूसरों को भी समझाता है कि काम की क्वालिटी के मामले में वह बिल्कुल भी समझौता नहीं करता और न कभी करेगा। वह अपने मित्र, जो उसकी फिल्म का निर्माता भी है, से कहता है कि ऐसी वैसी सामान्य स्तर की फिल्म बनानी होती तो वह कभी की बना चुका होता।

पर ऐसा संवेदनशील निर्देशक अपने घर में रहने वाली अपनी ही पत्नी के दुखों से न केवल अंजान वरन एक हद तक निष्ठुर बना रहता है।

संवेदना के स्तर वह एक स्तरीय फिल्म बनाना चाहता है जो कि एक बालक पर आधारित है तो जाहिर है कि उसने लेखक और निर्देशक के तौर पर बाल मनोविञान का अच्छा मंथन किया है पर निजी जिन्दगी में वह अपने ही घर में बच्चे नहीं चाहता।

यही विरोधाभास फिल्म की जान हैं क्योंकि बालक और अपनी सहयोगी ड्रेस डिजायनर के साथ अपनी फिल्म की शूटिंग के दौरान बिताये गये क्षण उसे अपनी निजी जिन्दगी की उलझनों के बारे में समझदारी प्रदान करते हैं और उसे वास्तविकता का बोध होता है कि उसकी पत्नी उसके लिये बहुत महत्व रखती है और आज तक वह उसे नजरंदाज करके उसे काफी ठेस पहुँचा चुका है और उसकी अपनी पत्नी के प्रति भावनायें तब चरम सीमा पर पहुँच जाती हैं जब उसे पत्नी द्वारा भेजा गया पत्र मिलता है जिसमें अलग होने की बात लिखी गयी है। अभिरुप के साथ काम करते करते राजा के दिल में बच्चों की जगह बन जाती है। वह उसे अच्छे से संभालता भी है और कहीं वह समझ भी जाता है कि जब वह अपनी फिल्म के लिये बच्चे का उपयोग कर सकता है और उसकी रचनात्मकता कहीं से भी कम नहीं होती वरन बढ़ जाती है तो यह उसके दिमाग में जन्मे सनकी विचार ही थे कि घर में एक बच्चे की उपस्थिति उसकी रचनात्मकता को कम कर सकता है। एक कलाकार को जिन्दगी की परिस्थितियाँ एक नयी समझदारी प्रदान करती हैं और वह कुछ नया जान जाता है और उसके कारण कुछ अच्छा रच देता है।

पश्चाताप बहुत चीजें ठीक कर देता है। फिल्म की शूटिंग खत्म करने के बाद राजा भी एक बदले हुये पति की तरह अपनी पत्नी के पास जाता है जो कि उससे इसलिये अलग नहीं होना चाहती कि वह बहुत दुखी है इस रिश्ते में पर इस बात से कि उसके पति को उसकी बिल्कुल जरुरत नहीं है और साथ रह कर वह उसे परेशान करती होगी।

रिश्तों के अस्तित्व में ताजगी और गरमाहट बनाये रखने के लिये बहुत चीजों की आहुति डालनी पड़ती है।

मनीषा कोईराला को लगभग सभी एक खूबसूरत महिला का दर्जा देंगे पर ऋतुपर्णो घोष ने इस फिल्म में उनके सौन्दर्य को न केवल कमतर दिखाने वरन कहीं कहीं तो बदसूरत दिखाने का प्रयास किया। हो सकता है ऐसा दिखाने के पीछे उनकी कोई योजना रही हो पर अगर ऐसा था भी तो यह परदे पर उनकी फिल्म के जरिये दर्शक के सामने नहीं आ पाता। ऊपर से फिल्म के हिन्दी संस्करण में भी मनीषा के संवाद किसी और से डब करवाये गये। मनीषा कभी भी इतनी धीमी गति से संवाद नहीं बोलतीं और जहाँ उनके हाव भाव तो दुरुस्त हैं पर मुँह से निकले संवाद उनसे मेल नहीं खाते। ऐसा ही अन्य कलाकारों के साथ भी है। डबिंग करने वाली वही कई बार सुनी आवाजें हैं और यह बात फिल्म का स्तर और नीचे ले जाती हैं।

प्रसन्नजीत ने राजा के चरित्र को अच्छे ढ़ंग से निभाया है। अभिनय के मामले में सबसे अच्छा काम बाल-अभिनेता आकाशनील से लिया गया है। राइमा सेन भी अच्छा काम कर गयी हैं उनका काम और प्रभावी बन सकता था यदि निर्देशक ने उनके चरित्र चित्रण की कमियों पर और ज्यादा काम किया होता। क्यों अचानक उन्हे राजा से प्रेम हो जाता है? यह जानकर भी कि राजा शादीशुदा है वे अपनी भावनाओं के प्रदर्शन से नहीं चूकतीं!

एक तो अपनी खुशी, संतोष और प्रगति होती है रचनाकर्मी की या कलाकार की और एक खुशी, संतोष और प्रगति वह होती है जो दर्शकों को उस रचना के देखने से मिलती है। कई बार अपनी प्रगति के लिये एक कलाकार कुछ बनाता है जो कि उसके अब तक के काम से कुछ अलग होत है यह अलग करना उसमें ऊर्जा का संचार करता है। यह जरुर है कि केवल नयापन ही इस बात की गवाही नहीं देता कि रचना उत्कृष्ट होगी। यह उसके पिछले कामों से कमतर हो सकती है।

ऋतुपर्णो घोष ने भी अपनी पुरानी फिल्मों से कुछ अलग फिल्म बनाने का प्रयास किया पर इस अलग प्रयास में ढ़ेरों कमियाँ हैं जिन पर काम किया जाना जरुरी था।

अच्छे निर्देशक की फिल्म की कमजोरियाँ भी सिनेमा के छात्रों को काफी कुछ सिखाती हैं और उन्हे इस बात के प्रति जागरुक बनाती हैं कि कहाँ क्या क्या परिवर्तन हो सकते थे और किस चीज को कैसे और ज्यादा प्रभावी बनाया जा सकता था/है।

…[राकेश]

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