yakshini1उर्वशी और मेनका जैसी अप्सराओं के मिथकों, सिंधु घाटी की सभ्यता से मिले अवशेषों में पायी गयी यक्षिणी की मूर्ति और अजंता एलोरा की गुफाओं में सदियों से अपने विलक्षण सौन्दर्य की झलक दिखाती यक्षिणी तक ढेरों उदाहरण पाये जाते हैं भारत में, जबकि नारी सौन्दर्य की पराकाष्ठा की एक प्रतिमूर्ति बनाने की चेष्टा की गयी है। कालिदास, भास और शूद्रक आदि से लेकर जायसी से होते हुये बीसवीं सदी के जय शंकर प्रसाद तक बहुत सारे उच्च कोटि के विद्वानों ने अपनी कल्पना और लेखनी के बलबूते सौन्दर्यशास्त्र पर काम करते हुये नारी सौन्दर्य को गद्य या पद्य के माध्यम से शब्दों के माध्यम से परिभाषित करने का प्रयास किया है और उसे श्रंगार रस की चाशनी में पगाकर प्रस्तुत किया है। उन्नीसवीं सदी में राजा रवि वर्मा ने अपनी तूलिका से भारतीय नारी सौन्दर्य को चित्रों के रुप में उकेरा। वात्सयायन और खजुराहो जैसे अदभुत मंदिरों के विलक्षण कल्पना वाले शिल्पियों ने नारी के रति अवतार को संसार में एक जाना माना अस्तित्व प्रदान किया।

सुन्दरता की प्रतिमूर्ति कही जाने वाली बहुत सारी देवदासियों और आम्रपाली, वसंतसेना और चित्रलेखा सरीखी राज नर्तकियों के वर्णन से भारतीय सौन्दर्यशास्त्र भरा हुआ है।

श्रंगार रस से भरपूर संगीत और नृत्य भी सदियों से विकसित होता रहा है।

कृष्ण ने तो एक कदम आगे जाकर खुद मयूरपंखी मुकुट और करधनी धारण करके घोषणा कर दी कि आभूषणों की जरुरत तो पुरुष को है और सौन्दर्य के मामले में स्त्री तो परिपूर्ण है।
ऐसा नहीं कि केवल पुरुष ही कला के पुजारी रहे हों और उन्होने ही नारी सौन्दर्य के नख शिख के वर्णन अपनी कृतियों में किये हों। अमृता शेरगिल ने जहाँ अपने कैनवास पर नारी सौन्दर्य को तलाशा वहीं कवियत्री महादेवी वर्मा ने भी लिखा…

रुपसि तेरा घन-केश पाश!
श्यामल श्यामल कोमल कोमल,
लहराता सुरभित केश-पाश!

नभगंगा की रजत धार में,
धो आई क्या इन्हें रात?
कम्पित हैं तेरे सजल अंग,
सिहरा सा तन हे सद्यस्नात!

भले ही उन्होने इसे छायावाद के साँचे में ढ़ाल कर प्रस्तुत किया और कविता अंत तक जाते जाते दूसरे ही अर्थ लेती जाती है पर प्रकृति को एक नारी मान उन्होने श्रंगार रस का सहारा तो लिया ही।

भारतीय नृत्य शैलियाँ तो श्रंगार से मुँह कतई नहीं छिपातीं। हिन्दी सिनेमा में कुछ गीत अनूठे हैं। हो सकता है उन्हे बहुत बड़ी सफलता और प्रसिद्धि न मिली हो पर उनकी उम्र बहुत लम्बी रही है और वे हमेशा जिंदा रहते आये हैं भले ही कुछ ही उनके प्रेमी रहे हों एक समय काल में क्योंकि भीड़ ने उन्हे नहीं सुना और समझा होता है।

ऐसे ही गीतों में से एक गीत है 1977 में आयी हिन्दी फिल्म मृगतृष्णा का गीत ” नव कल्पना नव रुप से रचना हुयी जब नार की“।
शम्भू सेन ने इस गीत को लिखा भी और इसके लिये संगीत भी तैयार किया और मो. रफी ने इसे गाया।

लगभग शुरु से ही राग यमन ने हिन्दी फिल्म संगीत निर्देशकों के लिये कामधेनु का कार्य किया है जिसके शरीर से बहती संगीत रुपी रस की गंगा में से उन्होने जब चाहा लोटा भर संगीत रस निकाल लिया।

पहले विशुद्ध रुप से हिन्दी में रचे गये इस गीत के बोलों पर एक नजर डाल लें।

अंग प्रति अंग शुभांग सुहावे
नैन अधर कटि नृत्य दिखावे

नव कल्पना नव रुप से
रचना रची जब नार की
नव कल्पना नव रुप से
रचना रची जब नार की
सत्यम शिवम सुंदरम से
शोभा बढ़ी संसार की
नव कल्पना….

कला की दासी कामिनी
सोलह कला परिपूर्ण है
कला की दासी कामिनी
सोलह कला परिपूर्ण है
विश्व में विष कन्या के
ये नाम से प्रसिद्ध है
नाम से प्रसिद्ध है
हाव भाव अनुभाव से
सेवा करे भगवान की
नव कल्पना ….

चन्द्रमा सो मुख सलोनो
श्यामवर्णा केश है
चन्द्रमा सो मुख सलोनो
श्यामवर्णा केश है
नयनों से मृगनयनी है
वाणी मधुर उच्चारती
वाणी मधुर उच्चारती
नृत्य गान त्रिगधान पूजा
इनका धर्म है आरती
नव कल्पना …

नि रि गा गा रि गा नि रि
पा मा गा
सा नि पा मा गा रि
मा गा रि सा
देव लोक की देवदासी
सुंदर रुप लुभावनी
देव लोक की देवदासी
सुंदर रुप लुभावनी
पैंजन कंचुकी करधनी
सोलह श्रंगार सुहावनी
सोलह श्रंगार सुहावनी
शंख डमरु झांझ झालर
नुपूर ध्वनि मनमोहनी
नव कल्पना नव रुप से
रचना रची जब नार की
नव कल्पना.….

रफी साब ने इसे बेहतरीन तरीके से गाया है। यहाँ तक कि गीत में हिन्दी शब्द ही रखने के भाव के कारण गीत की लय से थोड़ा हटकर एक विषम सा लगता शब्द “प्रसिद्ध” का उपयोग किया गया है परन्तु सही जगह मौन को रच कर उन्होने शब्द को इस तरह गाया है कि यह सुनने में उतना विषम नहीं लगता जितना कि पढ़ने में लगता है।

हिन्दी सिनेमा के किसी भी काल की कोई भी प्रतिभाशाली अभिनेत्री, जिसे अपने सौन्दर्य और अपनी नृत्य प्रतिभा को लेकर कोई भी संशय नहीं है, इस गीत पर अभिनय करने के लिये तुरंत तैयार हो जाती। इस गीत पर नृत्य और अभिनय करने के लिये अभिनेत्री का खूबसूरत और नृत्य कला में प्रवीण होना बहुत जरुरी है और हेमा मालिनी इन शर्तों पर पूरी तरह खरी उतरती हैं। यह उनके कुछ बेहद अच्छे गीतों में से है जिन पर उन्हे अपनी नृत्य कला का बेहतर ढ़ंग से प्रदर्शन करने का अवसर मिला है। हेमा मालिनी ने इस अवसर का भरपूर लाभ उठाया है। उनके हाव भाव और नृत्य करता उनका शरीर पूरी तरह से गीत के बोलों और उनके अर्थ को जीवंत करते हुये गीत से सामंजस्य बना कर चलते हैं। उनका नृत्य कहीं भी लय नहीं खोता चाहे वे चन्द्रमा सो मुख सलोनो, या मृगनयनी से नयनों की तुलनात्मक अभिव्यक्ति को प्रदर्शित कर रही हों या पैंजन कंचुकी करधनी पर नपा तुला अभिनय कर रही हों।

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खूबसूरत नृत्यांग्ना मल्लिका साराभाई को अवश्य ही हेमा मालिनी से ईर्ष्या हुयी होगी जब उन्होने इस गीत को परदे पर देखा होगा, वे भी तो खरी उतरती थीं इस गीत को प्रदर्शित करने के लिये। हेमा मालिनी से पहले वहीदा रहमान और वैजयंती माला भी इस अपनी उपस्थिति इस गीत को ऐसे ही प्रभावी बनाये रखने में सक्षम थीं और हेमा मालिनी के बाद की पीढ़ी में श्री देवी और माधुरी दीक्षित ही ऐसी रही हैं जो इस गीत के साथ न्याय कर सकती थी।

गीत को देख कर या सुनकर राज कपूर, विजय आंनद,  और गुलजार जैसे निर्देशकों, जिन्हे गीत के फिल्मांकन में महारत हासिल रही है और जो नारी चरित्रों को प्रस्तुत करने में और निर्देशकों से आगे रहे हैं, ने एक बार तो सोचा ही होगा कि यह गीत तो हम भी रख सकते थे अपनी किसी फिल्म में। पुराने नामों में वी शांताराम भी खुश होते इस गीत को अपनी किसी फिल्म में प्रस्तुत करने में और शायद मणि कौल भी श्रंगार रस पर बनायी अपनी फिल्म द क्लाउड डोर में इसका उपयोग कर सकते थे।

…[राकेश]

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