Roadtosangam1महात्मा गाँधी की अस्थियों से भरा एक कलश उड़ीसा के एक बैंक के लॉकर में रखा रह जाता है और इकसठ बासठ सालों तक कोई उसकी सुध नहीं लेता और अंत में गाँधी जी के परपौत्र तुषार गाँधी कलश को वहाँ से लाते हैं और उन्हे अस्थियों का विसर्जन इलाहाबाद में संगम पर करना है। प्रशासन और गाँधी शांति प्रतिष्ठान यह तय करते हैं कि जिस गाड़ी द्वारा सन 1948 में गाँधी जी की अस्थियों को ले जाया गया था अब भी उसी गाड़ी के द्वारा अस्थियों को संगम तक ले जाया जाये। गाड़ी का इंजन ठीक करने की जिम्मेदारी आ जाती है इलाहाबाद के सबसे अच्छे मैकेनिक हशमत भाई (परेश रावल) पर। सब कुछ ठीक ही चल रहा है परन्तु एक दंगा हो जाने से हालात एकदम से बदल जाते हैं और मुसलमानों पर नियंत्रण रखने वाले मौलवी साब (पवन मलहोत्रा) और मस्जिद कमेटी के चेयरमैन कस्तूरी साब (ओम पुरी) सब मुसलमानों को अपना फरमान सुना देते हैं कि पुलिस द्वारा उनकी कौम के उत्पीड़न के विरोध में सब मुसलमान काम करना बंद कर देंगे।

पूर्णतः असहयोग!कोई दुकान नहीं खोलेगा, कोई व्यापार नहीं करेगा और कोई नौकरी पर नहीं जायेगा।

ऐसा निर्णय हशमत भाई को दुविधा में डाल देता है। गाँधी जी से जुड़ा काम करते हैं तो अपनी कौम के लीडरान और उनके फालोवर्स को नाराज करते है और अगर सरकार द्वारा सौंपा गया इतनी जिम्मेदारी का काम, जिसके लिये उन्होने एकाधिक बार जुबान दी है, नहीं करते हैं तो अपने ज़मीर के खिलाफ जाने का काम करते हैं।

एक अकेला आदमी कैसे इन सब मुसीबतों का सामना करता है और कैसे अपने अंदर चेतना आ जाने के बाद वह निडर होकर आगे बढ़ता है, बहुत खूबसूरती से इस यात्रा को दिखाती है, यह फिल्म – रोड टू संगम

फिल्म बेहद साहस के साथ ढ़ेर सारे ऐसे मुद्दे खंगालती है जो आज के भारत के मुसलमानों की जिन्दगी से सीधा ताल्लुक रखते हैं। दिमाग को सोचने की यात्रा पर भेजने को विवश करते हैं फिल्म के कुछ दृष्य़ और संवाद। संवाद सीधे वार करते हैं समस्या के ऊपर। संवाद बिना शर्माए और बिना लिका छिपी का खेल खेले हुये उन दिक्कतों की और ऊँगली उठाते हैं जो हिंदु और मुसलमान दोनों कौमें समझती हैं कि दूसरी कौम के कारण देश को झेलनी पड़ रही हैं। या दूसरी कौम के कारण उनकी कौम को इन दिक्कतों को झेलना पड़ता है। हिंदु और मुसलमान में बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो एक दूसरे के प्रति हमेशा अविश्वास से भरे रहते हैं और कुछ इससे भी आगे जाकर हमेशा एक दूसरे के प्रति नफरत से भरे हुये रहते हैं। यदि किसी में परिवर्तन की जरा सी भी गुंजाइश है तो यह फिल्म उसे अपने अंदर की नफरत को थोड़ा कम करने की ओर एक शुरुआती कदम उठा देने की तरफ प्रेरित कर सकती है।

हशमत कहते हैं अपने एक मित्र से कि मैने तो यहाँ लोगों को पाकिस्तानी क्रिकेटर्स के ही नहीं वरन परवेज मुशर्रफ और लादेन के पोस्टर भी अपनी दुकानों और घरों में लगाये देखा है। वे अपने एक दोस्त से पूछते हैं कि काम पर प्रतिबंध के बावजूद यदि मैं किसी मुसलमान का, या जिन्ना का काम कर रहा होता तो क्या आप लोगों में से कोई भी मुझे रोकता?

वे कस्तूरी साब से कहते हैं कि जिन्ना को न पाकिस्तान से मतलब था न इस्लाम से, उन्होने तो इस लालच में कि उनके परिवार की सम्पत्ति जब्त न हो जाये इस बात का हलफनामा भी दे दिया था कि वे पक्के मुसलमान नहीं हैं। वे आगे कहते हैं कि कैसे जिन्ना और अन्य ने 80% मुसलमानों की राय लिये बिना अपनी राजनीति चमकाने के लिये पाकिस्तान का निर्माण करा दिया। केवल 20% अमीर मुसलमानों की इच्छा के कारण करीब बीस लाख लोग बंटवारे के समय मार दिये गये। इस कत्लेआम के असली जिम्मेदार तो वही 20% अमीर मुसलमान थे। बंटवारा देश का नहीं हुआ, बंटवारा हुया मुसलमानों का। यदि बंटवारा न हुआ होता तो भारत दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में से एक होता। भारत ऐसा देश होता जहाँ सबसे बड़ी संख्या में मुसलमान रहते हैं। जो पैसा युद्धों पर खर्च होता रहा है वह तालीम आदि देने में खर्च होता।

Roadtosangam2वे अपनी पत्नी से कहते हैं कि जब तक मैं काम रोक कर मस्जिद कमेटी के आदेश का पालन कर रहा था मैं इन लोगों के लिये सच्चा मुसलमान था और जैसे ही मैं वह करने लगा जिसके लिये मुझे अपने अंदर से आवाज आनी सुनायी देने लगी तो मैं सच्चा मुसलमान नहीं रहा और कौम का गद्दार हो गया?

वे कहते हैं अपने कई साथियों से कि हम लोग क्यों हर बात को अपने मजहब से जोड़ देते हैं? एक रिक्शा चालक उनसे कहता है कि उसकी रोजी रोटी उसका मजहब है और वह अपना पेट पालने के लिये काम करे तो इसमें मजहब कहाँ से आ गया और मजहब के ठेकेदार तो उसे और उसकी गरीबी को संभालने आ नहीं रहे हैं। वह यह भी कहता है कि कोई कैसे जबरदस्ती कर सकता है उसके साथ, आखिरकार वह हिन्दुस्तान में रह रहा है, पाकिस्तान या तालिबान में नहीं।

कुछ लोग तो लगभग पैदाइशी ऐसे होते हैं कि उन्हे दूसरी कौमों से नफरत होती है और कुछ ऐसे होते हैं जो अपने जीवन में देखी किन्ही घट्नाओं के कारण दूसरी पूरी की पूरी कौमों से नफरत करने लगते हैं और कुछ गलतफहमियों और खुद के दिमाग का इस्तेमाल न करने के कारण ऐसी बातों पर सहज ही विश्वास कर लेते हैं जो कि उन्हे अपने मजहब के अलावा और सारे मजहबों से नफरत करना सिखाती हैं।

पहली श्रेणी में मौलवी साब जैसे लोग आते हैं और दूसरी में कस्तूरी साब जैसे और बाकी के चरित्र तीसरी श्रेणी का प्रतिनिधित्व करते हैं। मस्जिद में लोगों को सम्बोधित करते हुये कस्तूरी साब देश के प्रति अपने गुस्से का इजहार करते हुये कहते हैं कि हमने तो आजादी के समय ही चुन लिया था जो हमें चुनना था पता नहीं यह देश हमें कब चुनेगा?

यह बात बहुत लोगों के संदर्भ में सच भी हैं ऐसे बहुत सारे गरम दिमाग के बहुसंख्यक हैं जो सारे अल्पसंख्यकों के सिर पर तलवार लटकाये रखते हैं कि सिद्ध करो देश के प्रति अपनी भक्ति को। वे हमेशा यही माने रहते हैं कि सब अल्पसंख्यक देश के खिलाफ ही काम करते हैं। ऐसे बेवकूफों का योगदान कम नहीं होता देश की शांति भंग करने में।

ऐसी साम्प्रदायिक सोच न केवल देश को मुश्किल में डालती है बल्कि आतंकवादियों का काम आसान भी करती है।

हशमत भाई के रुप में परेश रावल का अभिनय पिछले कुछ सालों में उनका सबसे अच्छा अभिनय प्रदर्शन है।

अभिनय के मामले में दो कलाकारों की विशेष तारीफ करनी पड़ेगी और दोनों ने अभिनय की दो अलग अलग विद्याओं का बहुत अच्छा प्रदर्शन इस फिल्म में करके दिखाया है।

ओम पुरी ने दिखाया है कि कैसे किरदार की खाल के अंदर घुस कर ऐसा अभिनय किया जा सकता है कि सब कुछ बहुत प्राकृतिक ढ़ंग से प्रभावी लगे। एक बेहद अच्छा दृष्य है जहाँ हशमत भाई कस्तूरी साब से मिलने उनके घर आते हैं। कस्तूरी साब की तबियत कुछ नासाज है और ज्यादातर समय हशमत भाई ही बोलते रहते हैं। पर उन खामोशी से सुनने वाले लम्हों में भी ओम पुरी साब ने ऐसा जबर्दस्त अभिनय किया है कि वह किताबों में बेहतरीन अभिनय के नमूने के तौर पर दर्ज कराने लायक है।

दूसरी तरफ पवन मल्होत्रा ने अभिनय का ऐसा रास्ता चुना कि उन्होने बाहर से एक चरित्र लिया और उसे अपने व्यक्तित्व से इतना अलग तरीके का बना दिया जिससे कि उनका अपना व्यक्तित्व परदे से एकदम गायब ही हो गया और परदे पर रह गया सिर्फ मौलवी का पात्र। न केवल आवाज बल्कि भाव भंगिमा से भी वे ऐसा अलग किस्म का किरदार निभा गये कि बरसों लोग उनके अभिनय को याद रखेंगे। शुरु में जरुर दर्शक को परेशानी हो सकती है उनके चरित्र को स्वीकार करने में क्योंकि वह चरित्र में चिर परिचित पवन मल्होत्रा को ढूँढ़ना चाहता है पर वह तो कहीं है ही नहीं फिल्म में।

नियमित अभिनेताओं और ऐसे लोगों ने, जिन्होने पहले कभी भी अभिनय नहीं किया होगा, फिल्म में एक ऐसा वातावरण बनाने में सहायता प्रदान की जिससे की दर्शक फिल्म को पसंद कर सकें।

हमेशा से कर्णप्रिय रहा भजन वैष्णव जन यहाँ भी कानों और मन को लुभाता है। बाकी का संगीत सामान्य है।

Roadtosangam3फिल्म में कई जगह कई दृष्य बड़े आकर्षक ढ़ंग से टॉप एंगल शॉट्स द्वारा दर्शाये गये हैं।

शुरुआत के कुछ मिनटों को छोड़कर फिल्म रोचकता बनाये रखती है। भारत मूलतः एक भावनाप्रधान देश है और उस कसौटी पर फिल्म पूरी तरह खरी उतरती है।

रोड टू संगम एक अच्छा प्रयास है अमित राय का| अगर पिछले कुछ सालों में बनी फिल्में देखी जायें जिन्हे राष्ट्रीय एकता दर्शाने के लिये राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जा सकता है तो रोड टू संगम उनमे सबसे ऊपर रहेगी। इलाहाबाद जिस गंगा जमुनी तहजीब के लिये प्रसिद्ध रहा है उसे यह फिल्म फिर से स्थापित करती है।

…[राकेश]

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