स्वराज भवन और आनंद भवन (इलाहाबाद) : राष्ट्र को समर्पित हैं या नहीं ?
अपने समय के बहुत बड़े वकील मोतीलाल नेहरु ने सन 1900 में एक बना बनाया भवन खरीदा जिसका नाम “आनंद भवन” था या रखा गया| अपनी वकालत के साथ वे कांग्रेस के स्वतंत्रता संघर्ष के प्रयासों के साथ भी जुड़ते चले गए और 1919 में कांग्रेस के राष्ट्रपति भी बने| 1921 में असहयोग आन्दोलन के दौरान वे और उनके सुपुत्र जवाहरलाला नेहरु जेल भी गए| गांधीजी द्वारा चौरी चौरा काण्ड के कारण असहयोग आन्दोलन वापिस ले लेने के बाद मोतीलाल नेहरु ने बाबू चितरंजन दास के साथ मिलकर 1923 में “स्वराज पार्टी” बनाई जिसका पूरा नाम – कांग्रेस-खिलाफत स्वराज्य पार्टी था| उनकी नयी पार्टी ने कौंसिल चुनावों में भाग भी लिया और अच्छी सफलता भी प्राप्त की|
उनका घर बैठकों का स्थल था और राजनीतिक सरगर्मियां चलती रहती थीं| पंडित नेहरु ने अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखा भी है कि पांच मिनट भी ऐसे नहीं होते थे जब वे और परिवार के लोग एकांत पा सकें, या किसी निजी मित्र से शांति से बात कर सकें|
1927 में मोतीलाल नेहरु ने पुराने भवन के पड़ोस में ही एक नया भवन बनवाना शुरू किया, जो कि उनके और परिवार की नई रिहाइश होने वाला था| 1930 में नेहरु परिवार नए “आनंद भवन” में रहने लगा| और यह नेहरु परिवार का निजी आवास बन गया|
1930 में दांडी मार्च के समय मोतीलाल नेहरु ने घोषणा की कि पुराना आनंद भवन वे कांग्रेस पार्टी को दे रहे हैं| पुराने भवन को नया नाम – “स्वराज भवन ” दिया गया|
पर संभवतः उनकी घोषणा पर अमल अगले साल 1931 में ही हो पाया जब जवाहर लाल नेहरु ने पुराना “आनंद भवन/ स्वराज भवन” कांग्रेस पार्टी को दे दिया और यह कांग्रेस का इलाहाबाद में मुख्यालय बन गया|
भारत में ब्रितानी सरकार ने 1942 में कुछ समय के लिये स्वराज भवन को जब्त भी कर लिया था|
17 अगस्त 1964 को एक गैर-वित्तीय लाभ वाला निजी ट्रस्ट बनाया गया – JNMF (Jawaharlal Nehru Memorial Fund) , जो नियमानुसार कम से कम 14 ट्रस्टीज द्वारा संचालित होना चाहिए। ट्रस्ट की वेबसाईट पर वर्तमान ट्रस्टीज की कोई सूची सार्वजानिक रूप से उपलब्ध नहीं है| चूंकि यह एक निजी ट्रस्ट है सो यह संभव है इस ट्रस्ट को ऐसा करने की कानूनी बाध्यता नहीं है| लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी से जुड़े ट्रस्ट को पारदर्शिता अपनानी चाहिए, ऐसा तो सभी की अपेक्षा होगी| ट्रस्टी लिस्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। ऐसी पर्दादारी की क्या आवश्यकता है यह समझ से परे है? इस मुद्दे पर ज्यादा न पढ़ा जाए तो विश्वास करना मुश्किल हो जाए कि ऐसा हुआ भी है!
सन 1970 में इंदिरा गांधी ने नए आनंद भवन को कुछ साल पहले बनायी गयी निजी ट्रस्ट JNMF को सौंप दिया| दोनों भवनों – स्वराज भवन, और आनंद भवन को संग्रहालयों का रूप दे दिया गया|
ट्रस्ट JNMF के मुख्य काम रहे हैं :
पंडित नेहरू से जुड़े संग्रहालय (आनंद भवन, स्वराज भवन आदि) का रखरखाव।
नेहरू फेलोशिप और स्कॉलरशिप देना।
नेहरू के दस्तावेजों, अभिलेखों का संरक्षण, कुछ समय पहले ऐसी घोषणा भी की गयी थी कि डिजिटल आर्काइव बनाई जायेगी|
ट्रस्ट JNMF पर नियंत्रण मुख्यतः नेहरु-गांधी परिवार और कांग्रेस पार्टी का ही रहा है| अखबारों की ख़बरों के अनुसार यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सोनिया गांधी, डॉ. कर्ण सिंह और जयराम रमेश ट्रस्ट में किसी न किसी पद पर हैं|
शायद पहले तीन मूर्ति स्थित संग्रहालय की देखभाल भी इस ट्रस्ट के द्वारा की जाती थी| अब वहां प्रधानमंत्री म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (PMML) की स्थापना हो चुकी है जो सीधे भारत सरकार के नियंत्रण में चलता है|
चूंकि सन 1970 से अभी तक लगभग 32 साल तो मुख्यतः कांग्रेस की सरकारें केंद्र में रही हैं और बाकी बचे सालों में भी लगभग तीन साल कांग्रेस समर्थित सरकारें केंद्र में रही हैं| निजी ट्रस्ट द्वारा अनुदान प्राप्त करने के जो नियम होते हैं उनके अनुसार JNMF ने भी समय समय पर सरकारी अनुदान पाए होंगे, लेकिन यह संदेहात्मक है कि 2014 के बाद ट्रस्ट ने कभी केंद्र से अनुदान की मांग की होगी|
पंडित नेहरु की छोडी विरासत में एक बहुत बड़ा भेद है| उनके जीवन के दो भाग हैं, एक जब वे कांग्रेस के नेता थे और स्वतंत्रता सेनानी थे, दूसरे जब भारत का संविधान लागू हो गया और वे भारत के विधिवत प्रथम प्रधानमंत्री बन गए| भारतीय गणतंत्र के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनके द्वारा प्राप्त या लिखे गए दस्तावेज या सरकारी कोष से खरीदी गयी वस्तुएं राष्ट्र की संपत्ति हैं, उन पर कानूनी और नैतिक रूप से निजी ट्रस्ट JNMF का नियंत्रण नहीं हो सकता|
जब केंद्र में कांग्रेस की या कांग्रेस समर्थित सरकारें थीं तब ऐसे मुद्दों की ओर कोई देखता भी नहीं था और सब कुछ JNMF के नियंत्रण में ही रहा| ऐसा भी अखबारों में आया कि 2008 में यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने पंडित नेहरु के निजी कागजात तीन मूर्ति संग्रहालय से ले लिए , जिसका विरोध (PMML) ने किया है और उन्हें वापिस माँगा है| नेहरु पेपर्स विवाद में सरकारी पक्ष का कहना है कि 51 कार्टन नेहरू के निजी पत्र/दस्तावेज (1947 – 64 ) NMML (PMML) से 2008 में सोनिया गांधी के कहने पर JNMF/परिवार को दिए गए।
साधारण अवलोकन यह कहता है कि 1947 से संविधान लागू होने के समय तक के पेपर्स तो JNMF या नेहरु गांधी परिवार एक बार को रख भी सकता है लेकिन उसके बाद के सारे दस्तावेज PMML के नियंत्रण में होने चाहियें|
स्वराज भवन और आनंद भवन पर वापिस आयें तो ये दोनों JNMF के नियंत्रण में चलने वाले संग्रहालय हैं जहाँ प्रवेश शुल्क लगता है और अलग अलग फ्लोर्स को देखने का अलग टिकट मूल्य है| लाखों लोग दोनों संग्रहालयों को देखने हर साल वहां जाते हैं| टिकट से प्राप्त राशि ट्रस्ट के नियंत्रण में रहती है, जिसे ट्रस्ट भवनों के रखरखाव पर ही खर्चता होगा|
JNMF को 2019 में हाउस टैक्स (लगभग 4 करोड़) का नोटिस म्यूनिसिपल कारपोरेशन ने दिया था इन भवनों को कमर्शियल प्रॉपर्टी मानकर| ट्रस्ट ने इसे चैरिटेबल बताया| विवाद संभवतः अभी चल ही रहा है|
इन सब बातों से इतना तो स्पष्ट है ही कि इलाहाबाद स्थित स्वराज भवन, और आनंद भवन (और अब वहां खुले संग्रहालय) भारत सरकार और इस नाते भारत देश की संपत्ति नहीं है, ये एक निजी ट्रस्ट JNMF की संपत्ति हैं| जनता इन्हें टिकट लेकर देख सकती है लेकिन भारत सरकार का कोई नियंत्रण इनके ऊपर नहीं है|
यह कहना कि नेहरु-गांधी परिवार ने आनंद भवन देश को समर्पित कर दिए उतना ही सच है जितना युद्धिष्ठिर का यह कहना
अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा
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