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Ugly का अंत और कुछ अन्य हिस्से इस भयानक रूप से वास्तविक प्रतीत होते हैं कि फिल्म दर्शक को डराती है और इस कदर डराती है कि दर्शक पहले तो हजार बार सोचेगा अपने छोटे बच्चे को कार में छोड़कर किसी काम को करने जाते हुए और अगर कार पार्क करने की जगह के सामने ही स्थित इमारत में भी जा रहा हो जहां से कार साफ दिखाई देती हो, तो भी वह सैंकड़ों बार पलट कर देखेगा और अंदर से भी कार की ओर ही देखता रहेगा इस बात को सुनिश्चित करने के लिए कि उसका बच्चा कार में है और सुरक्षित बैठा हुआ है|

फिल्म के थ्रिलर भाग से थोड़े समय के लिए अलग हट कर आजकल के दौर में पति-पत्नी के मध्य बढते जाते तनाव की सामाजिक समस्या की बात करें तो इस बात को नाकारा नहीं जा सकता कि अगर पति पत्नी के मध्य निरंतर संघर्ष हो रहा है और उनमें रोज झगडे होते हों तो उनके बच्चों के जीवन पर इनका दुस्प्रभाव न पड़े ऐसा हो पाना लगभग असंभव सी बात है| माता-पिता के रोजमर्रा के संघर्षों में बच्चों के बचपन नष्ट हो रहे हैं| माता-पिता के झगडों की उपस्थिति में पनप रहे बच्चे ग्रंथियों से भरा बचपन व्यतीत करते हैं और फिर जीवन भर उनके जीवन किसी न किसी किस्म की मानसिक अस्वस्थता से भरे रहते हैं| तलाक भी क्या कोई सटीक समाधान प्रस्तुत करता है? जीवन साथियों में तलाक हो सकते हैं पर बच्चों के लिए तो माँ-बाप वही रहते हैं| बड़े फिर से शादियां कर सकते हैं पर क्या बच्चों को नयी माँ या नये पिता में असली माँ या असली पिता की छाया मिलती है? शायद नहीं, और इसलिए दुनिया भर में माता या पिता के अलगाव के बाद उनके पुनर्विवाह के बाद बच्चे खंडित व्यक्तित्व के होते जाते हैं| भारत जैसे देश में तो और बड़ी समस्या है अगर महिला अपने बच्चे को लेकर अलग हो जाए और दुबारा विवाह कर ले| क्या उसका दूसरा पति, उसकी पहली शादी से उत्पन्न बच्चों के लिए पिता की भूमिका निभा पाता है? भारत में परिवारों के अंदर ही लड़कियों के यौन – शोषण की गंभीर समस्या को भी ध्यान में रखा जाए तो अगर संतान लड़की हो तो समस्या और जटिल हो जाती है| स्त्री सम्बंधित मसले अलग प्रकृति के हो जाते हैं| फिल्म में एक पुलिस इन्स्पेक्टर अपने अधिकारी से कहता भी है,” सर लड़कियों के अपहरण के मामले में फिरौती के फोन नहीं आते और अगर लड़की खूबसूरत हो तो बिल्कुल भी नहीं आते, और कली (गायब हुई एक लड़की) दिखने में सुंदर थी”|

पति-पत्नी के मध्य संघर्ष में उनके बच्चों का बचपन पिसता ही पिसता है| पति-पत्नी के झगडों में उनके अहं इतने बड़े हो जाते हैं कि उनके समक्ष उनके अपने बच्चे तक गौण हो जाते हैं और उनके बच्चों का बचपन उपेक्षा का शिकार हो जाता है| यह फिल्म बेहद गंभीरता से इस बात को रेखांकित करती है| फिल्म केवल पति-पत्नी और अन्य पारिवारिक रिश्तों एवं मित्रों के मध्य रिश्तों पर ही अपनी थीसिस प्रस्तुत करते वरन समाज के अन्य वर्गों पर भी बहुत ठोस टिप्पणियाँ करती चलती है|

एक दस साल की बच्ची, कली (Anishika Shrivastava) अपने पिता, राहुल (Rahul Bhat), की कार से, जो कि एक भीड़ भरे बाजार की सड़क पर खड़ी है, गायब हो जाती है और राहुल एवं उसका मित्र, चैतन्य (Vineet Kumar Singh) बच्ची को खोजते हुए वहीं सड़क पर मुखौटे बेचने वाले आदमी पर शक करते हैं, जिसके पास बच्ची का मोबाइल पाया जाता है| बच कर भागने के चक्कर में मुखौटे बेचने वाला गाड़ी से टकराकर दुर्घटना का शिकार होकर वहीं सड़क पर ही मर जाता है| फिल्म पहुँचती है पुलिस थाने जहां पुलिस वाले लापता कली के पिता राहुल और उसके मित्र चैतन्य का मानसिक शोषण कर रहे हैं और उन्हें मानसिक प्रताडना देने में आनंद ले रहे हैं| भारतीय समाज में पुलिस का आतंक इस कदर छा गया है कि दर्शक इस बात को तो देखते हैं महसूस करते हैं कि पुलिस वाले मामले की गंभीरता को न समझते हुए शिकायत लेकर आए लापता बच्ची के पिता और उसके मित्र को प्रताडित कर रहे हैं पर जैसा कि राहुल मायूसी में दबे स्वर में एक तरह से चापलूसी करता हुआ हल्के स्तर की शिकायत करता है कि उसकी बच्ची लापता हो गई है और पुलिस इन्स्पेक्टर उचित कार्यवाही न करके उसी से पूछताछ कर रहा है, उसी तरह से जनता की हालत पुलिस के सामने अमूमन होती है| फिल्म ठोस तरीके से दर्शाती है कि कैसे पुलिस नागरिक से न केवल सही तरीके से पेश नहीं आती बल्कि उनका शिकायत लेकर आए पीड़ित वर्ग के प्रति असवेंदनशील और बहुत हद तक क्रूर है| भारतीय समाज में पुलिस की दादागिरी और जनता के प्रति असंवेदनशीलता को इस कदर स्वीकृति मिल चुकी है कि पुलिस इन्स्पेक्टर दवारा लापता बच्ची के पिता को मानसिक प्रताडना देने वाले दृश्यों में बहुत से दर्शक गुस्सा महसूस न करके इन्स्पेक्टर की ऊलजलूल बातों और हरकतों पर हँसते हैं और उसके आनंद में आनंदित होते हैं| जनता अपने ही अधिकारों के प्रति सचेत नहीं है और अगर मामला पुलिस से सम्बंधित हो तो अच्छे अच्छों की रूह कांपने लगती है|

फिल्म बड़े ठोस तरीके से यह भी सिद्ध करती है कि कैसे आम जनता के प्रति असंवेदनशील पुलिस किसी शक्तिवान और रसूख वाले आदमी का मामला सामने आते ही तत्परता से कार्यवाही करने के लिए सिर के बल खड़ी हो जाती है| जब तक मामला एक संघर्षशील अभिनेता की बच्ची के लापता होने का है पुलिस इन्स्पेक्टर कतई गंभीर नहीं होता पर जैसे ही उसे पता लगता है कि मामला दरअसल उसके विभाग के एक बहुत बड़े अधिकारी से भी जुड़ा हुआ है वह मामले की तह में जाने में ऐसा गंभीर हो जाता है जैसे उसका पुनर्जन्म हुआ हो और दर्शक किसी और ही पुलिस इन्स्पेक्टर से मिल रहे हैं|

लापता बच्ची कली राहुल की ही बेटी नहीं है, चूँकि कली की माँ, राहुल की तलाकशुदा पत्नी शालिनी, ने अब आई.पी.एस बन चुके अपने सहपाठी शौमिक बोस (Ronit Roy) से विवाह कर लिया है सो शौमिक बोस अब कली का सौतेला पति है और इसी एक रिश्ते के कारण पुलिस सिर के बल खड़ी होकर कली की तलाश में लग जाती है|

हर आदमी में होते हैं. दस-बीस आदमी. जिसको भी देखना हो, कई बार देखना

निदा फाजली की इस पंक्ति में एक रोचक सच्चाई छिपी हुयी है| हर व्यक्ति वही नहीं है जो वह एकबारगी नज़र आता है, उसके व्यक्तित्व के अंदर भी कई परतें होती हैं और उसके मुख के अंदर कई और मुखौटे छिपे होते हैं| फिल्म का हर वयस्क किरदार कई तरह की परतों से भरे व्यक्तित्वों का मालिक है|

फिल्म के मुख्य किरदार हद दर्जे के जटिल, पूर्वाग्रहों से ग्रसित और केवल स्वहित देखने वाली प्रवृति के मालिक हैं| राहुल ने शालिनी से प्रेम विवाह किया है पर विवाह पश्चात उसकी एक ही ख्वाहिश सबसे बड़ी हो जाती है कि किसी तरह वह फिल्मों में अभिनय कर पाने का आवसर पा जाए| पत्नी या बेटी के जीवन इस इच्छा की बलि चढ़ जाएँ तो उसे परवाह नहीं| वह शालिनी से कहता है कि अगर उसे जूनियर आर्टिस्ट भी बनना पड़ा तो भी वह एक्टर ही बनेगा| तकरीबन 10-11 साल से तो वह संघर्ष कर ही रहा है फिल्मों में काम पाने के लिए| उसने अभिनय के लिए कोई ट्रेनिंग ली है या नहीं फिल्म यह सब नहीं बताती| बस उसमें जिद दिखाई गई है अभिनेता बनने की| घर का खर्च कैसे चलेगा उसे इसकी चिंता नहीं, वह कोई अन्य काम करने के लिए तैयार नहीं| उसके फ़्लैट क किराया चैतन्य देता है, उसकी गाड़ी में तेल और मोबाइल रिचार्ज आदि के खर्चे भी चैतन्य ही उठाता है| राहुल की इकलौती बेटी को गायब हुए २ दिन हो चुके हैं और राहुल, अपनी पूर्व पत्नी शालिनी की सहेली राखी से शारीरिक संपर्क बनाने में व्यस्त है और इन परिस्थितियों में भी उसे राखी से अश्लील किस्म की बात करने से गुरेज नहीं|

चैतन्य राहुल की इतनी सहायता करता है सो बड़ा भला प्रतीत होता है पर फिल्म उसके चरित्र की सब परतें खंगालती है| पति-पत्नी, राहुल और शालिनी (Tejaswini Kolhapure) में आपस में समस्या है, यह जानकर और मित्र की पत्नी की कमजोरी को जानते हुए उस पर डोरे डाल उससे शारीरिक संबंध स्थापित करने वाला मित्र, चैतन्य है| जाने क्या सोचकर चैतन्य कली के गायब होने की स्थिति का लाभ उठाकर अपहरणकर्ता बन कर फोन करके फिरौती मांगकर स्थितियों को और उलझा देता है और राहुल को तब तक यह नहीं बताता जब तक कि पुलिस इस बात को राहुल को नहीं बताती|

कालेज के समय के अपने एकतरफा प्रेम को भूल न पाने के कारण, उसी युवती से उसके तलाक के बाद शादी करने वाला पुलिस अधिकारी शौमिक बोस है, जिसे अभी भी अपनी पत्नी-शालिनी पर शक है और जो दिन भर अपनी पत्नी के फोन टेप करके सुना करता है| घरेलू हिंसा की शिकार शालिनी को बचाते हुए शौमिक एक सीधा सादा भावुक और आदर्शवादी प्रेमी नजर आता है पर शालिनी से विवाह करने के बाद वही शौमिक एक बेहद क्रूर ह्रदय वाला पति बन जाता है| “मेरे पास तो तुम बची कुची आईं थीं” कहकर शालिनी को व्यंग्य बाण से घायल करने में उसे कतई कोई हिचक नहीं होती|

शालिनी भी कम नहीं, वह अपनी सहेली राखी से अपने और अपने पूर्व और वर्तमान पति की अतरंग बातें किया करती है|

और राखी का मिजाज़ ऐसा कि वह शालिनी के पूर्व पति राहुल के साथ विवाहेत्तर संबंधों में मशगूल रहती है|

किरदारों में आपस में विश्वास पनपे भी तो कैसे? सभी किरदार एक दूसरे को ठग रहे हैं| और यह ठगी नैतिक स्तर पर ही सीमित नहीं रहती बल्कि आर्थिक स्तर पर भी फलती फूलती है| शालिनी को अपनी बेटी कली के अपहरण के बहाने अपने बूढ़े माता-पिता को ठगने में कोई हिचक नहीं होती| और ऐसा ही उसका भाई भी है जो इसी अपहरण के नाम शालिनी को भी ठग लेता है| राखी, चैतन्य और राहुल तीनों भी कली के अपहरण के बहाने पैसा ठग लेने की जुगत में हैं|

फिल्म के किरदार ही नहीं समय जाया करते मूल मुददे को छोड़कर बल्कि निर्देशक भी दर्शक को इधर उधर खूब भटकाते हैं| एक दस साल की बच्ची गायब है पर उससे सम्बंधित किरदार आपस में अविश्वास के कारण उसके खोज करने के बजाय इस बहाने भी एक दूसरे पर दोषारोपण करने में व्यस्त हैं और अविश्वास की लकीर इतनी गाढ़ी है कि राहुल समझता है कि उसे सबक सिखाने के लिए शौमिक ने ही कली को गायब करवाया है और शौमिक को लगता है कि उससे और शालिनी से बदला लेने के लिए राहुल ने ही अपने दोस्त चैतन्य के साथ मिलकर कली के अपहरण का नाटक रचा है| अविश्वास की भूल भुलैया में भटके किरदारों को देख दर्शक को महसूस होता है इन खुदगर्ज किरदारों के गिरहबान पकड़ कर उन्हें वास्तविकता का बोध कराया जाए कि कली का जीवन खतरे में है उसे खोजो| फिल्म में ऐसा समय भी आता है जब यह बात सच लगने लगती है कि केवल दर्शक को कली के गायब होने की चिंता है और फिल्म के किरदार अपने हितों की लड़ाई में कली को भूल चुके हैं| वयस्क अपने अहं के सामने बच्चों और उनके बचपन की उपेक्षा करते ही हैं|

पूर्वाग्रह आदमी को लगभग अंधा बना देते हैं और वह सत्य को नहीं देख पाता जबकि सत्य उसके आसपास ही विचरण करता रहता है| इस बात को यह फिल्म बेहद सशक्त तरीके से स्थापित करती है|

कली क्या खिल कर फूल के रूप में विकसित हो पायेगी या खिलने से पहले ही मुरझा जायेगी? फिल्म का क्लाइमेक्स दर्शक को हिला डालता है|

फिल्म यह भी प्रश्न जेहन में उठाती है कि कली का अपहरण न भी हुआ होता तो राहुल, शालिनी और शौमिक के कुंठित त्रिकोणीय संघर्ष में उसका जीवन किस रूप में विकसित होता?

फिल्म में दो बातें खलती हैं|

  • थाने में जब पुलिस इन्स्पेक्टर राहुल और उसके दोस्त का उपहास उड़ाकर उनका मानसिक शोषण कर रहा है, तभी एक पुलिस वाला मुखौटे बेचने वाले मृतक की बुआ के पास पूछताछ के लिए  पहुंचता है और पूछता है कि क्या उसे बच्चे पसंद थे? क्या कली के अपहृत होने की जांच शुरू हो चुकी थी?

  • जब पुलिस की हिरासत में राहुल और चैतन्य आपस में झगड़ चुकते हैं तब राहुल के मोबाइल पर कली के बदले फिरौती लेने का फोन आता है, जो कि वही रिकार्डेड टेप है, जो चैतन्य ने रिकार्ड किया था और अब उसी टेप को राखी बजाती है| फिल्म नहीं दिखाती कि चैतन्य राखी से इस दौरान मिला है, और उसने टेप राखी को दे दिया है| गौर तलब है कि राखी टेप को अपने घर में अपने कमरे से फोन पर सुनवाती है| क्लाइमेक्स से पहले जरुर राखी को राहुल और चैतन्य के साथ बैठे दिखाया है, पर उस स्टेज पर राखी दवारा टेप बजाया जाना फिल्म में जस्टीफाई नहीं हो पाता|

फिल्म बच्चों के प्रति संवेदनशील होने पर जोर देती है| फिल्म यह स्पष्ट दर्शा देती है कि वयस्कों के संबंधों में मनमुटाव के कारण बच्चों के बचपन नष्ट हो रहे हैं|

सभी कलाकारों ने अपनी भूमिकाओं के प्रति न्याय किया है| Bombay Velvet में एक महत्वपूर्ण भूमिका में निर्देशक करण जौहर के चयन को छोड़ दें तो छोटी से छोटी भूमिका में सशक्त अभिनेता को उतारना अनुराग कश्यप की फिल्मों की विशेषता रही है| Black Friday में एक छोटी भूमिका में नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय प्रदर्शन को याद करें जिनके सच्चे अभिनय की कान्ति बड़ी भूमिकाओं वाले अभिनेताओं के प्रदर्शन से तनिक भी मंद नहीं थी|

इस फिल्म में भी मुखौटे बेचने वाले चरित्र की बुआ की भूमिका में जिस अभिनेत्री को लिया गया है वह एकदम सटीक चयन है| ऐसे चरित्र की भूमिका में इतना असतीक चयन बरसों पहले राज कपूर की चर्चित और अंतिम फिल्म – राम तेरी गंगा मैली, में देखने को मिला था, जिसमें पहाड़ से नीचे मैदान में आने पर गंगा (मंदाकिनी) ऋषिकेश में झुग्गी-झोंपडी में बसर करने वाले भिखारियों के गैंग की मुखिया के चंगुल में फंस जाती है| गैंग की मुखिया की भूमिका में सर्वथा उपयुक्त अभिनेत्री का चयन किया गया था जो उस भूमिका की मांग पर शत-प्रतिशत खरी उतरती थी| ऐसा ही उपयुक्त चयन इस फिल्म में भी मुखौटे बनाने वाली महिला की भूमिका में अभिनेत्री का किया गया है| कायदे से यह चयन फिल्म के बाकी सभी किरदारों पर भारी है|

फिल्म में एक दृश्य है जिसमें शौमिक बोस के भूमिका में रोनित रॉय गुस्से में अपने साले का आई फोन तोड़ने के बाद अपने मातहत पुलिस वाले से कहते हैं, “चाल पिलाओ लाट साहब को|”

रोनित रॉय का यह कहना बिल्कुल ऐसा प्रतीत होता है जैसे के.के मेनन ने इस संवाद को बोला हो या इस दृश्य को अभिनीत किया हो| यह दृश्य दर्शाता है कि अभिनेताओं के अंदर का बहुत कुछ निर्देशक के अंदर से निकल कर आता है|

That Girl in Yellow Boots में भी संगीत ने फिल्म के असर को बाधित किया था और यहाँ Ugly में भी फिल्म के अंत में उपयोग में लाये गीत “पापा” को छोड़कर अन्य गीत दर्शक पर फिल्म के असर को कम करते हैं| आज के दौर में हिंदी सिनेमा उस मुकाम पर पहुँच चुका है जहां ऐसी फिल्मों में गीत ना भी रखे जाएँ तो किसी को ऐसा करना नागवार न गुजरे|

 …[राकेश]

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