वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं
~ महफूजुर्रहमान आदिल
टाइटन जैसे भारतीय स्वदेशी ब्रांड की बड़ी सफलता की कहानी फिल्म या वैब सीरीज का विषय बने यह एक शानदार पहल है| किसी प्रोडक्ट को रिर्सर्च एंड डेवलपमेंट की स्टेज से बड़े स्तर पर प्रोडक्शन तक ले जाना और उसके लिए एक निरंतर विकसित होता बाज़ार बना देना, इस प्रक्रिया से जुड़े लोगों के लिए ही एक शानदार यात्रा नहीं होती बल्कि जो भी ऐसी गाथा को देखता, सुनता या पढता है वह भी ऐसी कथा के आकर्षण से सम्मोहित हुए बिना नहीं रह सकता|
टाटा समूह के बारे में दो कहानियां सर्वविदित हैं :-
टाटा मोटर्स और जगुआर लैंड रोवर
टाटा मोटर्स ने 1998 में अपनी पहली स्वदेशी कार ‘टाटा इंडिका‘ लॉन्च की थी लेकिन यह आर्थिक हानि का निर्णय निकला। रतन टाटा ने 1999 में फोर्ड को अपनी कार डिवीजन बेचने का प्रस्ताव दिया। डेट्रायट में फोर्ड के अधिकारियों ने रतन टाटा का अपमान किया, “जब आप कार बनाना नहीं जानते तो पैसेंजर कार डिवीजन शुरू ही क्यों किया? इसे खरीदकर हम आप पर एहसान कर रहे हैं।”
रतन टाटा अपमान का घूंट पीकर वापिस आ गए और अपनी कंपनी को मजबूत करने के संघर्ष में लग गए| समय का चक्र घूमा और ठीक नौ साल बाद, 2008 में फोर्ड कंपनी को भारी घाटा हुआ और उसने अपनी प्रतिष्ठित लग्जरी ब्रांड्स—जगुआर और लैंड रोवर—को बेचने का फैसला किया। टाटा मोटर्स ने 2.3 अरब डॉलर में इन दोनों कंपनियों का अधिग्रहण कर लिया|
आज जगुआर लैंड रोवर (JLR) टाटा संस की सबसे ज्यादा मुनाफा कमाने वाली सहायक कंपनियों में से एक है।
टाइटन और स्विस वॉच उद्योग
जैसा कि इस सीरीज में भी दिखाया गया है, जब टाटा समूह ने ‘टाइटन‘ ब्रांड की घड़ियाँ बनानी शुरू कीं, तो वे आधुनिक तकनीक और डिजाइन सीखना चाहते थे। उस समय स्विट्जरलैंड की प्रतिष्ठित और बड़ी स्विस वॉच कंपनियों ने टाइटन के साथ किसी भी तकनीकी सहयोग या साझेदारी करने के प्रस्ताव को सिरे से ठुकरा दिया| उन्हें लगता ही नहीं था कि भारत ग्लोबल स्तर की घड़ी बना भी सकता है|
टाइटन ने हार नहीं मानी और अपनी इन-हाउस तकनीक व डिजाइन विकसित करने में जुट गयी। कालान्तर में स्विस घड़ियों के दबदबे को तोड़ते हुए टाइटन दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी घड़ी निर्माता कंपनी बन गई।
टाइटन यहीं नहीं रुकी, बल्कि 2000 के दशक में टाइटन ने यूरोप के लग्जरी बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए दुनिया की सबसे पुरानी घड़ी निर्माताओं में से एक स्विस घड़ी ब्रांड Montres Favre Leuba का अधिग्रहण कर लिया। इसके अलावा, टाइटन ने 2011 में स्विस वॉचमेकिंग कंपनी Valjoux की तकनीक और मशीनों में बड़ी हिस्सेदारी हासिल की।
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सीरीज जूनून की इस कथा को प्रभावशाली तरीके से दिखाने में तो कामयाब है ही साथ ही तकनीकी श्रेष्ठता की इस यात्रा में यह मानवीय संबंधों, मानव की संघर्ष करते हुए श्रेष्ठता पाने की क्षमता, और कठिनाइयों के बीच अपना उत्साह बरक़रार रखने और यात्रा में मानवीय कमजोरियों को किनारे रखकर बड़े लक्ष्य की पूर्ति के लिए निरंतर जुटे रहने की प्रेरणा देने का काम भी करती है| संघर्ष के दौरान आपस में मतभेद होना स्वाभाविक है, एक दूसरे पर विश्वास में कमी भी आ जाती है और ऐसे में प्रोजेक्ट लीडर का दायित्व बहुत बढ़ जाता है, उसे टीम सदस्यों का विश्वास बनाए रखना होता है, उन्हें लगातार प्रेरित करना होता है, अपनी स्वंय के आत्मविश्वास को रत्ती भर भी कमजोरी से ग्रसित होने से रोकना होता है|
होमी भाभा का चरित्र शानदार तरीके से निभाने के बाद जिम सर्भ ने Xerxes Desai का चरित्र भी पूरी विश्वसनीयता और प्रभावी अंदाज़ में निभाया है| यह पुनः इस धारणा को ठोस करता है कि मेघना गुलज़ार को सैम बहादुर में कालजयी फील्ड मार्शल मानेकशॉ की भूमिका जिम सर्भ के हवाले करनी चाहिए थी| एक पारसी अभिनेता ही मानेक शॉ जैसे महान सैन्य लीडर के व्यक्तित्व की बारीकियां परदे पर उतार सकता था|
नसीरुद्दीन शाह दर्शक के सामने एक बहुत बड़ा द्वैत उत्पन्न कर देते हैं| सभी को पता है कि वे जे आर डी टाटा नहीं हैं| गिनती के ही भारतीय होंगे जो वास्तविक जीवन में जे आर डी टाटा से मिले होंगे लेकिन बहुत से भारतीयों ने उनकी तसवीरें देखी हैं, उन्हें वीडियो में देखा है, और उनके मिथकीय बन चुके कद से सभी परिचित हैं, ऐसे में नसीरुद्दीन शाह को परदे पर देखते हुए दर्शक बहुत बार यह भूल ही जाता है कि वह एक अभिनेता को परदे पर देख रहा है, उसे यह भ्रान्ति बार बार हो जाती है कि क्या जे आर डी टाटा ही परदे पर विराजमान हैं| नसीरुद्दीन शाह को स्पष्टतया कुछ शारीरिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है और यह शारीरिक कमजोरी भी उनके द्वारा निभाये चरित्र पर सटीक बैठती है क्योंकि इसमें जे आर डी टाटा स्वयं ही दिल के दौरे के काल से गुजरते दिखाए गए हैं| नसीर साहब , जे.आर.डी. टाटा को एक सतर्क, विनम्र, दयालू, व्यक्ति और एक कुशल कॉर्पोरेट लीडर के रूप में सफलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं| बहुत संभावना है कि उन्होंने जे आर डी टाटा को व्यक्तिगत रूप से कभी नहीं देखा होगा| पारसी चरित्र नसीर पहले भी तीन मौकों पर निभा चुके हैं| फिल्म- पेस्टन जी में और रोहिंटन मिस्त्री के उपन्यास – A Fine Balance , पर इसी नाम से बनी फिल्म में और परजानिया में| पहले के तीनों काल्पनिक चरित्र थे और टाइटन में उन्हें लीजेंडरी जे आर डी टाटा का चरित्र निभाना था| ऐसी चुनौती के सामने उन्होंने जे आर डी टाटा के कुछ ज्ञात गुण जानकार ही उनकी एक शख्सियत अपने लिए गढ़ी होगी| उन्होंने हुबहू टाटा जैसा बनने की कोशिश नहीं की है बल्कि उनके जैसे गुणों वाला कॉर्पोरेट लीडर सीरीज में दिखाई गयी परिस्थितियों में जैसा व्यवहार करेगा वैसा उन्होंने प्रदर्शित किया है|
वे नए बिजनेस आइडिया को ध्यान से सुनते हैं, प्रोजेक्ट की गाडी का एक्सेलेटर अनियंत्रित रूप से न दब जाए इसलिए सावधानी के ब्रेक्स भी परिदृश्य में ले आते हैं| हरेक नाजुक मौकों पर प्रोजेक्ट टीम को प्रोत्साहित करते हैं, उनके बड़े दावों को ज़मीन पर फलीभूत होता न देख नाखुशी भी दर्शाते हैं| उपलब्धियों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हैं, उनके प्रोडक्ट को नीचा देखने वाले ग्लोबल लीडर के व्यवहार से दुखी भी होते हैं| और प्रोडक्ट के ग्लोबल मार्किट में जगह बनाने पर गर्वित भी होते हैं| नसीरुद्दीन शाह ने एक जीते जागते जे आर डी टाटा जैसे एक बड़े कॉर्पोरेट लीडर परदे पर उतार दिए हैं|
अन्य अभिनेताओं ने परिवेश को प्रभावी बनाने में अपने अच्छे अभिनय से सटीक योगदान दिया है और एक बेहद सफल ब्रांड की कहानी को रोचक, आकर्षक और प्रभावशाली बना दिया है|
यह सीरीज यह भी स्थापित करती है कि कॉर्पोरेट संसार में तकनीकी शोध एवं विकास के बलबूते प्रोडक्ट बनाने हेतु किस तरह का उत्साहवर्द्धक वातावरण चाहिए| टाइटन सीरीज ऐसे प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श तो रच ही देती है|
कुल मिलाकर यह सीरीज दर्शक को कुछ सार्थक देखे जाने का भाव देकर ही संपन्न होती है| और जिनके अन्दर उद्यमी बनने की भावना बसी रहती है उन्हें यह प्रेरणा भी देती है कि बुद्धि, लगन, श्रम और निरंतरता और अपने जूनून के प्रति निष्ठावान होने से बड़े लक्ष्य प्राप्त किये जा सकते हैं|
…[राकेश]
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