कहते हैं जो दुनिया में है वह सब महाभारत में कहा या दर्शाया जा चुका है और जो वहाँ नहीं वह दुनिया में नहीं है| कुछ ऐसा ही भारत रत्न लता मंगेशकर के संगीत के बारे में कहा जा सकता है| धरती पर स्त्री भावों के जितने पक्ष संभव हैं वे सब लता अपने गीतों के माध्यम से संगीत के क्षेत्र में प्रस्तुत कर चुकी हैं| 

लता मगेशकर के किसी भी गीत में षड्ज, रिषभ, गंधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद, शुद्ध स्वर, कोमल स्वर, तीव्र स्वर, श्रुति, मध्य सप्तक, मंद्र सप्तक, तार सप्तक, पूर्वांग, उत्तरांग, राग, थाट, ताल, सम, लय, लग्गी, आलाप, तान, हरकत, मुरकी, खटके, कण स्वर, मींड, गमक, ठहराव और मूर्छना आदि तत्वों में से बहुत से तत्वों का समावेश अक्षर-अक्षर पर मिलेगा| तीन अक्षरों के एक शब्द के तीनों अक्षरों के गायन पर तीन भिन्न तत्व लगाने के लिए तो लता को संगीतकार ने नहीं ही कहा होगा| गायन में ऐसी विविधता लता मंगेशकर ने अपनी साधना और उच्च स्तरीय अथक रियाज के बलबूते प्राप्त की होगी|

भारत में संगीत के क्षेत्र में लता का अस्तित्व प्रकट होना एक ऐतिहासिक घटना है, भाषा की सीमाओं से परे जाकर देख कर संगीत की दुनिया के सबसे बड़े महारथी विश्लेषण करेंगे तो वे सब लता को वैश्विक घटना और धरोहर मानने के लिए विवश हो जाएँगे|

भारत में सन 1948 के बाद लता की गायिकी ने लगभग हरेक भारतीय को संगीत के संस्कार दिये हैं, भले ही वह संगीत का नियमित श्रोता न हो पर कभी न कभी कहीं न कहीं से आती लता की गायिकी की आवाज ने उसके हृदय को छुआ अवश्य होता है| भारत के प्रत्येक भाषा भाषी के जीवन में संगीत का समावेश लता संगीत ने किया है|

लता ने ही पार्श्व गायिकी के क्षेत्र में सबसे पहले यह स्थापित किया कि पर्दे पर चरित्र के अनुरूप ही  नहीं वरन उस चरित्र को निभाने वाली अभिनेत्री के वाचन के निजी अंदाज़ को समाहित करते हुये अलग-अलग अभिनेत्रियों के लिए अलग-अलग अंदाज़ में गीत गाये जा सकते हैं| एक छोटी उम्र की कन्या से लेकर वृदधा तक स्त्री जीवन के लगभग सभी पहलुओं को उन्होंने अपने गीतों को गाने के अंदाज़ में पिरोया है| गायकों में कुंदनलाल सहगल और गायिकाओं में सुरैया दोनों ने पर्दे पर अपने लिए ही गीत गाये और महान सफलताएँ प्राप्त कीं| इन दोनों से इतर जितने भी पार्श्व गायक या गायिकाएँ हुये उन्हें अपनी सफलता के लिए अभिनेताओं या सितारों की सफलता पर निर्भर होना ही पड़ा| जैसे मुकेश को राज कपूर की आवाज़ कहा गया| मन्ना डे ने भी राज कपूर के लिए चंद गीत गाये लेकिन उनसे इतर वे किसी बड़े सितारे की आवाज़ न बन सके और इस नाते बहुत बड़े गायक होने के बावजूद उनके हिस्से वैसी सफलता न आई जिसके कि उनके जैसे गायक अधिकारी थे| किशोर कुमार भी अपने अलावा देव आनंद की आवाज़ बने और बाद में राजेश खन्ना के सुपर सितारे बनने के दौर में उन्हें बहुत बड़ी सफलता मिलना आरंभ हुई और अन्य अभिनेता गण भी उनकी आवाज़ लेने के लिए लालायित रहने लगे| तलत महमूद दिलीप कुमार की आवाज़ बने और दिलीप कुमार द्वारा रफ़ी की गायिकी को अपने लिए अपना लिए जाने के बाद धीरे-धीरे परिदृश्य से गायब होते गए| आशा भोसले को संभवतः आज तक यह दुःख है कि सबसे बेहतरीन गीत तो लता दीदी के पास ही जाते थे| गीता दत्त भी चंद निर्माता-निर्देशकों और संगीत निर्देशकों के लिए ही गा पायीं|

तात्पर्य यह है कि बड़े गायकों को भी हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्व गायन में अनवरत सफलता के लिए  फ़िल्मी सितारों और फ़िल्मों की सफलता पर बहुत हद तक निर्भर होना पड़ा| कुछ ही गायकों के गायिकी के सक्रिय जीवन में ऐसे काल आए जब अभिनेताओं ने यह इच्छा प्रकट की कि अमुक गायक उनके लिए गायें, क्योंकि या तो उन्हें लगता था कि अमुक अमुक गायकों की गायिकी ही उन पर फबती थी या उन्हें लगता था कि उनके गाये गीत उनके फ़िल्मों को उस दौर में चर्चा और सफलता दिलवा सकते थे|

कमाल अमरोही की महल और राज कपूर की बरसात के बाद लता मंगेशकर का हिन्दी फ़िल्मों के पार्श्व गायन में स्थान ऐसे मुकाम पर पहुँच गया जहां बड़ी से बड़ी सितारा अभिनेत्रियाँ मांग करने लगीं कि उनके लिए पार्श्व गायन सिर्फ और सिर्फ लता मंगेशकर की आवाज़ में करवाया जाये| नई अभिनेत्रियाँ भी ऐसी इच्छा रखतीं कि काश उनके गीतों को लता की गायिकी मिल जाये| बड़ी से बड़ी अभिनेत्री पर फिल्माए जाने के बावजूद गीतों को भी लता मंगेशकर के गीतों के रूप में पहचान मिलती रही है |

छोटे बड़े सभी स्तर के संगीतकार लता मंगेशकर के सुरों की विशिष्टता को पहचान कर अपनी धुनों को बुनने के लिए संगीत के असीमित आकाश में बहुत ऊंचे और बहुत दूर तक उड़ते जाने की संभावना से प्रेरित हो अपनी सांगीतिक कल्पनाओं को पंख देने लगे और एक से बढ़ कर एक धुनें तैयार करने लगे क्योंकि अब उन्हें पता था कि उनके द्वारा तैयार क्लिष्ट से क्लिष्ट गीत को लता पूरी कुशलता से गा देंगी| अब उनके सामने यह दुविधा नहीं थी कि गीत निर्देशक या अभिनेत्री को पसंद आयेगा या नहीं| पचास और साठ के दशकों में सक्रिय लगभग सभी संगीतकारों ने अपने सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ गीत लता मंगेशकर की गायिकी से सजाये|

ऐसा नहीं कि ऐसी शानदार सफलता का समय आने पर लता मंगेशकर ने अपना गायन सिर्फ बड़ी सितारा अभिनेत्रियों और बड़े एवं सफल संगीतकारों के गीतों के लिए ही सीमित कर दिया हो| वे न केवल नायिका की भूमिका बल्कि सह नायिका और चरित्र भूमिकाओं के लिए और कम सफल, नए और  अंजाने संगीतकारों के लिए भी गीत गाती रहीं|

पिता की असमय मृत्यु हो जाने से एक भरे पूरे परिवार का बोझ अपने अवयस्क कंधों पर आ जाने और दो वक्त के भोजन का प्रबंध भी बेहद मुश्किल से कर पाने के हालात से जूझते हुये, एक पुरुष नियंत्रित उद्योग में, जहां स्त्री शोषण की बातें फिल्म उद्योग के आरंभ से ही चर्चा पाती रही हैं, दैनिक रूप से अपने निजी जीवन में जम कर बरसने वाली कठिनाईयों और कड़वाहट को दरकिनार कर मासूम, निर्दोष सी आवाज़ और लहजे में मिठास, उल्लास से भरे गीत गाना आश्चर्य से कम नहीं|

उन सालों में 24 घंटों की अनवरत अवधि में 7-8 गीत रिकार्ड करने का करिश्मा कई-कई बार दिखाने के बावजूद उन गीतों में एक भी गीत ऐसा नहीं जिसे संगीत के पंडित कह सकें कि इस जगह लता बेसुरी हो गईं, या कोई और समकालीन इसे उनसे बेहतर ढंग से गा सकता था| एक गायक के ऐसे नायाब प्रदर्शन को क्या कहा जा सकता है? क्या अन्यत्र या हिन्दी फ़िल्म उद्योग अथवा भारतीय फ़िल्म उद्योगों में ऐसी दूसरी कोई मिसाल मिलती है?

लता में एक विद्रोहिणी भी दिखाई देती है| चुनौतियों से वे कभी नहीं घबराईं| शुरुआत में ही उस वक्त के बहुत बड़े नाम दिलीप कुमार द्वारा आशंका व्यक्त करने पर कि उनके जैसी एक महाराष्ट्रीयन लहजे में हिन्दी बोलने वाली गायिका उर्दू लफ्जों का उच्चारण कैसे कर पाएगी, लता ने इस बाधा को पार ही नहीं किया बल्कि उर्दू ही नहीं भारत की बहुत सी अन्य भाषाओं में गीत गाये|

हिन्दी फ़िल्मों के संगीत के रिकार्ड्स पर पार्श्व गायक के नाम का उल्लेख न करके परदे पर गीत प्रस्तुत करने वाले चरित्र का नाम दिया जाता था| बाकी सभी गायक गायिकाओं को या तो इससे समस्या नहीं थी या वे फ़िल्मी संगीत की दुनिया के दस्तूर के समक्ष खड़े होने का साहस नहीं जुटा पाते थे| लता ने इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के सामने खड़े होने का साहस दिखाया और उनके विरोध के बाद रिकार्ड्स पर पार्श्व गायक का नाम प्रस्तुत होने लगा| जल्दी ही वह समय भी आ गया जब वितरक भी फ़िल्म निर्माताओं पर दबाव डालने लगे कि फ़िल्म में लता के गीत अवश्य ही उपस्थित होने चाहिए| यह भूतो न भविष्यति वाला समय था|

पचास के दशक में ही विद्रोही लता एक अन्य अन्याय के समक्ष खड़ी हो गईं| जिस गीत को सजीव बनाने में गायक का बहुत बड़ा योगदान होता है उस पर गायक को रॉयल्टी नहीं मिलती थी| लता ने इस परंपरा के विरुद्ध भी बिगुल बजाया और वस्तुस्थिति बदल कर ही चैन लिया| हालांकि रफ़ी जैसे अत्यंत सफल गायक इस मुद्दे पर लता के विरोध में रहे पर लता ने बिना किसी और के समर्थन की अपेक्षा के इस लड़ाई को जीता और स्थितियाँ तो सभी गायकों के लिए सुधरीं|  

आत्मसम्मान लता मंगेशकर के लिए सर्वोपरी रहा है और इसकी रक्षा के लिए उन्हें किसी के भी सामने खड़े होना पड़ा वे कभी हिचकिचाई नहीं| प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक लेखिका ‘सिमोन द बोउवा’ द्वारा स्त्री जीवन पर लिखी पुस्तक “द सेकेंड सेक्स” के दायरे में लता मंगेशकर नहीं आतीं| दुनिया ने भरपूर चाहा कि उस ग्रंथ में वर्णित “स्त्री उपेक्षिता” की सीमाओं में लता मंगेशकर को भी बाँध कर सीमित कर दिया जाए लेकिन लता मंगेशकर ने सारे चक्रव्यूह तोड़कर अपने सांगीतिक साम्राज्य की स्थापना की और उसके बाद अपना सर्वश्रेष्ठ रचने हेतु संगीतकार, कलाकार लता के पास आए और लता के गायन के सहयोग से अपना सर्वश्रेष्ठ रचा| ऐसे संगीतकार दुर्भाग्यशाली या हठी ही कहे जाएँगे जो लता काल में सक्रिय तो रहे लेकिन लता संग एक भी गीत रच नहीं सके|

लता से ईर्ष्या रही हो या किसी भी गलत बात के सामने न झुकने का स्वभाव रहा हो, कुछ तो कारण रहा ही होगा कि साठ के दशक के शुरू में लता को जहर देकर मारने का प्रयास किया गया और बेहद नाज़ुक अवस्था में उनका उपचार हुआ और वे तीन माह के उपचार के बाद ही स्वास्थ्य प्राप्त कर सकीं|  किस और गायक के साथ ऐसा हुआ?

लता ने दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत से ऊँचा संगीत का भव्य भवन अपने गायन के माध्यम से खड़ा किया है| उनके संगीत ने हर स्तर के श्रोता को प्रभावित किया है| एक सामान्य श्रोता, जिसका कोई विशेष आकर्षण किसी गायक, गीतकार और संगीतकार के प्रति नहीं रहता, से लेकर संगीत के प्रकांड पण्डितों, जो गायक द्वारा की गई सामान्य सी त्रुटि को भी पकड़ सकते हैं, को लता की गायिकी ने समान रूप से मोहा है| शास्त्रीय संगीत की बड़ी बड़ी शख्सियतें लता के सुरों की प्रशंसक रही हैं और फ़िल्मी गायन को थोड़ा हल्का समझने वाले शास्त्रीय संगीत के बहुत बड़े बड़े नामों ने भी लता गीत अपने फुर्सत के लम्हों में आनंद के साथ गुनगुनाए हैं|  

लता सुरों ने संगीत की सीमाएं ही नहीं तोड़ीं, वरन देश की सीमाओं का भी अतिक्रमण किया है| भारत के घोषित दुश्मन देश ने जब जब भारत पर आक्रमण किया है तब यह भी संभव है कि उसी समय वहाँ बसे लता प्रशंसकों को उनके गीत सुनते हुये शर्मिंदगी महसूस होती हो कि उनके देश की सरकार और सेना कैसा अनर्थ कर रही हैं और वे कभी कैसे अपने जैसे भारतीय लता प्रशंसकों से समान रूप से मुखातिब हो पाएंगे, उन्हें यह बात कचोटती तो होगी ही कि लता मंगेशकर के देश पर उनके देश ने आक्रमण किए|  

लता मंगेशकर के गायन की बराबरी बहुत सी गायिकाओं ने करने का प्रयास सदैव किया है| लता से पहले भी फ़िल्म संगीत के परिदृश्य पर बहुत सी गुणी गायिकाएं सक्रिय थीं और लता के आगमन के बाद भी बहुत सी गायिकाओं का उदय और विकास हुआ पर लता को विस्मृत किसी काल में किया जाना संभव नहीं हुआ| शो बिजनेस एक ऐसा क्षेत्र हैं जहां चढ़ते सूरज को नमस्कार किया जाता है और ढलते सूरज को जल्द ही बुलाकर लोग नए चमकते तारों की पूजा में व्यस्त हो जाते हैं पर फ़िल्मी गायन से लगभग बीस् सालों से दूरी बना कर रखने वाली लता मंगेशकर के गीत आज भी किसी न किसी माध्यम से हमारे चारों ओर विद्यमान हैं| टीवी के विभिन्न चैनलों पर चलती गायन प्रतियोगिताओं और रियलिटी कार्यक्रमों में नई प्रतिभाएं लता के पुराने गीत गाते नज़र आती हैं|

लता केवल शंकर जय किशन, नौशाद, मदन मोहन, एस डी बर्मन या लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल जैसे बेहद  प्रसिद्ध संगीतकारों के संगीत खजाने तक ही सीमित गायिका नहीं हैं| चालीस के दशक के महान लेकिन अब लगभग भुला दिये गए संगीतकारों से लेकर पचास और साठ के दशकों के बेहद प्रतिभाशाली लेकिन अच्छी सफलता ना पा सकने वाले संगीतकारों के लता संग रचे महान गीतों की एक पूरी विरासत है जिसे तरीके से, करीने से और सलीके से सहेजने की आवश्यकता है|

केवल लता के गीत गाकर ही लता नहीं बना जा सकता| लता ने जो संगीत की एक महान पूंजी एकत्रित की है वह कैसे संगीत के विद्यार्थियों और शोधार्थियों को सहायता प्रदान कर सकती है?

उपरोक्त आवश्यकताओं की तरफ पहला कदम उठाती है नई प्रकाशित पुस्तक : “लता श्रुति-संवाद”। इस नायाब प्रयास के लेखक श्री अजय देशपांडे जी को हिन्दी फ़िल्म संगीत के विश्व भर में फैले प्रशंसक सालों से लता मंगेशकर के संगीत की भक्ति में लीन संगीत पारखी और लता संगीत के संग्रहकर्ता के रूप में जानते हैं| इन्टरनेट के उदय के बाद दुनिया भर के लता प्रशंसकों को बहुत सारे दुर्लभ लता-गीत उपलब्ध करवाने वाले अजय देशपांडे के दशकों के स्वाध्याय, शोध और लगन के फलस्वरूप “लता श्रुति-संवाद” का जन्म हो पाया है| “लता श्रुति-संवाद” लेखक का एक शोध ग्रंथ है|

अभी तक वर्णित बहुत सी बातें और लता संगीत संसार के बारे में बहुत सी अन्य बातें “लता श्रुति-संवाद” में प्रत्यक्ष रूप से या “बिटवीन द लाइंस” रूप में उपस्थित हैं| मार्च 2020 के अंत से अक्तूबर 2020 तक के लगभग छह माह की अल्प अवधि में द्रुत गति से ऐसी गुणी पुस्तक की रचना हो जाने से ही स्पष्ट है कि लेखक की लता संगीत संसार के अध्ययन और शोध पर कितनी गहराई से पकड़ है और वे इस क्षेत्र के अधिकारिक विद्वान हैं|  

लता मंगेशकर ने साठ के दशक के मध्य तक श्रेष्ठ स्तर के हजारों गीत गाये और इतने सारे उच्च गुणवत्ता के गीतों में से केवल सौ गीतों का चुनाव करने के लिए बहुत बड़ी मेधा चाहिए| लेखक ने लता के गायन के विविध पहलू सामने आ सकें इस भावना से विभिन्न श्रेणी के सौ गीतों का चुनाव किया है और किस गुण के कारण किसी गीत विशेष का चुनाव किया गया है उस कारण से परिचित होना ही अपने आप में लता संगीत संसार के बारे में पाठक की समझ को विकसित करता है| लता गायन की विविधता उजागर करने के साथ यह पुस्तक लता गायन का गहराई से विश्लेषण करके इस बात को सहजता से पाठक के सामने प्रकट कर देती है कि क्यों लता मंगेशकर पार्श्व गायन के क्षेत्र की महानतम गायिका हैं| इस बात को सिद्ध नहीं करना पड़ता और पाठक स्वतः ही इस तथ्य और सत्य को समझ जाता है|  

यूं तो फ़िल्मी गीत अकसर ही मिश्रित रागों की उपज होते हैं और एक ही गीत में दो रागों की झलक मिलना भी कोई अचरज की बात नहीं| “लता श्रुति- संवाद” कोई लता गीत किस राग पर आधारित है केवल उस पर केन्द्रित नहीं है बल्कि बेहद महीन विश्लेषण करते हुये पाठक को अचरज में डालते हुये इस ज्ञान से समृद्ध करती जाती है कि किसी भी गीत में शब्दों की छोटी ईकाई – अक्षर के साथ भी सांगीतिक रूप से लता ने क्या जादू किया है| जैसे वैज्ञानिक विश्लेषण यंत्र तात्विक संरचना के बारे में बारीक जानकारी दे सकते हैं उसी तरह यह पुस्तक गीतों में लता मंगेशकर की गायिकी के छोटे से छोटे पहलू पर गहन चर्चा करके गीतों की कुंडली पाठक के समक्ष रख देती है|

पुस्तक संगीत के सामान्य श्रोता को यह आसान ढंग से संगीत के शास्त्रीय तत्वों की जानकारी उपलब्ध करा देती है और गीतों के नोटेशन्स और लता के गायन की बारीकियों को उजागर करके संगीत के पारखी श्रोताओं को भी ज्ञान से समृद्ध करती है|

कॉफी टेबल बुक के रूप में छ्पी पुस्तक काफी आकर्षक है और लेखक की धर्मपत्नी श्रीमती सई देशपांडे जी के बनाए लता मंगेशकर के रेखाचित्र पुस्तक की अन्य विशेषता हैं| हिन्दी फ़िल्म संगीत पर छपी पुस्तकों के संग्रहकर्ताओं के लिए तो यह आवश्यक पुस्तक है ही साथ ही लता मंगेशकर के बेहद उच्च गायन स्तर के रहस्य से बहुत हद तक परिचित होने की इच्छा रखने वाले लोगों के लिए यह पुस्तक बेहद सहायक सिद्ध हो सकती है| संगीत के विद्यार्थियों और शोधार्थियों सहित गायन के क्षेत्र में सक्रिय होने वाले प्रत्येक प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिए इस पुस्तक से परिचित होना बेहद आवश्यक है|

लता श्रुति-संवादलता संगीत संसार पर केन्द्रित अनूठी पुस्तक है और अपने को समृद्ध करने के लिए  पाठकों को स्वयं ही इस पुस्तक की आत्मा तक पहुँचना होगा|

लता मंगेशकर की अद्भुत मेधा द्वारा विकसित गायन परंपरा आने वाली पीढ़ियों के सामने सजीव बनी रहे इस लक्ष्य को पाने में पुस्तक “लता श्रुति-संवाद” एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी|

….[राकेश]